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क्या भर पाएगा गरीब का पेट?

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-बाबूलाल नागा||

 

यूपीए सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘खाद्य सुरक्षा बिल’ पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर दिए हैं. इस कानून के लागू होने से देश की 63.5 प्रतिशत आबादी को सस्ती दर पर अनाज उपलब्ध हो सकेगा. ग्रामीण इलाकों के 75 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों के 50 प्रतिशत लोगों को इसका लाभ मिलेगा. इस कानून में आम लोगों को दो हिस्सों में बांटा गया है. बीपीएल को प्राथमिकता वाले परिवारों में और एपीएल परिवारों को सामान्य परिवारों में रखा है. गरीबों को गेहंू 2 रुपए और चावल 3 रुपए किलो मिलेगा. गर्भवती महिलाओं व स्तनपान कराने वाली माताओं को पोषक आहार उपलब्ध कराने का प्रावधान है. साथ ही छह महीने तक हर महीने एक हजार रुपए दिए जाएंगे. आठवीं कक्षा तक के बच्चों को भी भोजन दिया जाएगा. इस कानून को पूरा करने के लिए करीब छह करोड़ टन अनाज की जरूरत पडे़गी.food (1)

जरूरतमंदों तक खाद्यान्न पहुंचाने की सरकार की ओर से उठाया यह एक अच्छा कदम है लेकिन चिंताजनक बात यह है कि खाद्य सुरक्षा कानून के मसौदे में इतनी ज्यादा कमियां हैं कि उनके दम पर एक प्रभावी कानून की ओर बढ़ने की कल्पना भी करना मुश्किल है. यह योजना कैसे लागू होगी. किनको इसका लाभ मिलेगा. अभी यह स्पष्ट नहीं है. इस विधेयक में राशन व्यवस्था का सार्वजनीकरण नहीं किया गया है. साथ ही एपीएल,बीपीएल के अंतर को भी बनाकर रखा गया है. विधेयक द्वारा राशन व्यवस्था से मात्र अनाज की आपूर्ति सुनिश्चित की गई है. अनाज की मात्रा की आपूर्ति भी प्राथमिक परिवारों हेतु आवश्यकता से आधी व सामान्य परिवारों हेतु एक चैथाई से कम है. साथ ही दालों एवं खाद्य तेल का कोई जिक्र नहीं किया गया है. खाद्यान्नों की कीमतों को मुख्य प्रावधान से अलग रखा गया है जो अनुचित है. कीमतों का मुख्य प्रावधान में नहीं होने के कारण सरकार द्वारा कीमतों में अपनी मनमर्जी से वृद्धि की जा सकती है. विधेयक के तहत यह भी निर्धारित नहीं किया गया है कि प्राथमिक व सामान्य परिवारों का चयन किस प्रकार किया जाएगा. विधेयक यह भी खुलासा नहीं करता कि प्राथमिक एवं सामान्य परिवारों की संख्या का निर्धारण किस आधार पर किया गया है. विधेयक में ’भोजन‘ से तात्पर्य पका हुआ खाना या खाने के लिए तैयार भोजन या घर ले जाने वाले राशन से है. इसका तात्पर्य यह हुआ कि जहां जहां मुफ्त भोजन का

प्रावधान रखा गया है वहां कुछ भी दिया जा सकता है. इसी प्रकार शहरी क्षेत्रों में केंद्रीयकृत रसोई की व्यवस्था के उपयोग का भी प्रावधान कानून में रखा गया है. यह प्रावधान सर्वोच्च न्यायालय के इस सिद्वांत या दिशा निर्देशों के विरुद्ध है कि बच्चों के भोजन व्यवस्था में विकेंद्रीकरण होना चाहिए.

