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हजारों क्रान्तिकारी आज भी “षड्यंत्रकारी” हैं स्वतंत्र भारत के सरकारी दस्तावेजों में…

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भगत सिंह, राज गुरु, सुखदेव, अशफाकुल्लाह खान, राम प्रसाद बिस्मिल जैसे हजारों क्रान्तिकारी आज भी “षड्यंत्रकारी” ही हैं आज़ाद भारत के सरकारी दस्तावेजों में: धन्य है भारत की न्यायिक व्यवस्था और धन्यवाद के पात्र हैं भारत के लोग …

क्या बिडम्बना है स्वतंत्र भारत में मातृभूमि की सुरक्षा, शांति व्यवस्था को नेस्त्नाबुद करने बाला अपराधी मसलन अफज़ल गुरु, कसाब भी भारतीय दण्ड संहिता में “कन्स्पिरेटर” है, और भारत को स्वतंत्र करने में अपने जीवन की बलि देने वाले स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी भी “कन्स्पिरेटर”? आखिर भारतीय दंड संहिता तो अंग्रेजी हुकूमत के दौरान ही बनी थी, उनके हित के लिए. आज तो हम स्वतंत्र हैं. आज तो इन क्रांतिकारियों का नाम भारत के न्यायिक प्रणाली और सरकारी दस्तावेजों में एक “षड्यंत्रकारी के रूप में लिखा नहीं होना चाहिए. क्या कहते हैं आप?

 

-शिवनाथ झा||

भारत को आजाद हुए सरसठ साल हो रहे हैं. कुछ दिन बाद १५ अगस्त को हम “जश्न” भी मनाएंगे. भाषण भी सुनेंगे. तालियाँ भी बजायेंगे और घर आकर फिर २६ जनबरी २०१४ का इंतज़ार करना शुरू कर देंगे. पिछले सरसठ वर्षों से यही तो करते आये हैं, भविष्य में भी करते रहेंगे.MARTYRS Illustration

लेकिन कभी सोचा है कि जिन क्रांतिकारियों और शहीदों ने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी, स्वतंत्र भारत की दंड संहिता या न्यायिक व्यवस्था से जुड़े सभी कानूनों के अधीन आज भी “कन्स्पिरेटर” ही हैं – व्यवस्था के खिलाफ, शासन के खिलाफ, सरकार के खिलाफ बगावत करने वाला. चाहे भगत सिंह हो, या राजगुरु, या सुखदेव, या बटुकेश्वर दत्त या अशफाकुल्लाह खान. आपने कभी सोचा हैं?

यदि भारतीय दंड संहिता (आई.पी.सी.) की उत्पत्ति पर ध्यान दें तो देख जाता है की मुग़ल शासन काल में हिन्दू अधिनियमों को लागु करने के लिए “शरिया” की व्यवस्था थी. मुग़ल साम्राज्य के पतन और अंग्रेजी हुकूमत के भारतीय जमीं पर अभ्युदय के साथ ही अंग्रेजी अपराध कानून हावी होने लगा. इस्लामिक कानून व्यवस्था ने भारतीय सब-कंटीनेंट में अंग्रेजी कानून व्यवस्था को मजबूत करने में बहुत हद तक मदद की. सन १८६० के पहले तक अंग्रेजी कानून व्यवस्था में बहुत सारे परिवर्तन किये गए जिसे बम्बई, कलकत्ता और मद्रास प्रेसिडेंसी-शहरों के माध्यम से लागु किया जाता था.

भारतीय दंड संहिता बनने की प्रक्रिया थॉमस बबिन्ग्तन मेकॉले की अध्यक्षता में फर्स्ट लॉ कमीशन के साथ हुआ. इस कानून में नेपोलिअनिक कोड और एडवर्ड लिविंग्स्टन सिविल कोड, १८२५ को भी मद्दे नजर रखा गया. भारतीय दंड संहिता का पहला फाइनल ड्राफ्ट सन १८३७ में तत्कालीन गवर्नर-जेनेरल ऑफ़ इंडिया को प्रस्तुत किया गया. इस ड्राफ्ट में पुनः संसोधन किये गए और १८५० में इसे पूरा कर लिया गया. छह साल बाद सन १८५६ में इसे लेजिस्लेटिव अस्सेम्ब्ली में प्रस्तुत किया गया. लेकिन यह क्रियान्वित उस समय तक नहीं हो पाया जबतक भारत का प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन का बिगुल १८५७ में नहीं बजा.

क्रियान्वित होने के पहले तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत को इस नियमो से कोई हानि न हो और भारतीय सब-कंटीनेंट में उनका वर्चस्व कायम रहे, इन नियमों को बार्नेस पिकोक की नज़रों से गुजरना पड़ा था. बार्नेस पिकोक को बाद में कलकत्ता उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश भी बनाया गया. अंत में ६ अक्तूबर, १८६० को यह नियम लेजिस्लेटिव असेंबली से पास हुआ और पहली जनवरी १८६२ से लागु हुआ.

क्रियान्वयन के समय भारतीय दंड संहिता को २३ अध्याय में विभाजित किया गया, जिसमे ५११ सेक्शन बनाये गए – जिसमे अन्यान्य प्रकार के अपराधों के दंड प्रक्रियाओं को दर्शाया गया.

