मेरे संपादक, मेरे संतापक: कि पैसा बोलता है…

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मेरे संपादक, मेरे संतापक-11                                                                                पिछली कड़ी बांचने के लिए यहाँ क्लिक करें…

-राजीव नयन बहुगुणा||

१९९६ में अटल विहारी वाजपेयी की सरकार का तेरह दिन में ही शीघ्र पतन हो जाने के फलस्वरूप कर्णाटक के मुख्य मंत्री हरदन हल्ली डोडेगौड़ा देवे गौडा अकस्मात प्रधान मंत्री बन बैठे. जनता दल के अन्य बड़े नेता ठिकाने लग गए थे. लालू प्रसाद यादव चारे की चिरकुटई में फंस चुके थे, शरद यादव जैन हवाला कांड की चपेट में आकर स्वीकार कर चुके थे कि हाँ, मैंने जैन से पैसा खाया है, कर्नाटक के ही एक और बड़े नेता राम कृष्ण हेगड़े चुनाव में ही खेत रहे थे सो देवेगौड़ा को लाल किले से भाषण देने का अवसर मिल गया. न तो वह उत्तर भारत की राजीति और सामजिक ढाँचे से अवगत थे, और न उत्तर भारत उनसे परिचित था.Surendra Mohan

उत्तर भारत की वर्चस्व वादी राजनीति के मद्दे नज़र यह अच्छा लक्षण था कि दक्षिण के किसी व्यक्ति को प्रधान मंत्री बनने का अवसर मिले, लेकिन इससे पहले दक्षिण के ही पामुल्रापति व्यंकट नरसिम्हा राव ने जो गंद फैलाई, उससे सब थू थू कर उठे थे. इसलिए देवेगौड़ा को लेकर भी एक शंका सबके मन में थी. लेकिन नरसिम्हाराव अव्वल दर्जे के घाघ और घुन्ना आदमी थे, उन्होंने टिहरी बाँध आंदोलन के दौरान हमें सर्वाधिक सताया. पिटवाया, अपहरण करवाया और मुकद्दमे लदवाये. इसके विपरीत देवेगौड़ा टिहरी बाँध विरोधी आंदोलन को लेकर भारी दबाव में थे. उन्हें पद भार ग्रहण करते ही सर्व प्रथम इस अज़ाब से दो चार होना पड़ा था. मेरे पिता अनशन पर थे और उस समय मिडिया इतना बाजारू नहि हुआ था कि ऐसे मामलों की पूरी तरह अनदेखी कर राखी सावंत के ठुमके दिखाता रहे. सो मीडिया ने भी इस मामले में खूब हाईप बना रखी थी.

राजीव नयन बहुगुणा
राजीव नयन बहुगुणा

जनता दल के वरिष्ठ नेता और समाजवादी चिन्तक – लेखक सुरेन्द्र मोहन टिहरी बाँध विरोधी आंदोलन के समर्थक और मेरे पिता के मित्र थे. उन्होंने देवेगौड़ा को डराया कि सुंदर लाल बहुगुणा इस क्षेत्र की सर्वमान्य सामजिक हस्ती हैं. अनशन के फलस्वरूप उन्हें कुछ हो गया, तो भारी मुसीबत में फंसोगे. प्रधान मंत्री का पद तो जाएगा ही, उत्तर भारत की ओर आना – जाना भी दूभर हो जायेगा. जबकि हालत इसके ठीक विपरीत थे. उत्तर भारत के तमाम बड़े राज नेता बाँध समर्थक थे. पिछले कुछ वर्षों से हर प्रधान मंत्री के घर बाँध के ठेकेदार का आना जाना था.

खुद टिहरी में ही जितने लोग बाँध के विरोध में थे, उससे कहीं गुना अधिक बाँध के समर्थन में एक जुट थे, क्योकि बाँध का पैसा किसी न किसी चैनल से उन तक भी पंहुच रहा था. सब कुछ बाँध के पक्ष में था. हमारे पक्ष में यदि कुछ था, तो वह था विज्ञान और मानवीय मूल्यों का सत्य. लेकिन विज्ञान और मानवीय मूल्यों को तो राजनेता ठेंगे पर रखते हैं. सुरेन्द्र मोहन चतुराई से काम लेकर देवेगौड़ा को दबाव में ला चुके थे. लेकिन अनर्थ होता देख बाँध समर्थक लाबी ने देवेगौड़ा को आश्वस्त किया कि सुंदर लाल बहुगुणा के साथ कोई नहीं है. तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगडेगा. तुम्हारे पास इस बाँध को रुकवा कर खोने और पाने को हर तरह से करोड़ों के हरे – गुलाबी, कड़क और सुंदर नोट के बोरे हैं.

(ज़ारी )                                                                          अगली कड़ी के लिए यहाँ क्लिक करें…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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