इस्तांबूल में पापुलरिटी

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-आलोक पुराणिक||

भारत के एक राज्य के मुख्यमंत्री को हजारों फेसबुक लाइक्स इस्तांबूल तुर्की में मिले। मुख्यमंत्री यहां के, लाइक्स इस्तांबूल के। इस मसले पर एक विचारक ने बताया- इसमें क्या गलत बात। ग्लोबल मामला है। वस्त्र मुक्ति अभियान की कनाडा मूल की वरिष्ठ कार्यकर्ता सन्नी लियोन को इंडिया में लाइक करनेवाले करोड़ों हैं।

आलोक पुराणिक
आलोक पुराणिक

एक राज्य के वोटर बोले कि हम भी अपने मुख्यमंत्री को लाख-करोड़ बार लाइक कर दें अगर वो तय कर लें कि वह हमेशा इस्तांबूल में ही रहेंगे। इंडिया में रहते हैं वो, तो उनके बेटे, बेटियां, बहुएं, दामाद, नाती-पोते विकट लूटपाट-मार मचाये रहते हैं। इंडिया छोड़कर, इस्तांबूल की छाती पर मूंग दलें वो, तो हम इंडिया में उन्हे लाइक करेंगे।

लोकतंत्र का यह नया माडल उभर आयेगा। नेता होवे दूर, तब लाइक मिलें भरपूर। नेता अपने इलाके में दिख जाये, तो हाय-हाय मचा दो। नेताजी विधानसभा, लोकसभा सारे चुनाव जीत जाओगे, बस यहां दिख मत जाना। इस्तांबूल में रहना या जूरिख स्विटजरलैंड में रहना।

यहीं रहकर नेता ऐसी हरकतें करें कि लाइक नहीं, ठुकाई का मन करता है। फेसबुक अलबत्ता ठुकाई का विकल्प नहीं देता।

वैसे नेताओं को भी सहूलियत इसी में है। खटकड़पुरा लोकल के नेता को ज्यूरिख स्विटजरलैंड में लाइक किया जाये। खटकड़पुरा का पूरा पुल ही नेताजी ने स्विस बैंक में जमा करा दिया। बैंक कर्मी खुश हैं स्विटजरलैंड के, सो नेता को वहां दबादब लाइक किये जाते हैं। ऐसे इंडिया के कई नेता स्विटजरलैंड में बहुतै पापुलर होंगे, थैंक्स टू स्विस बैंक। वैसे एक नेता मुझसे कह रहे थे कि ये लोकतांत्रिक प्रक्रिया की वड्डी खामी ही है कि स्विस पापुलरटी के आधार पर इंडियन नेता को जीत खटकड़पुरा, ठीकरीपुरा इंडिया में नहीं मिल पाती। है, वड्डी खामी है।

मुझे भविष्य के नेताओं की तस्वीर दिखायी दे रही है- परिचय दिया जा रहा है कि आप बहुतै पापुलर नेता हैं, , पर इंडिया में नहीं, इज्मित में, कंदिरा में, ब्राक्रीगोया में, अनारकोटा में, फोनोस्टाकेंस में, हक्नाफंसाटा में, टुक्रोवझांटा में, करोड़ों के लाइक इन्हे वहां से मिलते हैं।

ये हक्नाफंसाटा, टुक्रोवझांटा हैं कहां, जहां इंडियन नेता पापुलर हैं।

साहब, जैसे ही मुझे पता लगेगा, आपको बता दूंगा।

(अलोक पुराणिक की फेसबुक वाल से)

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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