चला गया बॉलीवुड का जंगली: शम्मी कपूर के निधन से फैली शोक की लहर

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हिन्दी फिल्मों के मशहूर अभिनेता शम्मी कपूर का निधन हो गया है। रविवार की सुबह क़रीब पांच बजे मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में उनका निधन हो गया। वो 79 वर्ष के थे। शम्मी कपूर लंबे समय से बीमार चल रहे थे। ख़बरों के मुताबिक़ उन्हें हफ़्ते में तीन बार डायलिसिस के लिए ले जाया जाता था। उनका अंतिम संस्कार सोमवार को किया जाएगा।

शम्मी कपूर को 1950-1960 के बीच का सुपर स्टार कहा जाता है। फिल्मों में एक नये युग की शुरूआत करने वाले शम्मी कपूर, मशहूर अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के दूसरे नंबर के पुत्र थे। उनके दो और भाई राजकपूर तथ शशि कपूर थे, जिनमें राजकपूर ने बहुत पहले ही उनका साथ छोड़ दिया था।

मुंबई में ही 21अक्तूबर 1931 को जन्मे शम्मी कपूर का असली नाम शमशेर राज कपूर था और उन्होंने थियेटर के ज़रिए अभिनय की दुनिया में क़दम रखा। पचास के दशक में उन्होंने अपने फ़िल्मी करियर की शुरूआत की। सबसे पहले 1953 में उन्होंने फ़िल्म ‘जीवन ज्योति’ में काम किया।
उसके बाद पचास और साठ के दशक में शम्मी कपूर ने कई हिट फ़िल्में दीं। हालांकि शुरूआत में उनकी कई फ़िल्में दर्शकों को ज़्यादा पसंद नहीं आई। लेकिन 1957 में पर्दे पर आई उनकी ‘फ़िल्म तुम सा नहीं देखा’ को दर्शकों ने काफ़ी पसंद किया। यहीं से उनके फ़िल्मी करियर में कामयाबी की शुरुआत हुई।

लेकिन शम्मी कपूर को आज भी जिस फ़िल्म के लिए लोग सबसे ज़्यादा याद करते हैं वो है 1961 में रिलीज़ होने वाली उनकी फ़िल्म ‘जंगली’। उनकी यह पहली रंगीन फिल्म थी। फिल्म में उनकी ‘याहू शैली’ और ‘चाहे मुझे कोई जंगली कहे’ गाने ने उन्हें रातोंरात लोकप्रियता के शिख़र पर पहुंचा दिया।
शम्मी ने इसके बाद प्रोफेसर, चाइना टाउन, प्यार किया तो डरना क्या, कश्मीर की कली, ब्लफ़ मास्टर, जानवर, राजकुमार, तीसरी मंजिल, बद्तमीज़, ऐन ईवनिंग इन पेरिस, प्रिंस और ब्रह्मचारी जैसी कई सुपरहिट फिल्में की।
1968 में उन्हें ब्रह्मचारी के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार मिला। चरित्र अभिनेता के रूप में शम्मी कपूर को 1982 में विधाता फिल्म के लिए श्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला था।

उनके निधन की ख़बर मिलते ही पूरे बॉलीवुड ने शोक व्यक्त किया है। यह खबर अमिताभ बच्चन के ट्विटर के ज़रिए फैली जिसमें उन्होंने इस महान अभिनेता के लिए अपना शोक संदेश भेजा है और लिखा है कि उनकी कमी को कोई पूरा नहीं कर सकता।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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