कोयला लगाएगा बिजली का करंट…

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-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास||

कोल इंडिया की छह अरब डालर नकदी दांव पर है. भारत सरकार चाहती है कि इस नकदी का इस्तेमाल विदेशों में कोयला क्षेत्र के अधिग्रहण के लिए किया जाये. देश के कोयला क्षेत्रों के विकास या देश में ही कोयला उत्पादन में कोल इंडिया की भूमिका हर संभव तरीके से सीमाबद्ध करना चाहती है सरकार. पूरे कोयला सेक्टर के ही निजीकरण की योजना है. कोल बेस मीथेन गैस के उत्पादन में जिस तरह कोल इंडिया की कोई भूमिका नहीं रह गयी है और ओएनजीसी ने भी हाथ खड़े कर दिये हैं, उसी तरह कोयला उद्योग का हाल होने वाला है. सीबीएम उत्पादन अब पूरी तरह निजी क्षेत्र के हवाले है. अगर आप पेट्रोल, डीज़ल और सिलेंडर के बढ़े दामों से तिलमिलाए हुए हैं, तो इसी कड़ी में अब आगे बिजली का बिल भी काफी बढ़ने वाला है. आयातित कोयले की उच्च लागत का जो भार भारतीय उपभोक्ताओं पर पड़ेगा, उसकी वजह से उन्हें बिजली की प्रति यूनिट के लिए 3 फीसदी और भुगतान करना पड़ेगा. औसतन, भारत में मोटे तौर पर बिजली की लागत प्रति यूनिट 6 रूपए है.coal

जबकि देश में कोयला की मांग ऊर्जा जरुरतों के हिसाब से बेतहाशा शहरीकरण और औद्योगीकरण के साथ साथ लगातार बढ़ती जा रही है. परमाणु बिजली को लेकर अभी विवाद थमा नहीं है. सारे के सारे परमाणु बिजलीघर पूरी क्षमता के साथ चालू हो जाये तो भी वे ताप बिजलीघरों का विकल्प नही बन सकते. सीबीएम से प्राकृतिक गैस का विकल्प निकालना भी टेढ़ी खीर है. बिजलीघरों के अलावा इस्पात उद्योग को भी कोयला चाहिए. बिना कोयला इस्पात संयंत्रों का काम चल नहीं सकता. भारत के आधे से ज्यादा बिजली स्टेशन कोयले से चलते हैं. घटती आपूर्ति की वजह से पिछले तीन सालों से घरेलू ईंधन उत्पादन में कमी का अर्थ हुआ, देश ऊर्जा हेतु लालायित भारतीय बाज़ार में आपूर्ति के लिए आयात पर ज्यादा आश्रित हो रहा है. सरकारी बिजली वितरण कंपनियां उच्च उत्पादन लागत को वहन नहीं कर पाएगीं क्योंकि उन पर पिछले बिलियन डॉलर नुकसान का बोझ है.

“आयातित कोयले की उच्च लागत ग्राहकों के मत्थे मढ़ी जाएगी,” क्रेडिट रेटिंग और शोध एजेसीं, इंडिया रेटिंग एंड रिसर्च के निदेशक सलिल गर्ग ने कहा. दूसरे विश्लेषकों ने कहा कि हालिया हफ्तों में डॉलर के मुकाबले रूपए में गिरावट, कोयले के आयात लागत के बोझ को और बढ़ाएगी, हालांकि पिछले वर्ष कोयले के अंतर्राष्ट्रीय दामों में 12 फीसदी तक की गिरावट देखी गई थी.

