भारी बरसात से नरक यंत्रणा की शुरुआत

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-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​||

अभी मानसून लगातार बरस नहीं रहा है. लेकिन एक रात और अगले दिन दोपहर की बारिश से कोलकाता और उपनगरों मे उत्तराखंड के जलप्रलय का स्पर्श मिल गया. कोलकाता की रामकहानी हर बरसात में एक जैसी है, उसमें सुधार होने के आसार बहुत कम है. लेकिन कोलकाता महानगर के उत्तरी और दक्षिणी उपनगरों में नरक यंत्रणा की शुरुआत हो चुकी है. महानगर में फिर भी निकासी की व्यवस्था देर सवेर हो जाती है.30TH_KOLKATA

उपनगरों में अंधाधुंध र्माण की वजह से जल निकासी के तमाम रास्ते अवरुद्ध हो गये हैं. नालियां और नहरें, उपनदियां तो पाट दी गयी हैं. झीलों, पोखर और तालाब भी खत्म हो गये हैं.जरा कल्याणी हाईवे पर नजर डाले तो बिराटी से कल्याणी तक जलाशयों पर बन रहे प्रोमोटर राज से कल्याणी से लेकर बेलघरिया तक चारों तरफ लहराते समुंदर की असली वजह मालूम हो जायेगी. यह हाल सोनारपुर से लेकर बारुईपुर तक का है. एक इंच जलाशय बाकी बचा नहीं है. साल्टलेक बन जाने के बाद कोलकाता में प्राकृतिक झीलों की परिधि कम हो जाने से महानगर में जीर्ण शीर्ण निकासी व्यवस्था पर अभूतपूर्व दबाव है तो सोनारपुर बारुईरपुर से लेकर कल्याणी तक जमा जल बाहर निकलने का कोई रास्ता ही नहीं है. बैरकपुर से लेकर डनलप तक जलनिकासी के लिए परंपरागत निकासी प्रणाली बागजोला खाल का उपयोग अब अवैध शराब की आपूर्ति लाइन बतौर होती है.

रात भर की बारिश से बीटीरोड समुंदर में तब्दील हुआ. बेलघरिया और सोदपुर रेलवे ब्रिज के मुहाने तक पानी भर गया. सोदपुर मध्यम ग्राम मार्ग पर रविवार को दिन भर यातायात बंद रही. बसें नही चलीं.

जैसोर रोड पर जलजमाव होने से बारासात से लेकर दमदम हवाई अड्डेतक यातायात ठप पड़ गयी तो दमदम रोड पर नावें चलाने की हालत बन गयी. पानीहाटी, खड़दह, टीटागढ़, बरानगर, कमारहट्टी, दमदम, विधाननगर, सोनारपुर, महेशतला, बैरकपुर, नैहाटी, कल्याणी नगरपालिकाओं में आम जनजीवन शनिवार की रात को हुई बरसात से ठप पड़ गया.kolkata

वहीं हुगली के उस पार ग्रांड ट्रंक रोड के संकरे रास्ते पर हालत कुछ बेहतर नही थी. मुंबई रोड से जुड़ने वाली बांकड़ा मार्ग हो या सलप से सालकिया रोड. या डनलप से सोदरपुर जाने वाली नीलगंज रोड सर्वत्र जलजला था. हावड़ा नगरनिगम और चंदननगर नगर निगम में भी जलनिकासी का इतजाम कोलकाता से कोई बेहतर नहीं है, यह साबित हो गया. विडंबना है कि शहर नियोजन के लिए गठित लंबे-चौड़े सरकारी अमले पानी के बहाव में शहरों के ठहरने पर खुद को असहाय पाते हैं. सारा दोष नालों की सफाई ना होना, बढ़ती आबादी, घटते संसाधन और पर्यावरण से छेड़छाड़ को दे दिया जाता है. पर इस बात का जवाब कोई नहीं दे पाता है कि नालों की सफाई सालभर क्यों नहीं होती और इसके लिए मई-जून का ही इंतजार क्यों होता है.

ईएम बाईपास, दिल्ली मुंबई हाईवे और कोना एक्सप्रेस में ही यातायात सामान्य रही.

छुट्टी का दिन होने से समस्या उतनी विकराल नहीं हुई. वरना थोड़ा पानी पड़ने से तो सियालदह दक्षिण और सियालदह उत्तर शाखाओं में ट्रेन सेवा भी ठप पड़ जाती है. गैरसरकारी दफ्तरों आपातकालीन सेवाओं में लगे लोगों के लिए कार्यस्थल तक पहुंचने और वापस घर लौटने के लिए मेटाडोर वाहन ही उपलब्ध थे.घर बैठे भी लोगों को राहत नहीं मिली. रविवार के दिन सेटटाप बाक्स के जरिये मनोरंजन टैक्स की रंगदारी के खिलाफ केबल आपरेटरों ने टीवी प्रसाऱण बंद कर दिया. आज वे पूर्व घोषित कार्यक्रम के मुताबिक हड़ताल पर थे. नेट के जरिये सूचना हाईवे पर टहलने वाले लोगों के लिए भी बरसात मायूसी बनकर आयी. जगह जगह लोकल फाल्ट की वजह से केबल के जरिये इंटरनेट सेवा अस्त व्यस्त रही.

सच पूछें तो देश के हर शहर का हाल थोड़ी सी बरसात में ऐसा ही हो जाता है. कोलकता को तो पहली ही बारिश ने दरिया बना दिया है. पिछले कुछ सालों में देखा गया कि हरियाणा, पंजाब के कई तेजी से उभरते शहर- अंबाला, हिसार, कुरुक्षेत्र, लुधियाना आदि एक रात की बारिश में तैरने से लगते हैं. रेल, बसें सब कुछ बंद. अहमदाबाद, सूरत के हालत भी ठीक नहीं.
अभी पटना में गंगा तो नहीं उफनी पर शहर के वीआईपी इलाके घुटने-घुटने पानी में तैरते रहे. किसी भी शहर का नाम लें, कुछ न कुछ ऐसे हालात देखने-सुनने को मिल ही जाते हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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