एडीटर की दरकार….

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-विकास कुमार गुप्ता||

बहुत पहले संपादक की परिभाषा के परिप्रेक्ष्य में मास कॉम के कोर्स में एक जगह लिखा हुआ पढ़ा था कि ”हर सम्पादक अपने को कुतुब मीनार से कम नहीं समझता.“ अपने पूर्ववर्ती अनुभवों में मैंने इसे बहुधा सही भी पाया. एक जगह उप सम्पादक की परिभाषा लिखी थी कि ”उपसम्पादक युद्ध का बेनाम योद्धा होता है.“ और यह एक हद तक सही भी है. उपसम्पादक सब कुछ तो करते है लेकिन उनका नाम कही शायद ही छपता हो. वर्तमान सम्पादकों के मीडिया हाउसों के बाजारवाद के भेंट चढ़ते-चढ़ाते देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि अब कुतुब मीनार का कुनबा गिर सा गया हो. ठीक ऐसे जैसे कुतुब मीनार आसमान की ओर न जाकर पाताल की ओर गया हो.
editing

आजादी पश्चात् मीडियाईयों और खासकर के सम्पादकों के रुतबे हुआ करते थे. उस समय पत्रकारिता कमीशन नही वरन मिशन हुआ करती थी. और चार लाइन की खबर पर शासन से लेकर प्रशासन तक में हलचल मच जाती थी. और खबरों के असर से सब वाकिफ भी थे. कहते है न कि ज्यादा जोगी मठ उजार. वैसे ही आजकल कुछ हो रहा है. मीडिया के जोगियों की मात्रा में उछाल सा आ गया है. और मीडियाई मठ बेचारे चीख रहे है कि मुझे बचाओं. आजकल हर रोड हर गली में जो प्रेस का लेबल दिख रहा है वैसा आजादी के पश्चात् तो कतई नहीं था. लेकिन आज का माहौल ऐसा हो गया है कि पत्रकारों के भीड़ में मिशन और कमीशन वाले पत्रकारों की पहचान पुलिस की पहचान से बाहर सा हो गया है. रंगा सियार मानिंद.

कुकुरमुत्तों की भाषा अगर पत्रकारों को आती और अगर कोई पत्रकार उनसे उनकी जमात और अखबारों के जमात के बारे तुलना करता तो निश्चय ही वे अखबार और पत्रिका के आगे शर्म से गड़ जाते. विषय से भटकने का इरादा त्यागते हुए पुनः अपने विषय पर पधारने की कोशिश करते है. हां तो सम्पादक की चर्चा हो रही थी. ब्रिटिश इंडिया में सम्पादकों की भूमिका को समझने के लिए एक विज्ञापन ही काफी है जो मीडिया सेवकों के रोंगटे खड़े कर देने वाला विज्ञापन है.

फरवरी 1907 में स्वराज्य इलाहाबाद के लिये विज्ञापन जोकि ‘जू उन करनीन’ में छपा था ”एक जौ की रोटी और एक प्याला पानी, यह शहरे-तनख्वाह है, जिस पर ”स्वराज्य“ इलाहाबाद के वास्ते एक एडीटर मतलूब है (आवश्यकता) है. यह वह अखबार है जिसके दो एडीटर बगावती आमेज्ञ (विद्रोहात्मक लेखों) की मुहब्बत में गिरफ्तार हो चुके है. अब तीसरा एडीटर मुहैया करने के लिए इश्तहार दिया जाता है, उसमें जो शर्तें और तनख्वाह जाहिर की गयी है, वास्ते ऐसे एडीटर की दरकार है, जो अपने ऐशो आराम पर जेलखाने मे रहकर जौ की रोटी एक प्याला पानी तरजीह दे“.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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