एकता, उन्हे, उन्हे छोड़कर…

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-आलोक पुराणिक||

तिरंगों, देशभक्ति की फिल्मों-गीतों का बाजार सजना शुरु हो लिया है. पंद्रह अगस्त के दो-तीन दिन पहले देशप्रेम की भरपूर डिमांड-सप्लाई निकल आती है. इसके बाद फिर हम बदमाशी, बेईमानी, निठल्लेपन के नार्मल रुटीन की ओर चल निकलते हैं.

आलोक पुराणिक
आलोक पुराणिक

कल मैंने एक प्रयोग किया-अपने आसपास के बंदों से कहा कि दिल से ये कहो-आवाज दो हम एक हैं, एक हैं. दिल से कहना है.

एक सासूजी बोलीं- मैं सबको एक ही मान लूंगी-अपनी बहू को छोड़कर.

बहू ने भी आफ-दि-रिकार्ड यही कहा कि यूं राष्ट्र को एक ही मान सकती हूं, पर उसमें सास को ना रखूंगी. उसके साथ एक दिन रहना आफत, एक कैसे मान लूं.

ननद ने ये बात भाभी के बारे में कही और भाभी ने ठीक ये बात ननद के बारे में कही. यूं हम एक हैं.

पार्क के कोने में कब्जा-विमर्श चल रहा था. कब्जा-विमर्श का सार यह था कि अपने घर के सामने पड़नेवाली खाली सरकारी जमीन पर मैं ही कब्जा करूंगा, उस पर पड़ोसी को उसकी कार कैसे पार्क करने दूं.

यूं हम एक हैं, बस पड़ोसी को हटा दो, ये मेरे घर के सामने मेरे कब्जे के हक का हनन करता है.

महाराष्ट्र के एक नेता से एक होने के बारे में पूछा तो वह बोला-यूं हम एक हैं, पर महाराष्ट्र में रहनेवाले गुजरातियों से कह दो कि गुजरात जायें.

महाराष्ट्र का दूसरा नेता बोला-यूं हम एक हैं, पर बिहारी बिहार में जाकर एक हो जायें, यूपीवाले यूपी में जाकर एक हो जायें. यहां हम एक साथ रहे, तो एक होने में अड़चन आयेगी.

एक लघु-स्तरीय नेता से पूछा- आप नेतागण तो दिल से कह दो-एक हैं हम.

नेता आफ-दि-रिकार्ड बोला कि काहे के एक, हमारे दामाद को सस्ता सरकारी प्लाट ना मिल पाया, फुल जोर लगा लिया. कई नेताओं के दामाद महंगी कालोनियां काट रहे हैं. एक तो तब मानें, जब सबके दामाद कालोनियां काटें.

इत्ती एकता मचाने को कालोनियां, जमीन कहां से आयेगी, नेताजी.

तब ही हम एक ना हो पाते, एकता में कमी आ जाती है – नेताजी बता रहे हैं.

चलिये एकता में कमी की वजह तो समझ आयी ना.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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