‘बख्शी का तालाब’ एक धरोहर, रक्षा कौन करेगा ?

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-संजोग वाल्टर||

लखनऊ  से 18  किलोमीटर दूर है ‘बख्शी का तालाब’ जो नेशनल हाई 24 पर है,‘बख्शी का तालाब’ में वायुसेना स्टेशन है- ‘‘बख्शी का तालाब’ से कुछ किलोमीटर की दूरी पर  माँ चंद्रिका देवी का मंदिर ‘कठवारा’ में है  ललिता  देवी मंदिर ‘सोनवा’ में ब्रहम बड़ा मंदिर ‘नागुवामा’ और  ठाकुरद्वारा ‘बख्शी का तालाब’ में  मौजूद हैं आज ‘बख्शी का तालाब’ विधान सभा क्षेत्र है 2007 के विधान सभा  चुनाव तक यह इलाका महोना विधान सभा इलाके के नाम से जाना जाता था. 2012 से ‘‘बख्शी का तालाब’ के नाम से विधान सभा क्षेत्र है‘ बख्शी का तालाब’ उत्तर प्रदेश  की सबसे छोटी तहसील और सबसे बड़े ब्लाक के लिए भी जाना जाता हैं, यहाँ तालाब का निर्माण 1226 हिजरी यानि सन 1805 में तत्कालीन अवध के राजा नवाब त्रिपुर चन्द्र बख्शी पुत्र मजलिस राम तालाब ने शुरू कराया था बख्शी जी ने भव्य तालाब  के साथ साथ श्री बांके बिहारी, मंदिर एवम शिव मंदिर का भी निर्माण कराया था जोकि उस समय की नायाब वास्तुकला की झलक है, तालाब, मंदिर व बारादरियों की तामीर 1236 हिजरी यानी सन 1815 में पूरा हुआ निर्माण. इस निर्माण पर उस वक्त तीन करोड़ 56 लाख रूपये चांदी के खर्च हुए थे.BKT

इस तामीर के बाद इस गुमनाम जगह को नाम मिला ‘बख्शी का तालाब’ जो आज भी कायम है कहा जाता है कि बख्शी जी ने अवध के चौथे बादशाह नवाब अमजद अली शाह (17 मई  1842 से 13 फरवरी 1847) को बताये बिना तलाब की तामीर कराई थी लिहाज़ा वो नाराज़ हो गये थे यह नाराज़गी राजा त्रिपुर चन्द्र बख्शी को मंहगी पड़ी बादशाह नवाब अमज़द अली शाह की फौज ने राजा त्रिपुर चन्द्र बख्शी पर हमला कर दिया तब ब्राहम्ण सेना ने पंडित जगन्नाथ शुक्ला की कयादत में शाही फौज का सामना किया था राजा त्रिपुर चन्द्र बख्शी भूमिगत हो गये और वो अपने गुरु महाराज के पास वृन्दावन पहुँच गये और अपने गुरु बंशी लाल महाराज को यह तालाब दान कर दिया श्री बाके बिहारी मंदिर का जी उन्ही के वंशज सरन बिहारी गोस्वामी ने करवाया जबकी शिव मंदिर का काया कल्प सन 1998-1999 में गाय वाले बाबा ने कराया.

1997 में सूबे के तब के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने तालाब के लिए 20 लाख रूपये दिए साल 2001 में का काम शुरू हुआ वक्त बीत गया कई सरकारें बदली विधायक भी बदले पर थोडा बहुत बदलाव होता रहा, आज भी बख्शी का तालाब को इंतज़ार है पूरी तरह से बदलाव का, इस खूबसूरत प्राचीन विरासत की संरचना तालाब के साथ चार पक्षों और आठ ऐतिहासिक  घाटों पर आधारित है, इसके अलावा, आप दो कृष्ण और शिव मंदिर तालाब परिसर पर स्थित देख सकते हैं.

इस धरोहर को कायम रखने की योजना अभी तक नहीं बनी है वही मुकामी लोग भी  पीछे नहीं हैं. ‘बख्शी का तालाब’ और उसके  आसपास नाजायज कब्जों की बाढ़ सी आ गयी है. इतना ही काफी नहीं था बल्कि यहाँ हर साल होने वाली अवध की गंगा जमुनी  तहज़ीब की मिसाल  रामलीला जिसमें ज्यादातर मुस्लिम किरदार हुआ करते थे जो धन की कमी और स्थानीय राजनीति के चलते  बंद हो गयी.

अगर यही हाल रहा तो  इस धरोहर की रक्षा कौन करेगा?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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