भारत के गांवों से अब भी अछूता मीडिया!

admin 1
0 0
Read Time:18 Minute, 10 Second

-संजय कुमार ||

जनसंचार के उपलब्ध माध्यमों में रेडियो, टेलिविजन, सिनेमा, समाचार पत्र, प्रकाशन, विज्ञापन, लोक नृत्य, नाटक, कठपुतलियां आदि उदीयमान भारत या यों कहे विकासशील भारत को और उदीयमान या विकासशील बनाने में अहम् भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन इसे पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता है। जनसंचार के माध्यम केवल शहरों तक ही सीमित हैं रेडियो को छोड़ दिया जाए तो किसी अन्य माध्यम की पहुंच भारतीय गांवों तक नहीं के बराबर है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान प्रकाशित पत्र-पत्रिकाए क्रांतिकारी बातें/सेनानियों के विचार आदि को छापते थे। इसे देश भर में आजादी के परवाने शहर-गांवों में जा जा कर लोगों को पढ़ कर गोलबंद करने का काम किया करते थे। आजादी के बाद भारत के विकास की बात उठी, जो मीडिया अंगे्रजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाती थी उनके कंधों पर राष्ट्र के विकास की बागडोर आयी। लोगों को एक बार फिर मीडिया ने राष्ट्र के विकास में योगदान के लिए गोलबंद करने का काम शुरू किया। सरकारी मीडिया ने अपने तरीके से तो, निजी मीडिया ने अपने तरीके से काम किया। सरकार ने शहरों के साथ-साथ गांवों पर फोकस किया तो निजी मीडिया ने खासकर प्रिंट मीडिया ने अपने को शहरों तक ही रखा।

लोकतांत्रिक देश भारत में अशिक्षित लोगों की संख्या बहुत ही ज्यादा है और उन्हें शिक्षित करने या फिर उन तक देश-दुनिया की बातों को या फिर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने में मीडिया की भूमिका आजादी के पहले और आजादी के बाद रही, बल्कि आज भी अहम् है। देखा जाए तो विकासशील देश को और विकसित बनाने में कई विषयों पर ध्यान केन्द्रित किया जाता रहा है। चूंकि रेडियो प्रसारण विकासशील देशों में काफी महत्व रखता है। ऐसे में यूनेस्को ने वर्षों पूर्व अपनी रिपोर्ट में साफ-साफ कहा था कि हर पांच व्यक्ति पर कम से कम एक रेडियो सेट या ट्रांजिस्टर होना चाहिए। रेडियो का जिक्र इसलिए प्रासांगिक है क्योंकि इसकी पहुंच आज समाचार पत्रों या फिर अन्य जनसंचार माध्यमों से सबसे ज्यादा है। मीडिया कृषि, साक्षरता, परिवार नियोजन, शिक्षा, उद्योग, राष्ट्रीय एकता और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग सहित अन्य विषयों पर लगातार काम कर रहा है।

आजादी के दौरान मीडिया का तेवर देश की आजादी को लेकर था। बाद में राष्ट्र के निर्माण में भूमिका देखी गयी। आज भारत विकासशील राष्ट्रों में अपनी पहचान बनाते हुए दिनों-दिन आगे बढ़ रहा है। यकीनन आजादी के बाद भारत लगातार विकास की ओर बढ़ रहा है। और इस विकास में मीडिया की भूमिका अहम् रही है। समाचार पत्र-पत्रिकाएं जहाँ विकास का अलख जगा रहे थे। वहीं जनसंचार का सबसे सशक्त माध्यम रेडियो सबसे आगे रहा, बल्कि आज भी है। विकासशील देशों में भारत ही पहला ऐसा देश है जिसने रेडियो प्रसारण शुरू कर राष्ट्र के निर्माण और सामाजिक विकास की प्रक्रिया में योगदान देने का काम शुरू किया। शुरूआती दौर में अखबारों की पहुंच जहाँ शहरों तक ही रही वहीं रेडियो की पहुंच शहरी व गांवों में ज्यादा देखा गया। यह स्थिति आज भी बरकरार है। सरकार ने जमकर रेडियो का विस्तार किया।

