मेरे सम्पादक, मेरे संतापक: वैतरणी ऐसे की पार…

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मेरे सम्पादक, मेरे संतापक -13                                                                       पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें..

-राजीव नयन बहुगुणा||

नव भारत टाइम्स की नौकरी में रहते हुए १९९६ तक, मैं टिहरी बाँध विरोधी आन्दोलन में हिस्सा लेने छुट्टी लेकर ही आ पाता था. हफ्ते भर की छुट्टी लेता और महीने डेढ़ महीने झेल जाता. अखबार का वातावरण सौहार्द पूर्ण था, इस लिए हलकी – फुल्की चिक चिक के सिवा कुछ नहीं होता. कभी कभी नौकरी छोड़ने की भी सोचता, लेकिन इतने इंतज़ार और अध्यवसाय से मिली नौकरी यकायक छोड़ना भी आसान नहीं था. लेकिन इस मामले में नव भारत टाइम्स के नए और सनकी मालिक समीर जैन ने मेरी मदद कर दी, अखबार का जयपुर संस्करण बंद करके. अखबार में स्थायी तालाबंदी होने की सुचना सुबह सुबह अपने प्रभारी सम्पादक दिनेश ठाकुर को मैंने ही दी, जब उन्होंने फोन पर मुझसे जानना चाहा की क्या आज मैं अपने स्कूटर पर उन्हें भी दफ्तर साथ ले जा सकता हूँ ? मैंने बताया की मैं उन्हें लेने आ रहा हूँ, लेकिन दफ्तर नहीं, बियर बार में चलेंगे. दस साल से ज्यादा समय तक किया मनचाहा काम एक झटके में छूट गया. मेरी सुधियों में अपने प्रारंभिक दिन तिर आये.Rajiv-nayan-bahuguna

१९८६ की शुरुआत में राजेन्द्र माथुर ने मेरे कंधे पर हाथ धर कर कहा की तुम्हारा इंतज़ार ख़त्म हुआ. कुछ ही दिन बाद अखबार के पटना संस्करण के लिए परीक्षा होने वाली है, कहीं जाना मत. लेकिन परीक्षा मैं देता कैसे ? अंग्रेज़ी में तो निल था. मुझे तो बगैर परीक्षा के ही नौकरी चाहिए थी. मई अपने गाँव भाग गया और एक माह बाद लौटा, जब यकीन हो गया की अब तक परिक्षा तो हो भी गयी होगी. मुझे देख माथुर साहब बहुत नाराज़ हुए, लेकिन बोले की चलो आपकी परीक्षा अलग से हो जायेगी.

हे भगवान् ! फिर परीक्षा. हिन्दी के सामान्य ज्ञान, निबंध, संक्षिप्ती करण आदि के पर्चे तो मैंने पलक झपकते कर किये, अब अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद का पहाड़ था. पर्चा बड़ा सख्त था. इकोनोमिक टाइम्स के एक लेख का अनुवाद करना था. मैं पहले ही शब्द पर अटक गया. पहला शब्द था budget. मेरी नाक और आँख दोनों घबराहट से बहती देख कुछ दूर बैठे मुख्य उपसंपादक वीरेन्द्र सिंह बर्त्वाल माजरा भांप गए. वह मेरे पास आये और पर्चा हाथ में लेकर मेरी मदद की तैयारी करने लगे. इतने में किसी और सीनियर ( शायद सत सोनी ) ने हांक लगाई – ऐ बार्त्वाल जी, ये परीक्षा हो रही है कि मज़ाक? बर्त्वाल जी घबरा कर अपनी सीट पर जा बैठे. वह एक सज्जन और योग्य लेकिन घबराने वाले व्यक्ति थे. कुछ कुछ कन्फ्यूज्ड भी. एक बार सिगरेट सिगरेट जलाते हुए अपने होंठ जला बैठे थे. सिगरेट लगायी ही नहीं और जलती तीली मुंह से चिपका ली.

खैर… अपनी सीट पर जा कर वह चुप नहीं बैठे, बल्कि एक दुसरे उत्तराखंडी दीवान सिंह मेहता को उकसाया कि वह जाकर मुझे नक़ल करवाएं. मेहता विशेष संवाददाता थे. गोर चिट्टे और आत्म विश्वास से भरे हुए. वह मेरे पास आये और पूछा — हाँ राजीव, बताओ कहाँ परेशानी आ रही है ? मैं तो पहले ही शब्द पर अटका था. मैंने पूछा – सर ये बडगेट क्या होता है? मुझे बजट को बडगेट बोलता देख वह समझ गए कि मैं कितने गहरे पानी में हूँ. उन्होंने सीधे सीधे मुझे डिक्टेशन देना शुरू कर दिया. उन पर भी कोई चिल्लाया कि – नक़ल कराते हो? लेकिन उन्होंने डांट कर चुप कराया – चुपचाप अपना काम करो, मैं  इनसे पर्यावरण के बारे में कुछ पूछ रहा हूँ. मुझे रिपोर्ट लिखनी है. परीक्षा नवभारत टाइम्स के सम्पादकीय हाल में हो रही थी. सारा स्टाफ मौजूद था. दिन दहाड़े यह अंधेर गर्दी और सीना जोरी देख सबने दांतों तले उंगली दाब ली और मेरी समझ में यह बात आ गयी की एक रिपोर्टर और सब एडीटर में क्या फर्क होता है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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