मरुधर के लाल लोक कलाकार पद्मश्री साकर खान का निधन…

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-चन्दन सिंह भाटी||

जैसलमेर. मरुधर की माटी के लाल पद्मश्री साकर खान का निधन हो गया. देश विदेश में राजस्थान के लोक गीत-संगीत को ख्याति दिलाने वाले कमायचा वादक साकार खान के निद्झां से जैसलमेर ही नहीं अपितु विश्व ने एक लोक हीरा खो दिया,padamshree sakir

हमीरा गांव मे शनिवार को मातम के माहौल मे हर किसी की आंखें नम थी. सरहदी जैसलमेर जिले को विश्व मानचित्र पर सुर्खियो मे लाने वाले पद्मश्री साकर खां को अंतिम विदाई देने के दौरान हुजूम उमड़ पड़ा. इस दौरान हर चेहरा उदास था.

लोगो को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वयोवद्ध लोक कलाकार साकर खां को कमायचे पर अपनी दिल की भावनाओ को संगीत की धुनो के रूप मे फिजां में बिखेरते अब वे नहीं देख पाएंगे और उनके संगीत का चुंबकीय आकर्षण लोगो को घरों से बाहर आने को मजबूर नहीं कर पाएगा.

कुछ समय पहले जब साकर खां कमायचा पर केसरिया बालम आओ नी.. की धुने छेड़ते तो उनका छोटा भाई पेपे खां शहनाई बजाकर उसके सुर मे सुर मिलाता. इसी बीच साकर खां के पोते जावेद व आजाद भी कमायचा व तबला लेकर वहां पहुंच जाते.

वाद्य यंत्रो की संगत पर इस परिवार की ओर से जो संगीतमय माहौल तैयार होता, वह आसपास रहने वाले लोगो के दिलो की गहराई मे उतरकर मन को झंकृत कर देता. पद्मश्री साकर खां के दुनिया से विदा होने के बाद अब हमीरा गांव मे ऎसा संगीतमय माहौल देखने को नहीं मिलेगा.

पद्मश्री मिलने पर झूम उठे थे

साकर खां को पदमश्री सम्मान मिलने पर पूरा हमीरा गांव झूम उठा था. साकर खां को पदमश्री का सम्मान मिलने की घोषणा के बाद देशभर मे सुर्खियो मे आए सरहदी जैसलमेर जिले के हमीरा गांव मे हर किसी की आंखो मे इस बात को लेकर खुशी की चमक थी.

पद्मश्री सम्मान मिलने की घोषणा होने पर जब 31 जनवरी 2012 को यह संवाददाता जैसलमेर से 25 किमी दूर उनके गांव हमीरा पहुंचा था तो जीवन के 75 बसंत पार कर चुके साकर खां मे किसी किशोर कलाकार की तरह कला के प्रति जज्बा व नया कुछ करने की हसरत देखने को मिली. उन्होने अपने अनुभव बयां करते हुए कहा था कि गांव वालो का सम्मान व उनका आदर को ही उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान है.

केवल खुशी मे शरीक

साकर खां अपनी कला को व्यावसायिक रूप नहीं देना चाहते थे. जब वे 11 साल के थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया. उस समय उनके पास पिता की धरोहर कमायचा था, जिसे बजाने की कला सीखने के बाद उन्होने इसमे निपुणता हासिल की. गांव के लोगो की हौसला अफजाई के कारण उन्हे यह मुकाम मिला, इसलिए वे केवल उनकी खुशी के मौको पर ही अपनी कला पेश करते.

सैलानियो को खुश करने के लिए कला का प्रदर्शन उन्हे पसंद नहीं था. साकर खां को संतोष था कि उनके परिवार के सभी लोग कला के हुनरमंद है और वे लोक कला को जीवित रखने व उसके प्रचार-प्रसार करने की इच्छा रखते है. उनके पुत्र दर्रे खां को कमायचा, फिरोज को ढोलक व पोते रफीक को कमायचा व दूसरे पोते लतीफ को ढोलक से लगाव है.

अनेक विदेश यात्रा, कई सम्मान

देश-विदेश में थार संगीत की स्वर लहरियां बिखेर कर मरूस्थलीय जैसलमेर जिले का नाम रोशन करने में विशेष योगदान देने वाले साकर खां गत 50 वर्षो से संगीत साधना से जुड़े हुए थे और अनेक बार विदेश यात्राएं कर चुके हैं.

उन्हे अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, उनकी पुरस्कारो की फेहरिस्त मे पदमश्री व राज्यस्तरीय सम्मान के अलावा केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी की ओर से वर्ष 1991, मध्यप्रदेश सरकार के प्रतिष्ठित तुलसी अवार्ड से वर्ष 1990, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी जोधपुर की ओर से अकादमी की स्वर्ण जयंती समारोह के अवसर पर वर्ष 2009, राज्य सरकार की ओर से जोधपुर में आयोजित राज्यस्तरीय स्वाधीनता दिवस समारोह के अवसर पर 15 अगस्त 2007 मे मिला सम्मान भी शामिल है.

इसके अलावा उन्हे जिला स्तर पर भी राष्ट्रीय पर्वो पर सम्मानित किया गया. उन्होने फ्रांस, रूस, स्विट्जरलेंड, जिनेवा, बेल्जियम, जर्मनी, अमरीका, जापान, हांगकांग सहित अनेक देशो की यात्राएं भी की.

खमा घणी, अन्नदाता मोटा है…

देश का प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त करने को साकर खां ऊपर वाले की कृपा ही मानते थे. वे अक्सर यही कहते थे कि खम्मा घणी, अन्नदाता मोटा है, म्है तो धोरां री धरती मे पैदा हुआ… आम की लकड़ी, शीशम के काष्ठ व हाथीदांत से तैयार होने वाले कमायचे को बजाने मे माहिर साकर खां के विवाह व रस्मो पर पेश किए जाने वाले तोनरिया, बनड़ा, घूमर, बरसाले रा मौसम, चौमासा, मूमल, मणियारा, सियालो, हालरिया से हर किसी को कायल कर देते.

यही नहीं, उन्हे कमायचे पर ट्रेन के चलने व घोड़े के दौड़ने की आवाज निकालने मे भी महारथ हासिल थी. साकर खां करीब 33 साल पहले इंदिरा गांधी के साथ रूस मे आयोजित इंडिया फेस्टिवल मे जाने के मौके को जीवन का सबसे यादगार दिन मानते थे.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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