किस किसके लिए खाद्य सुरक्षा और बाकी लोगों का क्या?

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-पलाश विश्वास||

खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर राष्ट्रीय सहमति की परवाह किये बिना राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने खाद्य सुरक्षा अध्यादेश को मंजूरी दे दी है. संसद में विधेयक पास कराकर कानून बनाने के बजाय कांग्रेस नेतृत्व और सत्ता व वित्तीय परबंधन के कारपोरेट प्रबंधकों ने संसद को बाईपास करके लोकसभा चुनाव से पहले खाद्यसुरक्षा अध्यादेश लागू कर दिया. इससे पहले रोजगार, शिक्षा और सूचना के अधिकारों का हश्र देखते हुए असमानता और अन्याय पर आधारित खुले बाजार में तब्दील राष्ट्र में सामाजिक यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में इसके आर्थिक आयामों और तमाम सामाजिक योजनाओं के प्रबंधन के संदर्भ में इस आयोजन के निहित स्वार्थ तंत्र की पड़ताल जरुरी है, जो संसदीय बहस का निषेध करती है और जहा जन सुनवाई और संवाद के लिये कोई विकल्प ही नहीं है.
राष्ट्रपति ने इस अध्यादेश पर दस्तखत कर इसके कानून बनने का रास्ता साफ कर दिया है. अब गरीबों को 3 रुपए किलो चावल और 2 रुपए किलो गेंहू मिल सकेगा. दूसरी ओर, डीबीएस बैंक का कहना है कि खाद्य सुरक्षा विधेयक को लागू करने के निर्णय से चालू वित्त वर्ष में सरकार का राजकोषीय घाटा 4.8 प्रतिशत के लक्ष्य से आधा प्रतिशत आगे बढ़ सकता है और इससे मामला और जटिल बन सकता है. उद्योग संघ फ़िक्की ने इसे जल्दबाज़ी में उठाया गया क़दम बताया है. लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत सरकार की तारीफ़ की है.food

इस विधेयक को अध्यादेश के रूप में लाने के कारण अब सदन में चर्चा के दौरान इसमें संशोधनों पर विचार नहीं हो सकेगा.
अब संसद के दोनों सदनों को या तो इसे पारित करना होगा या खारिज़ और फिलहाल विपक्ष इसे खारिज़ करने का जोखिम नहीं लेगा. अध्यादेश संसद के मानसून सत्र से कुछ ही सप्ताह पहले लाया गया है और राजनीतिक दलों की मांग है कि खाद्य सुरक्षा विधेयक को दोनों सदनों में चर्चा के जरिए पारित किया जाना चाहिए था.

सत्ता प्रतिष्ठान का दावा है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने देश की दो-तिहाई जनसंख्या को 1 से 3 रुपए प्रति किलोग्राम की दर पर हर महीने 5 किलोग्राम खाद्यान्न देने वाले खाद्य सुरक्षा विधेयक को लागू करने के लिहाज से लाए गए अध्यादेश पर शुक्रवार को हस्ताक्षर कर दिए.जिस गैरकानूनी कारपोरेट आधार योजना को तमाम सामाजिकयोजनाओं से नत्थी करके सरकारी खर्च करके देहात में नकदी प्रवाह बढ़ाकर स्तंभित बाजार विकास विस्तार को त्वरा देने की यह रणनीति है, उसके तहत तो इस देश के तमाम आदिवासी , शरणार्थी, बस्तीवाले, बंजारा लोग नागरिकता और बायोमैट्रिक पहचीन से बाहर हैं. 120 में से 60 करोड़ को आधारकार्ड दिये जाने हैं, बाकी को नहीं. तो किस जनसंख्या की एक तिहाई को लक्षित है यह योजना? फिरभी सत्ता प्रतिष्ठान का दावा है कि खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम दुनिया की इस तरह की सबसे बड़ी योजना का हिस्सा होगा जिसमें सरकार हर साल देश की 67 प्रतिशत आबादी को करीब 6.2 करोड़ टन चावल, गेहूं या मोटा अनाज की आपूर्ति पर करीब 1,25,000 करोड़ रुपए खर्च करेगी. पिछले महीने मंत्रिमंडल की बैठक में इस विषय पर अलग-अलग राय आने के चलते फैसला टाल दिया गया था, लेकिन बुधवार को खाद्य सुरक्षा विधेयक को लागू करने के लिहाज से अध्यादेश को मंजूरी दे दी गई.

