दुर्गा शक्ति मामले में फेसबुक पर कमेन्ट करने से दलित लेखक गिरफ्तार…

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निलम्बित आइएएस दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन के बाद दुर्गा शक्ति के पक्ष में और सपा सरकार पर के खिलाफ देश भर में उठ रही आवाजों ने उत्तर प्रदेश सरकार को बुरी तरह हिला दिया है. हर तरफ अपनी भद्द पिटते देख अखिलेश सरकार हत्थे से उखड गई लगती है. जिसके चलते अखिलेश सरकार सोशल मीडिया पर उठ रही विरोध की लहर को दबाने के लिए फेसबुक पर सपा सरकार के खिलाफ कमेन्ट करने पर गिरफ्तार तक करने लगी है.kawal

इसकी ताज़ा बानगी है दलित लेखक और कार्यकर्ता कंवल भारती की गिरफ्तारी. अखिलेश सरकार ने सोशल साइट फेसबुक पर कॉमेंट करने के कारण दलित लेखक और कार्यकर्ता कंवल भारती को गिरफ्तार कर लिया. कंवल भारती ने फेसबुक पर कमेंट किया था कि दुर्गा और आरक्षण, दोनों मामलों में अखिलेश सरकार फेल रही है. उन्होंने इस मसले पर अखिलेश सरकार की तीखी आलोचना की थी.

गौरतलब है कि कंवल भारती दलित राजनीति पर लगातार लिखते रहे हैं. उन्हें मंगलवार को रामपुर में गिरफ्तार किया गया. हालांकि सीजेएम कोर्ट से उन्हें थोड़ी ही देर बाद जमानत मिल गई.

कंवल भारती ने फेसबुक पर लिखा था, ‘आरक्षण और दुर्गाशक्ति नागपाल मुद्दों पर अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार पूरी तरह फेल हो गयी है. अखिलेश, शिवपाल यादव, आज़म खां और मुलायम सिंह इन मुद्दों पर अपनी या अपनी सरकार की पीठ कितनी ही ठोक लें, लेकिन हकीकत ये देख नहीं पा रहे हैं. अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और बेलगाम मंत्री इंसान से हैवान बन गए हैं. ये अपने पतन की पटकथा खुद लिख रहे हैं. सत्ता के मद में अंधे हो गये इन लोगों को समझाने का मतलब है भैंस के आगे बीन बजाना.’

जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख आन्दोलन कारियों में से एक रहे प्रसिद्ध लेखक अफलातून अफलू ने उत्तर प्रदेश सरकार की कड़ी निंदा करते हुए अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है कि “रावण से बदत्तर है मुलायम के राज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की स्थिति. लेखक कंवल भारती की आजम खान के PRO की FIR पर गिरफ्तारी ने यह साबित कर दिया है. लोहिया रावण के राज में विभीषण द्वारा अपने निवास पर ‘राम-राम-राम’ लिखने के बावजूद रावण द्वारा खलल न डालने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति उसकी निष्ठा का नमूना मानते थे. ‘ सच कहना अगर बगावत है,तो समझो हम भी बागी हैं’ ! सूबे की सरकार तत्काल लेखक-चिन्तक कंवल भारती पर लगाये फर्जी मुकदमे को वापस ले.”

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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