इन नियमों को बृहत् पैमाने पर तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य में बर्मा से लेकर श्री लंका, मलेशिया, सिंगापुर आदि प्रान्तों में भी लागु किया गया.

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इन्ही नियमो को पाकिस्तान ने भी अख्तियार किया, पाकिस्तान पैनल कोड के रूप में. बाद में बंगलादेश में भी प्रचलित हुआ.

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारतीय दंड संहिता में अनेकों बार अमेंडमेंटस किये गए चाहे महिलाओं पर अत्याचार से सम्बंधित दंड का मामला हो या अन्य. देश में सशक्त कानून व्यवस्था के लिए जब तब २० लॉ कमीशन भी बने जिन्होंने विभिन्न मुद्दों पर भारत सरकार को अपनी-अपनी सिफरिशें भी दी, सरकार ने उन सिफारिशों के मद्दे नजर कानूनों में परिवर्तन भी किये.

परन्तु, किसी ने भी इस बात की ओर ध्यान नहीं दिया, या यूँ कहें, देना उचित नहीं समझा कि “अंग्रेजी हुकूमत के दौरान भारत में जो कानून भारतीय क्रांतिकारियों पर लगा और उसके तहत उसे दण्डित किया गया – मसलन क्रांतिकारियों के विरुद्ध सरकार के विरुद्ध कांस्पीरेसी का मामला लें – वह तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत और अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध था जो भारत-भूमि पर राज्य कर रहे थे. इन क्रांतिकारियों का दोष यह था कि वे सभी अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए विभिन्न प्रकार के तरीके अपना रहे थे – जो तत्कालीन व्यवस्था के अनुकूल नहीं थे.

 

उन्ही नियमों के अनुरूप हजारों क्रातिकारियों को सजा मिली. जेल की यातनाएं दी गयीं. सैकड़ों फांसी पर लटकाए गए. परन्तु सभी अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे, यातनाएं सह रहे थे, फांसी पर लटक रहे थे.

लेकिन आज तो देश स्वतंत्र है. आज “अफज़ल गुरु, कसाब को भी उसी भारतीय दंड संहिता के तहत दण्डित किया गया, जिसके तहत मंगल पाण्डेय, तात्या टोपे, ठाकुर दुर्गा सिंह, उधम सिंह, भगत सिंह, राज गुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, अशफाकुल्लाह खान, बसंत बिस्वास, खुदीराम बोस, मदनलाल ढींगरा, जतिंद्र नाथ दास, मास्टर आमिर चंद, अवध बिहारी, बैकुंठ शुक्ल, राम प्रसाद बिस्मिल, बाजी राउत, सूर्य सेन, अब्दुल कादिर, अरूर सिंह, बलबंत सिंह, बाबु हरनाम सिंह, मीर अली, डॉ अरूर सिंह, हरनाम सिंह फतेहगढ़, ठाकुर रौशन सिंह, मेवा सिंह जैसे सैकड़ों-हजारों क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर लटकाए गए.”

मैं कोई विधि-ज्ञाता, विधि-विशेषज्ञ नहीं हूँ. भारत का एक नागरिक हूँ और अपनी मातृभूमि से बेहद प्यार करता हूँ. स्वतंत्रता संग्राम के गुमनाम शहीदों, गुमनाम क्रांतिकारियों के वंशजों को ढूंढ़ता फिर रहा हूँ. इसी देश में जिसके लिए उनके पुरुखों ने अपनी-अपनी शहादत दी. आज उनके वंशज, उनके परिवार, उनके खून की निशानी भारत के सड़कों पर दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं, कुछ भीख भी मांग रहे हैं, घुट-घुट कर जी रहे हैं, तिल-तिल कर मर रहे हैं.

मुझे इतना जानने का अधिकार तो अवश्य है (क्योकि मैं अपने कर्तव्य का निर्वाह भली-भांति कर रहा हूँ) कि क्या इन क्रांतिकारियों और अफज़ल गुरु या फिर कसाब में कुछ तो अंतर है? उनके क्रिया-कलापों में कुछ तो भिन्नता है? कानून की नजर में दोनों एक समान कैसे हो सकते हैं और वह भी १५१ साल पुराना कानून, जिसे अंग्रेजों ने अपने हित के लिए १८५७ का गदर कुचलने के लिए बनाया था?

सन १९४७ में भारत में लोगों की संख्या महज २७ करोड़ थी. आज १३० करोड़ से भी अधिक हैं. क्या इन १३० करोड़ लोगों के दिलों में अपने स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों के लिए कोई स्नेह नहीं है? क्या उनकी नजर में वे वैसे ही दोषी हैं जैसे अफज़ल गुरु या कसाब ?

यदि नहीं, तो भारत की अवाम को सरकार से कहना चाहिए कि वे “स्वतंत्रता संग्राम के सभी क्रांतिकारियों, शहीदों को जिन नियमों और संहिता के अधीन दण्डित किया गया था, उनमे उनके विरुद्ध इस्तेमाल किये गए “कांस्पीरेसी” शब्द को “निरस्त” करे. शायद यह बहुत बड़ा सम्मान होगा, बहुत बड़ी श्रद्धांजलि होगी उन शहीदों के प्रति.”

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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