Thermal power plant in Bhatinda, Punjabताजा स्थिति यह है कि अकेले ताप बिजलीघरों को सालाना साठ करोड़ टन कोयले की जरुरत होती है. लेकिन आपूर्ति में कमी होने की वजह से बीस फीसद कोयले का यानि करीब 12 करोड़ टन कोयले का आयात किया जाता है. कोयला उत्पादन में कमी 492 टन बतायी जाती है. इन परिस्थितियों में भारत के वित्त प्रबंधन की युक्ति यह है कि कोल इंडिया अपनी छह अरब डालर की नकदी विदेशी कोयला क्षेत्र में खपा दें ताकि कोयला संकट का हल किया जाये. देशी कोयला ब्लाक कोल इंडिया को सौंपने की सरकार की कोई योजना है नहीं. जबकि रुपये में गिरावट की वजह से आयातित कोयले की लागत काफी बढ़ गई है. आयात बिल में बढ़ोतरी न सिर्फ चालू खाते के घाटे का असंतुलन बढ़ाएगा बल्कि राजकोषीय घाटे की स्थिति को भी कमजोर करेगा.  सरकार ने हाल ही में ऊर्जा कंपनियों को महंगे आयातित कोयले की लागत को आगे बिजली वितरण कंपनियों की तरफ सरकाने की स्वीकृति दे दी है, जिसके फलस्वरूप बिजली वितरण कंपनियां उपभोक्ताओं से ज्यादा लागत वसूलेगीं. निश्चित तौर पर आने वाले महीनों में बिजली के दाम बढ़ सकते हैं.

1976 में राष्ट्रीयकरण के बाद कोयला उत्पादन और कोयला कारोबार में कोल इंडिया का  एकछत्र एकाधिकार रहा है, सरकार उसे तोड़ने के लिए कोयला नियामक बनाने के अलावा हर संभव तिकड़म लगा रही है.

दुनिया की सबसे बड़ी कोयला कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) की अपनी प्रमुख खानों में अगले साल मार्च तक जीपीएस आधारित प्रणाली लगाने की योजना है ताकि कोयले की ढुलाई पर निगरानी रखी जा सके.

कोयला मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा है कि कोल इंडिया लिमिटेड 31 मार्च 2014 तक कोयले की ढुलाई पर निगरानी के लिए जीपीएस प्रणाली स्थापित कर सकती है. उन्होंने कहा कि यह प्रणाली लगाने के लिए निविदा जारी कर दी गई है. सूत्रों ने कहा कि कोयला मंत्रालय से प्रोत्साहन पाकर कंपनी ने अपनी सभी प्रमुख खानों में यह प्रणाली लगाने का विचार किया है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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  1. जनता चैन से रोटी क्यों खाए,हालाँकि वह भी नसीब है नहीं,सरकार चाहती है कि वह अध्भुखी रहे ताकि उसे अन्य विषयों पर सोचने का मौका ही न मिले फिर न कोई विरोध होगा न कुछ और.कुछ को मुफ्त अनाज बाँट कर बी पी एलके नाम पर छूट दे कर कहीं प्रधान मंत्री के नाम पर कहीं मुख्य मंत्री का नाम पर,राजीवगांधी के नाम पर जनता कि कमी का पैसा बनते रखो और लोगों को काम चोर निकम्मा नाकारा बनाये रखो.यह उप्पेर माल जीमेंगे व जनता कभी बिजली,कभी पेट्रोल डीजल की महंगाई कि मार खाती रहेगी.चुनाव के बाद चार साल कोई सूद रहेगी नहीं सिवाय घोटालों के,5 वे साल फिर खाद्य सुरक्षा मनरेगा जैसी योजना लाकर जनता को राजी कर देगी वह भी वोट बैंक के खातिर.

  2. जनता चैन से रोटी क्यों खाए,हालाँकि वह भी नसीब है नहीं,सरकार चाहती है कि वह अध्भुखी रहे ताकि उसे अन्य विषयों पर सोचने का मौका ही न मिले फिर न कोई विरोध होगा न कुछ और.कुछ को मुफ्त अनाज बाँट कर बी पी एलके नाम पर छूट दे कर कहीं प्रधान मंत्री के नाम पर कहीं मुख्य मंत्री का नाम पर,राजीवगांधी के नाम पर जनता कि कमी का पैसा बनते रखो और लोगों को काम चोर निकम्मा नाकारा बनाये रखो.यह उप्पेर माल जीमेंगे व जनता कभी बिजली,कभी पेट्रोल डीजल की महंगाई कि मार खाती रहेगी.चुनाव के बाद चार साल कोई सूद रहेगी नहीं सिवाय घोटालों के, 5 वे साल फिर खाद्य सुरक्षा मनरेगा जैसी योजना लाकर जनता को राजी कर देगी वह भी वोट बैंक के खातिर.

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