जमीन का पता नहीं, जोरू के लिए लड़ाई..

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 स्वतंत्रता के पश्चात् बदलती परिस्थितियों में अगर भारत में किसी क्षेत्र का सबसे अधिक, बार-बार बलात्कार हुआ तो वह है शिक्षा का क्षेत्र, सोच का क्षेत्र, शोध का क्षेत्र. इसके लिए सिर्फ व्यवस्था को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता हैं. सच तो यह है की आजादी के बाद देश को सबसे अधिक खतरा, विशेषकर शिक्षा के क्षेत्र में, नए-नए अवतरित हुए शिक्षाविदों से रहा, विदुषियों से रहा.

 

-शिवनाथ झा||

भारत को स्वतंत्र हुए महज सरसठ साल बीत रहे हैं. अगर नियमों, कानूनों की बात करें तो शायद आज भी हम उन्ही नियमों और कानूनों पर चल रहे हैं, जिसे अंग्रेजों ने बनाया था. मसलन आई. पी. सी, , सी आर पी सी , एविडेंस एक्ट इत्यादि. इन बीते सालों में हमने (सरकार) सिर्फ इन नियमों में, कानूनों में सिर्फ उन्ही बातों में संशोधन किया जो हमारे (सरकार) लिए अनुकूल थे. परन्तु, कुछ ऐसी बातें, कुछ ऐसे दस्तावेजों को अनवरत बनाये रखने की परम्परा, को न केवल हमने (सरकार) ने नेस्तनाबुद कर दिया, बल्कि अब वह अब ‘ऐतिहासिक धरोहर’ बन गया.A page from Faizabad Gazeteers

अंग्रेजी हुकूमत के समय भारत के प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक ‘स्पष्ट आदेश था’. यह आदेश न केवल अधिकारियों, बल्कि उस क्षेत्र के विद्वानों और समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों पर भी कुछ हद तक लागु था. समाज के लोगों का भले ही प्रत्यक्ष रूप से  उन नियमो के अनुपालन में भागीदारी नहीं थी, लेकिन उन सबों से इस बात की अपेक्षा जरुर रहती थी की वे इस सरकारी दस्तावेजों के निर्माण में महत्वपूर्ण सहयोग देंगे और वह था भारत के सभी जिलों के गजेटियर्स का निर्माण.

जिला गजेटियर्स एक प्रकार का सरकारी दस्तावेज होता था, जिसमे तत्कालीन जिला प्रमुखों – जिलाधिकारी, कलक्टर, कमिश्नर्स – के लिए यह बाध्य होता था कि वह अपने सेवा-अवधि के दौरान अपने-अपने जिले के सभी प्राक-ऐतिहासिक, ऐतिहासिक, और वर्तमान सूचनाओं को – राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, कृषि, भौगोलिक इत्यादि-इत्यादि – एकत्रित कर जिले के कोषागार में जमा करें.

प्रत्येक दस वर्षों में, जनसँख्या की जांच के समय, उन सभी दस्तावेजों को पुरानी जिला गजेटियर्स में पूर्व से लिखे जा रहे सम्बद्ध विषय में नयी जानकारियों को जोड़ा जाता था, जिससे न केवल वर्तमान, वरन आने वाले समय की पीढ़ियों को सही-सही जानकारी मिल सके.

साठ के दशक के उत्तरार्ध आते-आते यह परंपरा पूर्ण रूप से समाप्त हो गयी. भारत के सभी जिलों के जिला गजेटियर्स को सम्पादित करने वालों में श्रीमती ईशा बसंती, विनोद चन्द्र शर्मा, एन कुमार, पी सी रॉय चौधरी जैसे महान भारतीय सिविल सेवा के अधिकारियों का नाम आज भी अमर है.

पटना स्थित अनुग्रह नारायण सिन्हा संस्थान के एक वयोबृद्ध समाजशात्री का कहना है की “स्वतंत्रता के पश्चात् बदलती परिस्थितियों में अगर भारत में किसी क्षेत्र का सबसे अधिक, बार-बार बलात्कार हुआ तो वह है शिक्षा का क्षेत्र, सोच का क्षेत्र, शोध का क्षेत्र. इसके लिए सिर्फ व्यवस्था को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता हैं. सच तो यह है कि आजादी के बाद देश को सबसे अधिक खतरा, विशेषकर शिक्षा के क्षेत्र में, नए-नए अवतरित हुए शिक्षाविदों से रहा, विदुषियों से रहा. सभी अपने-अपने लिए जिये, अपने-अपने वर्तमान के लिए जिये. किसी ने यह नहीं सोचा कि आने वाली पीढ़ियों को हम क्या देकर जायेंगे?”

भारत में ‘जिला गजेटियर्स’ के निर्माण में पी. सी रॉय चौधरी का जिक्र करते हुए वे कहते हैं: “मेरे पिता उनके साथ पचास के दशक में काम किये थे. मैं उन दिनों सिविल सर्विस की तैयारी कर रहा था. अपने पिता के साथ बहुत बार उनसे मिला भी था. ज्ञान के मामले में, चाहे भारत की भौगोलिक जानकारी हो या प्राचीन इतिहास का, रॉय चौधरी साहेब अपने आप में एक संस्थान थे. हम सभी उन्हें ‘ज्ञान का अशोक स्तम्भ’ कहते थे. आज न तो वैसे अधिकारी हैं, न ही वैसे ज्ञानी व्यक्ति और न ही वैसा सोच रखने वाला व्यक्ति. सभी सरकार के ‘सेवक’ है और नौकरी तक ही उनकी जीवन सीमित भी है.”

भारतीय पुरातत्व विभाग के अनुसार, साठ के दशक के उत्तरार्ध, भारत में इन ‘जिला गजेटियर्स’ के निर्माण का कार्य समाप्त हो गया है. सन १९७० के पूर्वार्ध में भारत के कुछ जिलों में, मसलन राँची, ‘जिला गजेटियर्स’  छपा है, जिसका संपादन बहुत पहले एन. कुमार द्वारा हो चुका था, लेकिन उसके बाद, लगभग यह कार्य ठप हो गया है. इतना ही नहीं, आज भारत के जिलों के ट्रेजरी में काम करने वाले लोग या अधिकारियों को इसके बारे में शायद पता भी नहीं होगा!

बहरहाल, स्वतंत्रता प्राप्ति के बीस साल आते-आते भारत के समाज के अधिकारीगण, विद्वान, विदुषी, नेता, सरकार और अन्य प्रतिष्ठित गणमान्य लोग अपने-अपने कार्यों में इतने व्यस्त हो गए कि इन सरकारी दस्तावेजों को “सुपुर्दे खाक” कर दिया. और यही कारण है कि भारत के किसी भी जिले का गजेटियर्स में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् होने वाले आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, भौगोलिक और अन्य परिवर्तनों का कोई नामो-निशान नहीं है.

भारतीय पुरातत्व विभाग के अधिकारी ने कहा: “यह अलग बात है कि आज के जीवन में इन्टरनेट और गूगल या विकिपीडिया में बहुत सी जानकारी उपलब्ध है. सच तो यही है कि ये सभी इन्ही दस्तावेजों की फोटो-कापी है, लिया हुआ है. आज हमें उस पौराणिक प्रथा को, इस दस्तावेजों को पुनः जीवित करना होगा.

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