यस वी कैन, पर ऐसे…

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-आलोक पुराणिक||

यस वी कैन, हैदराबाद में हुई एक रैली में दोहराया गया.

जो लोग ये नारा नहीं दोहराते, वो भी पर्याप्त वी कैन मचाये हैं. पाक चीन से घुसपैठियों को रोकने की बात दूर की है, अब नेपाल के घुसपैठिये-तस्कर वी कैन मचा रहे हैं.

आलोक पुराणिक
आलोक पुराणिक

एनबीटी ने बताया कि अदालती निर्देश पर तंबाकूयुक्त गुटखे पर भले ही रोक लग गयी हो. लेकिन अब नेपाल से आये हुए गोमती, श्याम बहार वगैरह गुटखे भारतीय इलाकों में धुआंधार बिक रहे हैं. सांस्कृतिक आदान-प्रदान हो रहा है, लखनऊ की नदी, गोमती नेपाल से गुटखामय होकर लौट रही है.

यस वी कैन स्टाप गुटखा तस्करी, पर नो वी कैन नाट, तस्करी रोकने से ज्यादा रकम तस्करी चलने देने में है.

वी कैन, जिसमें रकम हो. इस मुल्क में जिस आइटम को दुकान में तब्दील कर दो, उसमें वी कैन सफल हो जाता है.

जिसमें खालिस सेवा-ड्यूटी हो, वी कैन नाट.

एक कारोबारी ने बताया- बार्डर पर स्विस बैंकों की शाखाएं खुलवा दो. वीआईपी लोगों को, खास-खास बंदों के दामादों-बेटों को प्लाट दो बार्डर पर. मुल्क के बार्डर की रक्षा से ज्यादा चौकसी अपने प्लाट की रक्षा, अपने स्विस खातों की रक्षा में दिखायी जाती है. पूरे मुल्क की सीमा को थ्री साइड प्लाट घोषित कर दिया जाये.

हर बार्डर पर स्विस बैंक हों, तो आक्रमणकारी देश के हुक्मरान भी आक्रमण करने में हिचकेंगे. बड़े लोग किसी भी मुल्क के हों, स्विस बैंकों के प्रति अतिरिक्त संवेदनशील रहते हैं.

यस वी कैन, सफलता अब दुकान माडल में है.

मेरे मुहल्ले में पीने के साफ पानी की दिक्कत थी. एक सज्जन उस विषय पर अखबारों में लैटर लिखते रहे, कुछ ना हुआ. एक सज्जन उस मसले को लेकर नगर-निगम जाते रहे कुछ ना हुआ. एक सज्जन ने मुहल्ले में साफ पानी की सस्ती दुकान खोल ली, चल निकली. लैटर लिखनेवाले आज भी लैटर लिख रहे हैं, नगर-निगम के चक्कर काटनेवाले आज भी चक्करघिन्नी हो रहे हैं. पानी से रकम खींचकर कारोबारी सज्जन बड़े आदमी हो गये हैं, और अब विधायक हुआ चाहते हैं.

यस वी कैन, अगर हर समस्या की दुकान बना दें.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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