भारत की विकास यात्रा को मीडिया अपने विभिन्न माध्यमों से लोगों को बातों का पहुंचाने का काम तो कर रहा है, लेकिन भारत का एक बहुत बड़ा भाग आज भी मीडिया के अन्य माध्यमों से बहुत दूर है। बल्कि अछूता है। हम बात कर रहे हैं गांवों की। हिन्दुस्तान के गांव आज भी मीडिया से अछूते हैं। शहरी विकास की बातें तो सामने आती दिखती है लेकिन ग्रामीण परिवेश में हो रहे बदलाव, विकास या अविकास की तस्वीर नहीं दिखती। अशिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक कुरीतियां, भेदभाव समेत कई जनहित के मामले ज्यों के त्यों बने हुए है।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि संचार क्रांति के दौर में मीडिया ने भी लंबी छलांग लगायी है। मीडिया के माध्यमों में रेडियो, अखबार, टी.वी., खबरिया चैनल, अंतरजाल और  मोबाइल सहित नये नये माध्यम आये दिन विकसित हो रहे हैं। अन्य संचार तंत्र समाचारों को क्षण भर में एक जगह से कोसों दूर बैठे लोगों तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। बात साफ है, मीडिया का दायरा व्यापक हुआ है। राष्ट्रीय अखबार राज्यस्तरीय और फिर जिलास्तरीय प्रकाशन पर उतर आये हैं। कुछ ऐसा ही हाल, राष्ट्रीय स्तर के टीवी चैनलों का भी है। चैनल भी राष्ट्रीय से राजकीय और फिर क्षेत्रीय स्तर पर आकर अपना परचम लहरा रहे हैं।

मीडिया चाहे प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक सभी ज्यादा-से-ज्यादा ग्राहकों / श्रोताओं तक अपनी पहुंच बनाना चाहते हैं। बाजार के दौर में अखबार और टीवी आपसी प्रतिस्पर्धा में आ गये हैं। मीडिया आज बदल चुका है। राष्ट्रीय अवधारणा बदल चुकी है। एक अखबार राष्ट्रीय राजधानी फिर राज्य की राजधानी और फिर जिलों से प्रकाशित हो रही है। इसके पीछे भले ही शुरूआती दौर में, समाचारों को जल्द से जल्द पाठकों तक ले जाने का मुद्दा रहा हो। लेकिन आज बाजार मुद्दा बन चुका है। हर बड़ा अखबार समूह इसे देखते हुए अपने प्रकाशन के दायरे को बढ़ाने में लगा है। अक्सर बड़े पत्र समूह छोटे-छोटे जिलों से समाचार पत्रों के प्रकाशन करने की घोषणा करते आ रहे है। एक अखबार दस राज्यों से भी ज्यादा प्रकाशित हो रहा है और उस राज्य के कई जिलों से भी प्रकाशन किया जा रहा है। साथ में दर्जनों संस्करण निकल रहे हैं। दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, दैनिक आज, राजस्थान पत्रिका, प्रभात खबर जैसे कई समाचार पत्र हैं, जो कई राज्यों के कई जिलों से कई संस्करण प्रकाशित कर रहे हैं। राष्ट्रीय अखबार क्षेत्रीय में तब्दील हो चुके हैं। जो नहीं हुए है वे भी प्रयास कर रहे हैं। पूरे मामलों में देखा जा रहा है कि एक ओर कुछ अखबार समूहों ने अपने प्रसार/ प्रकाशन को बढ़ाया है, वहीं कुछ समाचार पत्रों का दायरा सिमटा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि भारत की ज्यादा जनसंख्या गांव में रहती है। फिर भी एक भी बड़ा अखबार समूह ग्रामीण क्षेत्रों को केन्द्र में रखकर प्रकाशन नहीं करता है। ग्रामीण क्षेत्र आज भी प्रिंट मीडिया से अछूते हैं। देष के कई गांवों में समाचार पत्र नहीं पहुंच पा रहे हैं। गांव की बात सामने पूरी तरह से नहीं आ पा रही है।

