एसपी सिंह को टेलीविजन के ढ़ाँचे में रखकर आज भी बेचा जा सकता है

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-अंशु सिंह||

27 जून को एसपी सिंह (सुरेन्द्र प्रताप सिंह – आजतक) को याद किया जाता है . एसपी की मृत्यु 16 बरस पहले हुई. लेकिन एसपी को टेलीविजन के ढ़ाँचे में रखकर आज भी बेचा जा सकता है, यह अहसास कई बार हुआ है. प्रश्न करने और उत्तर देने का जो परंपरागत ढ़ाँचा है, उसके अनुसार प्रश्न छोटे होते है और उत्तर लंबे. यह उन्हींने सिखाया था. आजकल पत्रकार सवाल करते है और नेता जी जवाब देते है. प्रश्नोत्तर का ढ़ाँचा बदल गया है. सवाल लंबे होते है, जवाब छोटे. सवालों में विरोध से लेकर चमचागिरी तक सब नजर आती है. जवाबों में मुर्खता से लेकर गैर जिम्मेदारी तक सब टपकता है. इसलिए एसपी सिंह विशेष तौर पर याद आते है. उनकी प्रखरता और विजन कमाल की थी. जो आज की पत्रकारिता में मिसिंग है.SP-Singh

एसपी सिंह ने तो कभी अपने 20 मिनट के बुलेटिन में विज्ञापनों की बाढ़ के बावजूद साढे चार मिनट से ज्यादा जगह नहीं दी. दस सेकेंड के विज्ञापन की दर को बढ़ाते बढ़ाते लाख तक पहँचा दिया था. लेकिन अब तो उल्टा चलन है. विज्ञापन बटोरने की होड़ में 100 करोड़ तक की लेन देन कुछ अलग ही फोरमेट पर होने लगा है. यह खासकर हिन्दी न्यूज चैनलो का सच है. और अगर अब के नायक चेहरे एसपी सिंह को याद करते करते बाजार का रोना या हंसना ही देख कर खबरों की बात करने लगे तो सुनने वालो के जेहन में जायेगा क्या. और ऐसी बहसो को सुन-देख कर जो फेसबुक में लिखा जायेगा, वह भी इसी तरह सतही होगा. अब के दौर के नायक चेहरों का ग्लैमर आसमान छू रहा है. लेकिन पत्रकारिता की साख कभी भी लोकप्रिय अंदाज, बाजार के ग्लैमर, बिकने – दिखने या फिर एसपी सरीखे पत्रकारिता के गुणगान से नहीं बढ़ सकती. मौजूदा दौर की पत्रकारिता को कठघरे में खड़ाकर जायज सवालो को उठाकर उसपर बहस कराने से कुछ आग जरुर फैल सकती है.

तो सच की जमीन भी नायक चेहरों के जरीये नहीं बल्कि अपने आसरे बनाने होगी. सॉकोल्ड ग्लैमर को कम करना होगा. सवाल-जवाब के लिये हर नायक चेहरे से वक्त तय कर ठोस मुद्दों का जवाब मांगना चाहिये. जिससे मौजूदा पत्रकारिता का विश्लेषण हो सके. और तस्वीर और चेहरों की रिपोर्टिंग से बचते हुये जो मुश्किल मौजूदा पत्राकरिता को लेकर उभरे, उसके लिये रास्ता निकालने की दिशा में सोशल मीडिया से जुडे लेखकों को बहस चलानी चाहिये.

(अंशु सिंह के फेसबुक वाल से साभार)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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