क्या इसीलिए कांग्रेस को तोड़ डालना चाहते थे महात्मा गांधी..?

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– अजीत कुमार पांडेय ।।

मेरे दिमाग में बस एक ही सवाल घर किए जा रहा है कि हिन्दुस्तान के राजनेता सांसद या विधायक बनने के बाद उन्हीं पांच सालों में ऐसा कौन-सा धंधा कर डालते हैं जिसकी बदौलत उनकी संपत्ति एक लाख से कुलांचे मारकर एक लाख करोड़ या अरब तक पहुंच जाती है और किसान दिन रात एक कर खेतों में खून तक बहा डालता है मगर शाम भोजन मिलेगा भी इस बात की गारंटी वह खुद भी नहीं ले सकता। मैं आज उन महानुभावों से करबद्घ निवेदन करना चाहता हूं कि अपना यह नुस्खा या आलादीन के चिराग के बारे में एक बार अपने देश की जनता को क्यों नहीं बता देते ताकि जनता भी सुख चैन से जीवन बिता सके।

आज वही कांग्रेस पार्टी देश पर राज कर रही है जिसके चेहरा सदियों से काला है, जिसके मन में चोर बसा है तब के कांग्रेस पार्टी में और अब में बस केवल मामूली अन्तर है। समझने की बात है कि जिस महात्मा गांधी की समाधि पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह फूल चढ़ाने के बाद 15 अगस्त 2011 को लालकिले की प्राचीर से तिरंगा फहराए हैं उन्हीं बापू को कांगेसियों ने खून के आंसू रुलाया है। मैं माननीय प्रधानमंत्री जी सवाल करना चाहता हूं कि पिछले आठ सालों से वे लगातार देश के प्रधानमंत्री हैं उन्होंने देश की गरीब जनता के लिए क्या किया और उससे कितने फीसदी गरीबी कम हुई है?

आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले आठ सालों में केवल और केवल भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा मिला है आपकी सरकार ने इन भ्रष्टï लोगों को खुला संरक्षण प्रदान करने का काम किया है। आपकी सरकार के सारे दावे और वादे झूठे निकल रहे हैं। आखिर कांगेसी भ्रष्टïाचारियों से गांधी जी इतना क्यों परेशान हो गए।
देश आजाद हुआ नहीं था और 1937 की पहली अंतरिम सरकार में कांग्रेसियों के भ्रष्टाचार से महात्मा गांधी इतना उकता गए थे कि उन्हें कहना पड़ा था कि ‘मेरा बस चले तो मैं पार्टी को हमेशा के लिए दफना दूं ताकि न रहे बांस न बजे बांसुरी।

आजादी के बाद भी भ्रष्टाचार का ये सिलसिला अब तक रुका नहीं। सरकारी तंत्र को चुस्त दुरूस्त बनाने के लिए गोरवाला कमेटी का 1950 में गठन हुआ। सरकारी भ्रष्टाचार को लेकर उन्होंने जो अपनी रिपोर्ट में कहा वो दिलचस्प है। नेहरू के कुछ साथी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं और यह सबको पता है। इतना ही नहीं बल्कि एक अफसर ने पूछे जाने पर ये भी बताया कि सरकार ऐसे भ्रष्ट मंत्रियों को बचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती। साठ के दशक में संथानम कमेटी ने लगभग ऐलान कर दिया था कि लोकतंत्र की तरह भ्रष्टाचार भी इस देश में अपनी जड़ें जमा चुका है।

संथानम कमेटी ने कहा कि अब ये आम धारणा बन चुकी है कि मंत्रियों से सत्यनिष्ठा और ईमानदारी की उम्मीद रखना छलावा है। पिछले सोलह सालों से जो मंत्री बने हुए हैं उन्होंने भ्रष्टाचार के रास्ते अपने और अपने परिवार के लिए सारी सुख सुविधाओं और अच्छी नौकरियों का इंतजाम कर लिया है। जो लोग पब्लिक लाइफ में शुचिता की बात करते हैं उन्हे ऐसे मंत्री मुंह चिढ़ाते हैं।

भारत के इतिहास में लोकशाही के साथ इससे बड़ा मजाक हो ही नहीं सकता कि भ्रष्टाचार के आरोप में चार्जशीटेड एक उच्चाधिकारी को भ्रष्टाचार निरोधक कमीशन की बागडोर थमा दी जाए, लेकिन विवादित पूर्व सीवीसी पीजे थामस को कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में नियुक्त किया गया। यही नहीं जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो केन्द्र सरकार थामस की ही पैरवी करती दिखाई दी। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी के पद पर थामस की नियुक्ति को रद्द करार देकर भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में जनता की आस्था को जिंदा रखा है।

ब्यूरोक्रेसी में भ्रष्टाचार को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला एक नजीर बन सकता है, परन्तु भ्रष्टाचार के कैंसर को खत्म करने की जंग यहां खत्म नहीं बल्कि शुरू होती है। अब एक और मिसाल लीजिए। सालों से लटके उच्च पदों पर व्याप्त भ्रष्टाचार निरोधक लोकपाल बिल को भी वही राजनेता और अधिकारी वर्ग ड्राफ्ट कर रहा है जिन पर इसके गंभीर आरोप लगते रहे हैं। सरकार की सिफारिश मानें तो जिसकी लाठी उसी की भैंस के तर्ज पर लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति भी राजनेता ही करेंगे। लोकतंत्र के साथ एक और भद्दा मजाक। इसलिए लोकपाल बिल को लेकर मशहूर समाजसेवी अन्ना हजारे ने 16 अगस्त से बेमियादी अनशन करने की ठान ली है। ये स्वतंत्रता आंदोलन की दूसरी लड़ाई है। मैं शहादत के लिए भी तैयार हूं। ये कहते हुए अन्ना हजारे ने देशवासियों से उनकी इस मुहिम में साथ देने की अपील की।

अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और स्वामी अग्निवेश ने सिविल सोसाइटी की मदद से एक वैकल्पिक लोकपाल बिल बनाया है। इसे उन्होंने ‘जन लोकपाल बिल’ का नाम दिया है। इसमें उन्होंने लोकपाल को स्वतंत्र संस्था के रूप में बनाए जाने की सिफारिश की है। जिसमें सीबीआई और सीवीसी के अधिकारों को भी लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में लाए जाने की सिफारिश है। ये संस्था एक समय सीमा के भीतर भ्रष्टाचार के मामले की जांच पूरी करेगी और उस पर सुनवाई कर दोषियों को सजा देगी। इस तरह के कई महत्वपूर्ण संशोधनों के साथ इस बिल की रूपरेखा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भेजी जा चुकी है, लेकिन प्रधानमंत्री की चुप्पी अन्ना को महात्मा गांधी की तर्ज पर जन आंदोलन छेडऩे को मजबूर कर रही।

जितने ठोस इन कमेटियों के सुझाव होते उतने ही पुरजोर तरीके से भ्रष्टाचार कुलांचे भरता किसी न किसी भी नेता, मंत्री या मुख्यमंत्री के पिटारे से बाहर निकलता और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मुंह चिढ़ाता। इसलिए कृष्णा मेनन का जीप स्कैंडल हो या पंजाब के पहले मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप। टीटी कृष्णमाचारी, बोफोर्स, फेयरफैक्स, जेएमएम घूस कांड, हवाला कांड, जयललिता, लालू यादव और सुखराम के रास्ते ये फिलहाल राडिया, राजा, रेड्डी ब्रदर्स और येदुरप्पा पर आकर थमा नहीं है। बदलें है तो बस चेहरे, कार्पोरेट और राजनीति की अंदरूनी केमेस्ट्री। भ्रष्टाचार की राशि में कई सिफर और जुड़ गए हैं।