दूसरी तरफ देश में लाखों टन अनाज बर्बाद हो रहा है. सड़ रहा है. गरीब भूखे मर रहे हैं. जहां एक तरफ कुछ लोगों को खाने को न के बराबर भोजन मिल पाता है वहीं दूसरी तरफ अन्य लोगों के पास जरूरत से ज्यादा भोजन है. पूरी दुनिया में 125 करोड़ से अधिक लोग भूख से त्रस्त हैं इनमें से एक तिहाई लोग भारत के है. देश के कई राज्यों में सस्ते अनाज की योजनाएं आईं. सभी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ र्गइं. सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत हो रही लूट को रोकने में कामयाब नहीं हुई. सामाजिक कल्याण व गरीब हटाओ कार्यक्रम के उद्देश्य से प्रारंभ हुई यह प्रणाली अनेकों अव्यवस्थाओं की शिकार हो गई हैं. ऐसे में सरकार से क्या उम्मीद की जाए. सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुधारे बिना व्यापक स्तर पर अनाज वितरण योजना को लागू कर पाना मुश्किल होगा. सवाल यह है कि जो सरकार अभी सार्वजनिक वितरण व्यवस्था में थोड़ा बहुत  अनाज भी नहीं बांट पा रही है वह अनाज वितरण कैसे कर पाएंगी? डर है कि यह योजना भी लूट का एक और जरिया न बन जाए. आज भी लगभग 40 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं. दुनिया के भूखे लोगों में हर पांचवां व्यक्ति भारतीय है. सार्वजनिक वितरण प्रणाली देश के इन 40 करोड़ भूखे लोगों की आशा है. उन तक खाद्यान्न पहुंचाना एक बड़ी चुनौती है. खाद्य सुरक्षा योजना का लाभ भी इन भूखे लोगों तक पहुंचाना एक टेढ़ी खीर साबित होगी. दूसरी तरफ इस योजना को भ्रष्टाचार व कालाबाजारी की भेंट चढ़ने से भी बचाना होगा. क्योंकि आज सार्वजनिक वितरण प्रणाली का ढांचा ध्वस्त हो चुका है. इस प्रणाली में भ्रष्टाचार व कालाबाजारी का काफी बोलबाला है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि एक तिहाई राशन कार्ड फर्जी है. कुछ राज्यों में फर्जी राशन कार्ड करीब आधे हैं मगर उनके नाम का राशन नियमित रूप से उठ रहा है. अधिकारियों, जांच टीम, डीलर व इससे जुड़े अन्य ढांचों में जबरदस्त मिलीभगत है. अनाज की दुकानों पर महंगे दामों में अनाज मिलता है.food security

सार्वजनिक वितरण प्रणाली में राजनीतिक दखल होती है. राशन की दुकानों के आवंटन में नेतागिरी पूरी तरह हावी है. लाइसेंस जारी करना या रद्द लाइसेंस पुनः जारी करना इन्हीं नेताओं के हाथ में होता है. एक अनुमान के अनुसार 1 करोड़ 50 लाख गरीब परिवारों को अपना राशन कार्ड बनवाने के लिए रिश्वत देनी पड़ी. गोदाम की देखभाल करने वाले प्रति बोरी बीस रुपए उगाही करते हैं. ऐसा नहीं करने पर उन्हें सड़े हुए अनाज उपलब्ध कराए जाते हैं. एक बोरी में औसतन 52 किलोग्राम गेहूं होता है लेकिन बोरियों से गेहूं निकाल लिया जाता है. दुकानों तक पहंुचते पहुंचते इसमें अधिक से अधिक 45 किलो गेहूं रह जाता है. भारत में हर साल करीब 50 हजार करोड़ का अनाज सरकारी कुप्रबंधन के चलते पशुओं के खाने लायक भी नहीं बचता. इस सड़े अनाज को फेंकना पड़ता है.

सरकार गरीबों के लिए खाद्य सुरक्षा कानून लेकर आई है. यह खाद्य सुरक्षा कानून किस तरह की शक्ल अख्तिार करेगा. देश के आने वाले कल पर उसका कितना असर पड़ पाएगा. इस कानून का लाभ गरीबों तक कितना पहुंच पाता है. यह तो आने वाला समय ही बताएंगा. सवा अरब आबादी वाले इस भारत देश के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला यह कानून किफायती साबित हो इसके लिए सबसे जरूरी है सरकार पहले सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत करे. इस प्रणाली को ईमानदार व कारगर बनाएं. तब एक गरीब का पेट भरने की जरूरत समझते हुए ऐसी योजनाओं का लाभ दें.

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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