सत्ता मेँ बैठे लोगोँ की ईमानदारी बड़ी मंनोरंजक होती है…

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-एस. गुरुमूर्ति||

मेरी नानी बताया करती थी (नानी ने कुछ नहीं बताया सिद्धु स्टाईल है बस) कि एक बार इंदिरा ने अपने मंत्रियो के बारे मेँ फाइलेँ मंगाई थीँ, उन फाईलोँ मेँ एक रिश्वतखोरी का मामला हाथ लगा था प्रति रेलवे वैगन 5000 रुपये की रिश्वत तय हुई थी 10 वैगन की आपूर्ति होनी थी, रिश्वत की कुल राशि 50000 रुपये तय थी जिसमेँ आधे रुपये अग्रिम दिये गये सौदा हो गया मंत्री ने फाईल पर ‘अप्रूव्ड’ लिख दिया जिस पार्टी को रिश्वत देनी थी, उसने सोचा आदेश हो गया है अब 25000 रुपये बचा लेते है, और पैसे देने से इंकार कर दिया. सचिव ने तुरंत मंत्री जी को सूचित किया मंत्री ने फाईल वापस मंगवा ली और ‘अप्रूव्ड’ के आगे ‘Not’ लिख दिया, सौदा रुक गया पार्टी रोती हुई मंत्री महोदय के ऑफिस मेँ पहुँची पैसे दिये सौदा पूरा किया और मंत्री जी ने ‘Not’ मेँ एक E लगा कर ‘Note’ कर दिया मतलब फाइल ‘नोट अप्रूव्ड’ की टिप्पणी के साथ पारित हो गयी!

Indira-Gandhi

इंदिरा गाँधी ने इस चतुराई के लिये मंत्री जी की तारीफ की और खुद के लिये सबक सीखा.

भ्रष्टाचार हमेशा से सत्ता की अघोषित रखैल है, यह नेहरु के वक्त भी था जब उनके दामाद फिरोज गांधी ने मुंदड़ा घोटाले को उजागर किया था. इंदिरा के समय मेँ भ्रष्टाचार व्यक्तिगत पाप की जगह व्यवस्थागत बन गया शायद इंदिरा ने पाया होगा कि ईमानदारोँ के बजाय भ्रष्ट लोगोँ से व्यवहार ज्यादा आसान है

राजीव गाँधी ने ईमानदार होने का दावा करके बड़ी गलती की. जबकि वे थे, नहीँ यह गलती अनुभवी इंदिरा ने कभी नहीँ की, उल्टा इंदिरा ने ये बताया कि पूरी दुनिया भ्रष्ट कैसे है!

और मनमोहन को ईमानदार प्रचारित करके राजीव जैसी गलती कांग्रेस पूरे दस सालोँ से करती आ रही है जबकि लूट की स्थायी पंरपरा मेँ ईमानदार बने रहना बड़ा टेंशनात्मक मसला होता है….!!

टिप्पणी :-

सत्ता मेँ बैठे लोगोँ की ईमानदारी बड़ी मंनोरंजनात्मक होती है मित्र!!

(श्रीमति राकेश की फेसबुक वाल से)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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