बहरहाल, चुनावी शतरंज की चालों के मुताबिक राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं. जिसमें पूर्व घोषित कुरुक्षेत्र महाभारत के पांडव और कौरव हैं, उनके अपने अपने युद्ध कौशल हैं, जहां न सामाजिक यथार्थ का कोई प्रसंग है और न देश काल परिस्थति की यथायथ अभिव्यक्ति और न अर्थव्यवस्था के बुनियादी मुद्दों का यथार्थ वादी दृष्टिकोण.कांग्रेस पार्टी ने खाद्य सुरक्षा विधेयक को संसद के बजाय अध्यादेश के रास्ते लागू करवाने का बचाव किया है.कांग्रेस पार्टी के महासचिव अजय माकन ने कहा कि देश में कुपोषण की स्थिति को देखते हुए इसे जल्द से जल्द लागू करना ज़रूरी था और इसमें एक दिन की देरी भी कई लोगों की जान ले सकती है.उधर मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने कहा है कि वह इस विधेयक की विरोधी नहीं है, लेकिन पार्टी चाहती है कि इस पर सदन में चर्चा हो और कुछ संशोधनों के साथ इसे पारित किया जाए.वामपंथी दलों ने भी इस अध्यादेश की आलोचना की है.वामदलों ने अध्यादेश का रास्ता अपनाने पर सरकार को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि संप्रग-2 ने संसद की अवहेलना की है. भाजपा ने इसे राजनीतिक चाल कहा.संप्रग को बाहर से समर्थन दे रही सपा ने भी अध्यादेश का तीखा विरोध करते हुए कहा कि यह अलोकतांत्रिक है और यह कार्यक्रम खाद्य अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार देगा. अध्यादेश की घोषणा के छह महीने के अंदर इस पर लोकसभा और राज्यसभा दोनों की मंजूरी पाना जरूरी होगा.

बुनियादी प्रश्न तो यह है कि देश में कृषि निर्भर नैसर्गिक आजीविका और समूची कृषि व्यवस्था के विध्वंस, उत्पादन पर्णाली को तहस नहस करके, परंपरागत देशज कामधंधों को खत्म करके भूमंडलीकरण के पंख पर सवार होकरा विस्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष निर्देशित अबाध पूंजी प्रवाद के काले धन की अर्थव्यवस्था सब्सिडी सर्वस्व खाद्य सुरक्षा का बंदोबस्त कैसे कर सकती है.जिस देश में लाखों किसाम आत्महत्या में मुक्ति मार्ग खोजते हों, जहां कृषि विकास दर और औद्योगिक विकासदर दोनों शून्य पर हो और विदेशी पूंजी के हवाई किले पर विकासगाथा का झंडा बुलंद हो, परिभाषाओं और पैमाने सुभीधे के मुताबिक बदल जाते हों, नागरिकता और पहचान तक निश्चित नहीं है तो किसकी खाद्य सुरक्षा के लिए यह अध्यादेश जारी किया गया है?
भारतीय राष्ट्रीय नीतियों के संदर्भ में विश्व बैंक की भूमिका नकारात्म्क और असंगत रही है. भारत दुनिया में विश्व बैंक का सबसे बड़ा कर्जदार देश है. 1947 से अब तक भारत पर 60 बिलियन डालर (दो लाख चालीस हजार करोड़ रुपए) का कर्ज हो चुका है. न्यायाधिकरण ने माना कि विश्व बैंक के कर्जों र्का प्रयोग महत्वपूर्ण नीतियों में बदलाव लाने और विभिन्न महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी शर्तें मनवाने के लिए किया गया है, जिनके सामाजिक, राजनैतिक रूप से उल्टे परिणाम सामने आ रहे हैं. इनमें प्रषासनिक सुधार, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, पानी और पर्यावरण जैसे क्षेत्र महत्वपूर्ण हैं.

जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन (जेएनयूआरएम) योजना विश्व बैंक की ही योजना है. 250 मिलियन डालर के कर्ज के इतने दूरगामी परिणाम हुए कि सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण हो गया और स्वैच्छिक सेवानिवृत्त का भुगतान लेने के लिए दो लाख स्थायी कर्मचारियों की कटौती करने के लिए दबाव बनाया गया.इसका प्रभाव किसानों की आत्महत्या के रूप में सामने आया. ज्यादातर किसानों ने इसलिए आत्महत्या की कि वे बिजली का बिल नहीं चुका सकते थे. बिजली की दर अचानक बढ़ा दिए गए थे. खेती पर मिलने वाली सब्सिडी घटना देने से लागत में वृध्दि हो गई थी.1990 के दशक में विश्व बैंक से लिए गए कर्जे का बीस से तीस फीसदी ऊर्जा क्षेत्र में लगाया गया. विश्व बैंक की सलाह पर चलने के कारण स्थानीय ऊर्जा विषेशज्ञों की अनदेखी की गई, जबकि विदेशी सलाहकारों पर 306 करोड़ रुपए खर्च किए गए. इन सलाहकार एजेंसियों ने ही उड़ीसा में पानी के वितरण का निजीकरण करने की सिफारिश की. अमेरिकन फर्म ‘एईएस’ ने केंद्रीय क्षेत्र में पानी के वितरण का काम अपने हाथ में लिया. 2001 में फर्म ने राज्य छोड़ दिया.मिनिसोटा विश्वविद्यालय के प्रो. माइकल गोल्डमैन बताते हैं कि विश्व बैंक पर पांच महाशक्तियों – अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, जर्मनी और फ्रांस का कब्जा है. 2003 में विश्व बैंक की 4-5 फीसदी योजनाओं के ठेके इन्हीं देशों की कंपनियों को मिले. वे बताते हैं कि विश्व बैंक की योजनाएं जहां भी चल रही हैं वहां स्थानीय ढांचे में स्वत: ही असमानता पैदा हो रही है. उदाहरण के रूप में आज भारत में विश्व बैंक और एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) की प्राथमिकता मेगासिटी परियोजनाओं में पैसा लगाना है. भारत के बड़े शहरों में आर्थिक विकास के लिए औद्योगिक काम्प्लेक्स, सड़कों, पानी, सीवेज और बिजली जैसे ‘नगरीय ढांचे’ के लिए करोड़ों डालर कर्ज दिया जा रहा है. ऐसा माना जा रहा है कि इस शहरी विकास से गरीबी दूर होगी; रोजगार बढ़ेगे और स्वास्थ्य तथा आवासीय सुविधाओं में सुधार होगा. लेकिन इस नीति को देखें तो सच्चाई कुछ और ही दिखती है. ज्यादातर कर्ज स्थानीय स्तर की जवाबदेह या लोकतांत्रिक एजेंसियों को मिलते ही नहीं. ऐसी एजेंसियों को मिलते हैं जिन्हें वास्तव में बैंक ने लोगों को भ्रमित करने के लिए बना रखा है. जैसे- बिजली बोर्ड, जल बोर्ड आदि. इन योजनाओं लिए अंतररष्ट्रीय स्तर पर बोली ऐसी शर्तों र्पर लगाई जाती है कि भारतीय कंपनियां खुद ही बाहर हो जाएं. सार्वजनिक वित्त के लिए हम पूरी तरह से विश्वबैंक के उपर निर्भर हो गये हैं. वही हमें निर्देशित कर रहा है कि हमें क्या करना है? हम स्वीकार भी कर लेते हैंए जैसे कि हमारे सामने कोई रास्ता ही नहीं बचा हो. विश्वबैंकए आईएमएफ और डब्लूटीओ की नीतियां एकतरफा लादी जा रही हैंए यह वैश्वीकरण का दूसरा चेहरा हमें देखने को मिल रहा है. आय में असामनताए बेरोजगारी तथा उत्पादन में कमी आई है.