अंतिम कतार में खड़े व्यक्ति तक केवल रेडियो की पहुंच बनी हुई है। भले ही प्रिंट मीडिया ने काफी तरक्की कर ली हो, संस्करण पर संस्करण प्रकाशित हो रहा हो। लेकिन, ये अखबार ग्रामीण जनता से कोसों दूर हैं। जिले स्तर पर अखबरों के प्रकाशन के पीछे शहरी तबके को ही केन्द्र में रख कर प्रकाशन किया जा रहा है। अखबार का सर्कुलेशन ब्लाक तक होता है। किसी एक गांव में समाचार पत्रों की प्रतियां 100 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाती है। अब बिहार को ही ले बिहार में आठ हजार चार सौ तिरसठ पंचायत हैं और इस पंचायत के तहत लाखों गांव आते हैं। फिर भी अखबारों की पहुंच सभी पंचायतों तक नहीं है। नवादा जिले में एक सौ सतासी 187 पंचायत है। ब्लाक की संख्या चैदह है और गांव की संख्या एक हजार निन्यानवें है। इनमें मात्र दो सौ गांवों में अखबार पहुंचने की बात कही जाती है। अखबारों का सर्कुलेशन प्रति गांव कम से कम दस और ज्यादा से ज्यादा तीस है। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिहार के एक जिले के हजारों गांवों में मात्र बीस प्रतिशत से भी कम गांव प्रिंट मीडिया के दायरे में हैं। समाचार पत्र समूह शहरों को केंद्र में रख कर खबरों का प्रकाशन करते हैं। क्योंकि, शहर एक बहुत बड़ा बाजार है और समाचार पत्रों में बाजार को देखते हुए शहर एवं ब्लाक की खबरों को ही तरजीह दी जाती है। ब्लाक स्तर पर अखबारों के लिए समाचार प्रेषित करने वाले पत्रकारों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्र में बाजार का अभाव है। यानी ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति सामने आती है। किसान फटे हाल हो और अनपढ़ हो तो, ऐसे में अखबार भला वह क्यों खरीदें ? हालांकि यह पुरी तरह से स्वीकार्य नहीं है क्योंकि अब गांवों में पढ़े लिखों की संख्या बढ़ी है। हाल ही में बिहार में पंचायती चुनाव में एक इंजीनियर सहित कई पढ़े लिखे उम्मीदवारों ने विभिन्न पदो पर विजय हासिल की है। यही नहीं गांवों में प्राथमिक विद्यालय सक्रिय है या फिर नौकरी पेशे से जुड़े लोग जब गांव जाते हैं तो उन्हें अखबार की तलब होती है। ऐसे में वे पास के ब्लाक में आने वाले समाचार पत्र को मंगवाते हैं। कई सेवानिवृत्त लोग या फिर सामाजिक कार्यकर्ता चाहते है कि उनके गांव में समाचार पत्र आये। हालांकि इनकी संख्या काफी कम होती है फिर भी ऐसे कई गांव है जहाँ लोग अपनी पहल पर अखबार मंगवाते हैं।

गांव से अछूते अखबारों के पीछे देखा जाये तो समाचार पत्र समूहों का रवैया भी एक कारण है। शहरों से छपने वाले समाचार पत्रों को गांव की खबरों से कोई लेना-देना नहीं रहता। अखबारों में गांव की खबरें नहीं के बराबर छपती है। जो भी खबर छपती है वह ब्लाक में पदस्थापित प्रतिनिधियों से मिलती है वह भी ज्यदातर सरकारी मामलों पर केन्द्रित रहती है। ब्लाक का प्रतिनिधि ब्लाक की खबरों को ही देने में दिलचस्पी रखता है ताकि ब्लाक लेवल में अखबार बिक सकें। गांव की एकाध खबरें ही समाचार पत्रों को नसीब हो पाता है। जब तक कोई बड़ी घटना न घट जाए तब तक गांव की खबर अखबार की सुर्खियां नहीं बन पाती। गांव पूरी तरह से मीडिया के लिए अपेक्षित है। गांव के विकास से मीडिया अपने को दूर रखे हुए है। जबकि गांव में जन समस्या के साथ-साथ किसानों की बहुत सारी समस्याएं बनी रहती है। बिहार के पूर्णिया जिले के बनमनखी प्रखंड के मसूरिया मुसहरी गाँव के प्रथमिक स्कूल में डेढ़ साल में कभी कभार शिक्षक पढ़ाने आते थे। लेकिन, आकाशवाणी पर 9 दिसंबर 2010 को इस संबंध में खबर आयी। खबर आने के बाद प्रशासन हरकत में आयी और दूसरे दिन से स्कूल में शिक्षक आने लगे। बात साफ है मीडिया की नजर गांव पर पड़ेगी तो गांव खबर में आयेगा और वहाँ  की जनसमस्याओं पर प्रशासन सक्रिय हो पायेगा। विकास से अछूता गांव खबर बने तो सरकार का ध्यान जायेगा। हालांकि कभी कभार मीडिया में गांव की खबरें आती है लेकिन वह कई दिनों के बाद। उसके पीछे कारण यह है कि मीडिया से जुड़े लोग शहर और कस्बा, ब्लाक तक ही सीमित है। अखबार वाले अपने प्रतिनिधियों को गांव में नहीं रखते। इसके पीछे आर्थिक कारण नहीं है क्योंकि ज्यादातर अखबरों के ब्लाक प्रतिनिधि बिना किसी मेहताना के रखे जाते है। अगर वे विज्ञापन लाते हैं तो उन्हें उसका कमीशन भर दिया जाता है।

