साइबर सिटी के पहले मेयर शम्मी कपूर की आखिरी विदाई भी हुई इंटरनेट पर

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शम्मी कपूर: साइबर क्रांति के अगुआ

रविवार को सुबह देर से आंख खुली जब सेलफोन पर मेरे मित्र का फोन आया और खबर मिली कि शम्मी कपूर की मौत हो गई। इंटरनेट की कंसल्टेंसी चलाने वाले इस वेब डिजाइनर मित्र ने यह खबर इंटरनेट पर पढ़ी थी। उसे इस बात की हैरानी थी कि टीवी चैनलों पर यह खबर क्यों नहीं फैली है।

शम्मी कपूर का फैन होने के कारण उसे इस मौत का दुख भी था और साइबर वर्ल्ड से जुड़े होने के कारण पहले खबर पाने का फख्र भी। शम्मी कपूर की चर्चा शुरु हुई तो यादों के आइने में उनकी तस्वीर उभर कर सामने आ खड़ी हुई। एक विद्रोही तेवर वाले डांसिंग स्टार की नहीं, बल्कि उस शख्सियत की जो आज की आधुनिक दुनिया और थर्ड मीडिया का अगुआ था।

शमशेर कपूर उर्फ शम्मी कपूर से मेरी मुलाकात हुई थी 1997 के फरवरी माह में जब वे दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में साइबर सिटी के मेयर नियुक्त किए गए थे। उन्हें यह अनोखा पद दिया था नास्सकॉम के तत्कालीन अध्यक्ष देबांग मेहता ने और शम्मी कपूर ने भारतीय साइबर कार्यक्रम का ब्रांड ऐम्बेसेडर बनने के लिए कोई फीस भी नहीं ली थी। उन्होंने बड़ी ही संजीदगी से मुझसे कहा था, “आज बेशक इंटरनेट कुछ बड़ी हस्तियों और सुविधा प्राप्त लोगों के बीच की चीज है, लेकिन कल यह आम आदमी के पास मौजूद होगा।”

उनकी बात जल्दी ही सच भी साबित हुई। इंटरनेट, ई-मेल, ब्लॉग और सोशल नेटवर्किंग साइट्स आज आम आदमी की जिंदगी में इस कदर रच-बस गए हैं कि उसे ऑफिस, घर, दोस्त, रिश्तेदार सब इसी पर मिल जाते हैं। यहां तक कि इंटरनेट ने कई आंदोलन खड़े किए और कईयों को शांत भी किया। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक के बाद थर्ड मीडिया के तौर पर इसकी उपस्थिति से भी हर कोई भली भांति परिचित है। यहां यह भुलाया नहीं जा सकता कि पचास-साठ के दशक के क्रांतिकारी सुपर स्टार शम्मी कपूर ने नब्बे के दशक में इंटरनेट के आभासी संसार से ऐसा नाता जोड़ा था जो उनके मरने के बाद भी खत्म नहीं हुआ।

नेट सर्फिंग प्रिय शगल था शम्मी कपूर का

अमिताभ बच्चन और दूसरी फिल्मी हस्तियों के ब्लॉग और ट्विटर अकाउंट आज भले ही लोकप्रियता की नई उंचाइयां छू रहे हों, लेकिन कम ही लोगों को पता होगा कि शम्मी कपूर भारत के सबसे पहले इंटरनेट उपभोक्ताओं में से थे। विंडोज़ के कदम जमाने से भी पहले यानि 1991 में शम्मी इंटनेट से जुड़ चुके थे। उन्होंने मुझे बताया कि कैसे देबांग मेहता, मफतलाल, हरीश मेहता आदि के साथ मिल कर देश की पहली इंटरनेट यूजर्स सोसाइटी का गठन किया और कैसे नास्सकॉम बना। उन्होंने यह भी बताया था कि उन दिनों इंटरनेट के बाजार पर एकाधिकार रखने वाले वीएसएनएल ने भी उन्हें और उनकी संस्था को इसमें खासी मदद की थी।

जब याहू के सह संस्थापक जेरी यांग ने भारत में याहू लॉन्च किया तब उन्होंने भी शम्मी कपूर को साइट को लान्च करने के लिए बुलाया क्योंकि जंगली फिल्म में उनका ‘याहू’ काफी मशहूर है। बाद में शम्मी ने जंगली.ऑर्ग शुरु किया जो आजकल जंगली.ऑर्ग.इन पर शिफ्ट हो गया है और जिसे उनके एक फैन निखिल गंगवाने ने डेवलप किया है। इस साइट पर कपूर परिवार की तमाम निजी जानकारियां उपलब्ध हैं।

हालांकि शम्मी कपूर पचास-साठ के दशक में लड़कियों के दिलों के हर्ट थ्रोब माने जाते थे, लेकिन उनका निजी जीवन उतना चर्चित नहीं रहा। उन्होंने अपने समय की मशहूर अभिनेत्री गीता बाली (योगिता बाली की बुआ) से शादी की थी, लेकिन 1965 में उनकी स्मॉल पॉक्स से मौत हो गई। बाद में उनकी शादी भावनगर के महाराजा की पुत्री नीला देवी से हुई जिनसे उनकी बचपन से जान-पहचान थी।

शम्मी कपूर अपने साइबर शिष्य व फैन निखिल गंगवाने के साथ

शम्मी कपूर की अगली पीढ़ी ने फिल्मों में दिलचस्पी नहीं दिखाई। गीता बाली से हुई उनकी दोनों संतानों ने फिल्मी दुनिया से इतर अपना संसार बसाया। पुत्र आदित्य राज कपूर एक अर्से से गुड नाइट बनाने वाली कंपनी शोगुन से संबद्ध हैं तो पुत्री कंचन फिल्म प्रोड्यूसर मनमोहन देसाई के पुत्र केतन देसाई की पत्नी हैं। इसे शम्मी कपूर की ईमानदारी ही कहें कि कंचन ने ग्रैजुएशन की पढ़ाई बीच में छोड़ दी इसका भी ज़िक्र उन्होंने साफ-साफ किया है।

कितनी हैरानी की बात है कि थर्ड मीडिया के जिस पुरोधा ने हमें उंगली पकड़ कर इस दुनिया में चलना सिखाया आज वही इस दौड़ में पीछे रह गया। फिल्म जगत में आमिर खान, अक्षय कुमार, शिल्पा शेट्टी और बिपाशा बसु तक के ब्लॉग चर्चा बटोर लेते हैं, लेकिन शम्मी की चर्चा कहीं नहीं रही। शायद ऐसा इसलिए हुआ कि जब तक यह मीडिया आम आदमी तक पहुंची शम्मी बूढ़े और बीमार हो चले थे। इसके अलावा दूसरे लोगों ने जहां इंटरनेट को अपने प्रचार और संवाद का माध्यम बनाया, वहीं शम्मी कपूर इसे जिज्ञासा शांत रखने के लिए उपयोग में लाते थे। लेकिन इसे संयोग ही कहा जाएगा कि उनकी मौत की खबर इसी इंटरनेट पर लिखे अमिताभ बच्चन के ट्विटर ब्लॉग ने कुछ ही पलों में पूरी दुनिया में फैला दिया।


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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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One thought on “साइबर सिटी के पहले मेयर शम्मी कपूर की आखिरी विदाई भी हुई इंटरनेट पर

  1. क्या बात है धीरज जी.. आप का नाम बिलकुल आप के स्वभाव के मुताबिक लगता है.. इतनी बहु आयामी जानकारी का भण्डार समेटे शांत और धीर गंभीर लेख लिखते हैं आप.. मैं तो फैन हो गया

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