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दिल्ली पुलिस : विदाई – आगमन और आधी आबादी

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-वर्तिका नंदा||

दिल्ली के लोधी रोड के स्पेशल सेल के दफ्तर में दिल्ली पुलिस अक्सर आतंकवादियों से पूछताछ करती है। एक समय पर चुस्ती और फुर्ती का आलम यह था कि पत्रकार अक्सर मजाक में स्पेशल सेल के जाइंट कमिश्नर को पुलिस कमिश्नर कहते थे। ये अधिकारी थे- नीरज कुमार। यह माना जाता था कि आतंकवादी नीरज कुमार, अशोक चांद और राजबीर सिंह के नाम से कांपते हैं। यह बात अलग है कि नीरज कुमार के कार्यकाल के अंतिम चरण में यही बात क्रिकेट को लेकर भी की जाने लगी।

वैसे तो एक पुलिस कमिश्नर का जाना और दूसरे का आना, औसत घरों के लिए यह कोई खबर नहीं। वहां कुर्सी का नाम जाना जाता है और अक्सर कुरसी में बैठने वाले का नाम किसी को याद नहीं होता। पर मामले जब बड़े होते हैं तो कुर्सी और नाम – दोनों सार्वजिनक दायरे में चर्चा का केंद्र बन जाते हैं।

चुनावों की पदचाप, नए लेफ्टिनेंट गवर्नर की ताजपोशी, निर्भया, क्रिकेट और बहुत –से सुलझे-अनसुलझे मामलों के बीच नए कमिश्नर का आना खबर तो है ही और साथ ही मौका एक रिपोर्ट कार्ड को तैयार करने का भी है।neeraj-kumar

नीरज कुमार दिल्ली के 18वें पुलिस कमिश्नर हैं। अपने पूर्ववर्ती तमाम कमिश्नरों की तुलना में वे मीडिया स्कैनर के नीचे सबसे ज्यादा रहे। वजह कभी उनका अतिरेक संवाद तो कभी अतिरेक चुप्पी रही और कभी गलत समय पर गलत मुस्कान।

पर नीरज कुमार कई बातों के लिए याद किए जाते रहेंगें। 1976 बैच के यूटी काडर के अधिकारी नीरज कुमार का ट्रैक रिकार्ड बेहद शानदार रहा है। सीबीआई और बाद में तिहाड़ जेल की जिम्मेदारियों के निर्वाह के बाद बने वे दिल्ली के पुलिस कमिश्नर। उनके साथ 1992 और 1999 में उन्हें मिले राष्ट्रपति पुलिस मेडल की चमक भी साथ चल कर आई। तिहाड़ के कैदियों ने उनके पढ़ो-पढ़ाओ के अभियान के प्रति आभार के साथ उन्हें विदाई दी पर कमिश्नर का पद कांटों का पहाड़ साथ लेकर आया।

bassiभले ही हाल की मैच फिक्सिंग और दीपक भारद्वाज की हत्या के मामले के सुलझने से इज्जत बच गई हो लेकिन बाइकर पर गोली चलने से लेकर अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल के धरने और बाद में रामदेव का सलवार पहन कर रामलीला मैदान से भागना दिल्ली पुलिस पर बेसुरी सीटियां बजाने में सफल रहा। बाकी कसर निर्भया मामले से पूरी हुई। पहले एक दिलदहलाती त्रासदी, फिर पुलिस की नाकामी के तमाम सुबूत दक्षिण दिल्ली की डीसीपी की बेहद लापरवाह प्रेस कांफ्रेंस, और उसके बाद विरोध करते युवाओं पर आंसू गैस, लाठी चार्ज और पानी की बौछारें। तब युवा पुलिस पर सिक्के और चूड़ियां फेंकने लगते हैं। दक्षिण दिल्ली की डीसीपी पर जनता के आक्रोश के फूटने के बावजूद उनकी रवानगी चार महीने बाद की गई।

पर यह बात बेहद हैरानी की रही कि दो होनहार बेटियों के पिता होने के बावजूद वे दिल्ली की महिलाओं के लिए ऐसा कुछ भी न कर सके जिससे पुलिस के मानवीय होने पर कोई भरोसा जगता। दिल्ली का नानकपुरा थाना उनके रहते जैसे अनाथ ही बना रहा। बड़ी मुश्किल से इस महीने दो आला अधिकारियों को यहां का अतिरिक्त प्रभार दिया गया। उनके रहते पुलिस की छवि में नर्माहट का पुट नहीं दिखा। दिसंबर की कड़कती सर्दी में पुलिस की लाठियों और पानी की बौछारों को सहते युवाओं की तस्वीरों ने नीरज कुमार के नेतृत्व में पुलिस की छवि को खलनायक सरीखा बना दिया। उधर चौबीसों घंटों की अनचाही तैनाती और गिरफ्तारी को लेकर लंबे कागजी पुलिंदों की जरूरत के आदेश ने उन्हें अपने ही विभाग में अनचाहा बना दिया। तुरत-फुरत में जेंडर सेंसिविटी पर करवाए गए कोर्स भी कोई बदलाव न ला सके क्योंकि इसके बावजूद जनवरी-मार्च 2013 में ही दिल्ली में अकेले बलात्कार के 393 मामले दर्ज हुए। उनके बारे में माना गया कि वे कार्रवाई करने में खासी देरी लगाते रहे और अपने राज्य विशेष के लिए ज्यादा नर्म बने रहे।

लेकिन इसके बावजूद नीरज कुमार एक ऐसे पुलिस कमिश्नर के तौर पर याद किए जाएंगें जिनके दौर में पुलिस अपने शीर्ष पर भी पहुंची और शीर्षासन पर भी।

अब जबकि उनका नाम सीपी की तख्ती पर दर्ज होगा, वे प्रकाश झा के साथ मिलकर कुछ फिल्मी प्रयोग करने जा रहे हैं। उनके पास व्यापक अनुभव और दृष्टि है। यह देखना दिलचस्प होगा कि रियल से निकल कर रील की लाइफ में वे पुलिस की छवि में कितनी मुस्कान भर पाते हैं।

भीम सेन बस्सी अब नए पुलिस कमिश्नर होंगे। उन पर सबसे ज्यादा आंखें उन महिलाओं की होंगी जो खुद को असुरक्षा के घेरे में पाती हैं। महिलाएं भले ही किसी राजनीतिक दल के एजेंडे में नहीं हैं पर वे आधी आबादी हैं और आधा गिलास इतना भी आधा नहीं होता।

(वर्तिका नंदा की फेसबुक वाल से)

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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