ग्रामीण भारत के नजरिए से देखा जाए तो कई गांवों में टीवी सेट नहीं हैं। इसके पीछे बिजली का नहीं होना सबसे बड़ा कारण है। हालांकि ब्लाक के करीब के गांवों में टीवी सेट ही नहीं केबल टीवी आ चुका है या फिर बैटरी पर ग्रामीण टीवी का मजा लेते हैं। जहां तक बिहार के गांवों का सवाल है, प्रत्येक घर में टीवी सेट उपलब्ध नहीं है। कमोबेश  देश  के अन्य राज्यों के गांवों में भी यही स्थिति बनी हुई है। बडे़ ही दुर्भाग्य की बात है कि संचार क्रांति के दौर में गांवों में शहरों की तरह समाचार पत्र/ टीवी सेट तो नहीं पहुंचे हैं। लेकिन मोबाइल फोन ने ग्रामीण क्षेत्र को अपने कब्जे में ले लिया है। गांव का मुखिया हो या मनरेगा में काम करने वाला मजदूर आज मोबाइल के दायरे में आ चुका है। एनआरएस-2002 के आंकडे से पता चलता है कि बिहार के गांवों में 18 घरों में से केवल एक घर में टी.वी सेट था। पंजाब में पांच से तीन था। वहीं उत्तर प्रदेश  के गांवों में 80 प्रतिषत घरों में टी.वी. नहीं था।

संजय कुमार

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जो मीडिया सिर्फ देश की राजधानी तक ही सीमित हुआ करता था आज वह राजपथ से होते हुए कस्बा और गांव तक पहुंच चुका है। थोड़ी देर के लिए प्रिंट मीडिया को दरकिनार कर दें तो पायेगे कि रेडियो पत्रकारिता की पहुंच गांवों में ज्यादा है। लेकिन रेडियो के साथ साथ प्रिंट मीडिया का गांव पर नजर जरूरी है। वजह देश को विकसित करने के लिए गांवों को नहीं छोड़ा जा सकता है। सरकार अपनी योजना तो बनाती है और सरकारी माध्यम से प्रचारित करती भी है लेकिन फीडबैक पूरी तरह से नहीं मिल पाने से सच्चाई सामने नहीं आ पाती। ऐसे में निजी मीडिया की जवाबदेही बढ़ जाती है कि उसकी नजर और पैनी हो ताकि उदीयमान भारत को उदीयमान की कड़ी से हटाकर विकसित देश  की कड़ी में खड़ा कर सके।

 (इस पोस्ट के लेखक संजय कुमार आकाशवाणी पटना में समाचार संपादक हैं तथा एक अरसे से मीडिया पर  लेखन कर रहे हैं)

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleppy
Sleppy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

One thought on “भारत के गांवों से अब भी अछूता मीडिया!

  1. धन्यवाद् संजय जी इस आर्टिकल के लिए……वैसे इस देश के मीडिया में गाव और गरीब के लिए कोई स्थान नहीं है . आज मीडिया में कितने प्रतिशत खबरे गाव और गरीब से सम्बंधित होती है. रोज हम किसी भी अख़बार को देख कर पता लगा सकते है. व्यापर बन गया है इस देश का मीडिया …….कुछ लोगो को छोड़ कर…..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

बहुत दिनों से घोंट रहे थे, अब थूक रहे हैं

|| आशीष तिवारी|| देश में आजकल अन्ना की चर्चा है। हर ओर अन्ना ही अन्ना नजर आ रहे हैं। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने पूरे देश को अन्नामय कर दिया है। अन्ना के समर्थन में देश का एक बड़ा वर्ग सड़कों पर उतर आया है। कोई अनशन कर रहा है […]
Facebook
%d bloggers like this: