फेसबुक और अखबार..

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-आशुतोष कुमार||

जब टेलिविज़न से अखबार का मुकाबला हुआ,  तो दहशत खाए अखबारों ने तुरंत चोला बदला. वे अधिक से अधिक ‘दृश्य’ हो गए. ढेर सारे चित्र. कम से कम शब्द. अधिक से अधिक रंग. भाषा भी अधिक  सनसनीखेज और चित्रात्मक. हिंसा और सैक्स की रेलपेल. यह सब कर के उन्होंने अपना वजूद तो बचा लिया, लेकिन ईमान गँवा दिया. वे दूसरा रास्ता भी ले सकते थे. वे अपने पाठकों को वैसा बहुत कुछ दे सकते थे, जो टेलिविज़न जैसा तुरंता माध्यम कभी दे नहीं सकता. वे दृष्टि का निर्माण करने वाली गहरी जानकारियों और विश्लेषण  पर आधारित सामग्री दे कर भी  अपनी जगह बचा सकते थे. भले ही यह मुश्किल रास्ता था. एकाध अखबारों ने ही ऐसा कुछ करने की  कोशिश की .facebook_newspaper-704x318

आज अखबार का मुकाबला फेसबुक से है. फिर अखबारों में ऐसी ही दहशत है. वे अखबार को फेसबुक का विस्तार बनाने में लगे हैं. अनेक सम्पादक अखबार की तुलना में फेसबुक पर अधिक समय बिता रहे हैं. वे फेसबुक से कहानियां उठा रहे हैं और अखबार में फैला रहे हैं. वे फेसबुक जैसी बहसबाजी को बढ़ावा दे रहे हैं. वे व्यक्तिगत हमलों और चरित्रहन को अपना कारोबार बना रहे हैं .

लेकिन अखबार न टेलिविज़न हो सकता है,  न फेसबुक. हर माध्यम की अपनी एक शक्ति और अपना एक लोक है. अखबार अपने ही लोक में ज़िंदा रह सकता है.  दूसरे माध्यमों के साथ आतंकित होड़ में पड़कर वह अपना इहलोक और परलोक दोनों बिगाड़ने में तुला हो तो क्या किया जाए !

(आशुतोष कुमार की फेसबुक वाल से)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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