इन तथ्यों के मद्देनजर यह समझने का प्रयास करें कि खाद्य सुरक्षा योजना महज लोकसभा चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस का तुरुप का पत्ता नहीं है, बल्कि इसके पीछे कारपोरेट दिलोदिमाग हैं और खाद्य सुरक्षा के बहाने अर्थवयवस्था पर वैश्विक पूंजी का शिकंजा मजबूत करने की रणनीति है.

मान लिया कि गरीबी रेखा के नीचे को लक्षित है यह सामाजिक योजना तो वितरण प्रणाली के खात्मे के बाद आधार कार्ड योजना के मार्फत नकद सब्सिडी के तहत आप देश भर में गोदामों और परिवहनप्रणाली में, खुले आसमान के नीचे सड़े गले अनाज और कारोबारियों के मार्फत विदेश से अनाज मंगाकर खाद्य प्रबंधन करेंगे. लेकिन आधारमहर्षि इंफोसिस महान नंदन निलेकणि ने तो सिर्फ साठ करोड़ लोगों को आधार देने का वायदा किया है. बाकी साठ करोड़ का क्या होगा विनिवेश और निजीकरण की वजह से बाजार और उत्पादन प्रणाली, रोजगार में हाशिये पर जा रहे जनसमाज, जो निश्चय ही गरीबी रेखा के नीचे चिन्हित नहीं होंगे, जैसे खेत खलिहानों में कामकाजी किसान, कल कारखानों के मजदूर और छंटनी के शिकार कर्मचारी, यहां तक के विनिवेश के भुक्तभोगी एअर इंडिया के जैसे सफेदपोश अफसरान भी, इनकी खाद्य सुरक्षा के लिए क्या बंदोबस्त है?

सबसे बड़ी बात तो यह है कि जो लोग गरीबी रेखा के नीचे नहीं हैं और जिनकी नागरिकता और पहचान चिनहित नहीं है, इनके अलावा महानगरों , नगरों, कस्बों से लेकर गांव देहात में खाद्य पदार्थों की कीमतें जिस तेजी से आसमान छू रही हैं और आम जनता की क्रयशक्ति क्षीण होती जा रही है, जो इस योजना के लाभार्थी नहीं होंगे, उनकी भूख को कैसे संबोधित करेगा
राष्ट्र?

तेजी से फैलते माल प्रणाली और खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश के जरिये मृत कृषि और आत्महत्या करते किसानों के देश में जो इस अध्यादेश या विलंबित कानून के तहत खाद्य सुरक्षा के लाभार्थी बनने हेतु अपात्र है, उनकी भूख का क्या होगा?

राष्ट्रपति सचिवालय ने गुरुवार रात अध्यादेश को प्राप्त किया था और मुखर्जी ने आज उस पर मुहर लगा दी. जिसके बाद इस तरह की अटकलें समाप्त हो गईं कि भाजपा, वामदलों और कुछ अन्य बड़े दलों के विरोध के बाद संभवत: राष्ट्रपति अध्यादेश को मंजूर करने में जल्दी नहीं करेंगे.

इस योजना के अतिरिक्त अंत्योदय अन्न योजना के दायरे में आने वाले देश के करीब 2.43 करोड़ अत्यंत निर्धन परिवारों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत 35 किलोग्राम खाद्यान्न प्रति परिवार प्रति महीने मिलता रहेगा, लेकिन कानूनी अधिकार के साथ.खाद्य सुरक्षा अध्यादेश के अन्य प्रमुख लाभों में 6000 रुपए का मातृत्व लाभ और 6 से 14 साल के आयु वर्ग के बच्चों के लिए घरेलू राशन या गर्म पकाया हुआ खाना शामिल हैं. राशन कार्ड घर की सबसे बुजुर्ग महिला के नाम पर जारी किया जाएगा और ऐसा नहीं होने पर सबसे वरिष्ठ पुरुष के नाम पर राशन कार्ड जारी किया जाएगा.

राष्ट्रपति भवन के प्रवक्ता वेणु राजामुनि ने एक बयान में कहा, भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आज राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्यादेश, 2013 को लागू कर दिया. अधिकारियों के मुताबिक पूरे देश में इस योजना का प्रसार करने के लिए कम से कम छह महीने लग जाएंगे.

डीबीएस बैंक का कहना है कि खाद्य सुरक्षा विधेयक को लागू करने के निर्णय से चालू वित्त वर्ष में सरकार का राजकोषीय घाटा 4.8 प्रतिशत के लक्ष्य से आधा प्रतिशत आगे बढ़ सकता है और इससे मामला और जटिल बन सकता है.

सिंगापुर स्थित इस ब्रोकरेज फर्म ने एक रिपोर्ट में कहा, ‘इस साल राजकोषीय घाटा तय लक्ष्य से कम से कम आधा प्रतिशत ऊपर जा सकता है.’ रिपोर्ट में कहा गया है कि सब्सिडी बिल बढ़कर जीडीपी के 2.3 प्रतिशत तक पहुंच सकता है जो 1.9 प्रतिशत के लक्ष्य से काफी ऊपर है. सब्सिडी बिल में बढ़ोतरी की मुख्य वजह व्यापक स्तर पर खाद्य सब्सिडी होगी. राजकोषीय मोर्चे पर रुपये में गिरावट और बाद में कच्चे तेल में तेजी, आग में घी डालने जैसा काम करेगी.

कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) के अध्यक्ष अशोक गुलाटी को लगता है कि मौजूदा स्थिति में अध्यादेश शुरू में खराब लगकर बाद में सकारात्मक परिणाम देने वाला हो सकता है, क्योंकि सरकार के पास बड़ी मात्रा में खाद्यान्न का भंडार है.

उन्होंने कहा कि जब तक हम पीडीएस व्यवस्था तय नहीं करते, उत्पादन को स्थिर नहीं करते और भंडारण तथा परिवहन में निवेश नहीं करते तो उक्त लाभ कितने दिन तक मिलेगा.

गुलाटी ने कहा कि उन राज्यों में पीडीएस में लीकेज रोकने की चुनौती सबसे बड़ी है जहां गरीबी ज्यादा हैं. दूसरी सबसे बड़ी समस्या यह होगी कि खाद्य विधेयक की मांग को पूरा करने के लिए खाद्यान्न की बड़े स्तर पर सरकारी खरीद से गेहूं और चावल के बाजार से निजी कारोबारी बाहर हो जाएंगे.

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One thought on “किस किसके लिए खाद्य सुरक्षा और बाकी लोगों का क्या?

  1. सार खेल वोट बैंक का है,अन्य किसी भी पक्ष पर सोचने का माद्धा न हमारे नेताओं में हैं सलाहकार अरथ्शास्त्रियों में.न योजना करों में और न ही समाजशास्त्रियों में.देश के सामाजिक,आर्थिक,ढांचे को तार तार कर देने वाला यह विधेयक अपनी ही कमियों व नेताओं की महत्वाकंषाओं का शिकार न हो तो बड़ी बात होगी.2009 में कांग्रेस ने मनरेगा से चुनावी वैतरणी पार की थी,जो भ्रस्टाचार का अद्दबन कर रह गया,नेताओं दल के कार्यकर्ताओं व अधिकारीयों की आय का अच्छा साधन बन गया तो इस बार यह खाद्य सुरक्षा बिल नदी पार कराएगा व इन चोरों की खाद्य सुरक्षा करेगा.आम गरीब तो गरीब ही रहेगा,क्योंकि जिस दिन वह गरीबी स्तर से ऊपर उठ जायेगा,तब इनका सिंहासन हिल जायेगा.इस लिए अब तक गरीबी हटाने के तोतई नारे कहते रहें इस तरह के शागुफे हर चुनाव से पहले लेन जरूरी है,.गरीबी नेताओं की मिट रही है और इन बेचारों की ही मिटनी चाहिए.

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