लेकिन वो मिलियन डॉलर का सवाल जस का तस खड़ा है। भ्रष्टाचार पर काबू कैसे पाया जाए। अब तो सिस्टम भी सौगात में भ्रष्ट सीवीसी भी साथ देता है। क्या भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए बने कानून अपनी धार खो चुके हैं। या तो कानून इतने लुंज-पुंज हैं कि नेताओं और भ्रष्ट अफसरों को उसका दुरुपयोग करना आता है और उससे बच निकलने के नुस्खे भी। इस देश में भ्रष्टाचार के आरोप में आम आदमी हवालात पहुंचता है और नेता संसद/विधान सभा में। क्योंकि एक घूसखोर नेता के सामने कानून भी असहाय दिखता है। एक भ्रष्ट जज के खिलाफ भी बुनियादी कानूनी कार्रवाई तक में दर्जनों बाधा है। इसलिए लोकपाल बिल पर सरकार इतने सालों से कुंडली मार कर बैठी है। क्योंकि अगर लोकपाल बिल वैसा बनाया गया जैसा जनता चाहती है तब भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों को कानून की बारीकियों के साथ-साथ जेल मैन्यूअल भी रटना पड़ सकता है।

लेकिन अब सवाल ये उठता है कि जिस फ्रंट पर महात्मा गांधी कामयाब नहीं हुए क्या अन्ना हजारे कामयाब होंगे। क्या ये देश भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टालरेंस जोन बनेगा। अगर एक अरब से अधिक के इस देश में एक फीसदी युवा भी अन्ना की मुहिम के साथ जुड़ जाते हैं तो नतीजा अच्छा ही निकलेगा। ये तो पहला पड़ाव होगा। इस उम्मीद में कि ये जीत दूसरे पुरजोर कानून बनाए जाने के लिए रास्ता खोलेगी। इस सपने को पूरा करने की जिम्मेदारी जितनी अन्ना हजारे की है उतनी ही शायद समाज के हर उस शख्स की जो भ्रष्ट व्यवस्था के मकडज़ाल से निकलकर खुली हवा में सांस लेना चाहता है।

यह सत्य है कि देश को आज एक महात्मा गांधी की जरुरत थी जिसकी भरपाई अन्ना हजारे ने पूरी की है। उस समय की ऐसी परिस्थिति रही होगी जिसके चलते महात्मा गांधी भ्रष्टïाचारियों के विरुद्घ विगुल नहीं बजा पाए। क्या अंदाजा लगा सकते हैं कि इन कांगे्रसियों के पास जनता के लूट का कितना पैसा विदेशी बैंकों में जमा है। 64 सालों से आम जनता की गाढ़ी कमाई अफसरान को आगे कर लूट रहे हैं। ऐसे में आम जन समूह को आगे आना होगा तभी इस देश और समाज का कल्याण होगा और जनता की जीत ही दूसरी आजादी के जश्न का समय होगा।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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2 thoughts on “क्या इसीलिए कांग्रेस को तोड़ डालना चाहते थे महात्मा गांधी..?

  1. कोंग्रेस और भ्रस्टाचार में चोली दामन का साथ रहा है . भ्रस्टाचार के साथ साथ महगाई बढाने के सारे नुस्खे भी कोंग्रेस के पास शुरू से ही रहे हैं.चाहे वह राशनिंग के सहारे हो या पेट्रोलियम पदार्थो के दाम बढाने के माध्यम से अब समय आ गया है की कोंग्रेसिओ या तो संभल जाना चाहिए या देशहित में सत्ता छोड़ देनी चाहिए.

  2. कांग्रेस ने अपने शासन काल में भर्ष्टाचार को खूब बढ़ावा दिया , आज हम जो कुछ भी देख रहे है वह सब कांग्रेस की देन है . केंद्र में सबसे लम्बे समय उसने हुकूमत किया है. इसलिए भ्रटाचार के लिए कांग्रेस और उसके लीडर ही जिम्मेदार है कोई और दूसरा नहीं.

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