बेटियां पूछ रही हैं, क्या ओढ़ू मैं….

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-फाल्गुनी सरकार||

परिधान तब अस्तित्व में आया होगा जब मानव को लगा कि इससे उसके शरीर को ढक़ा जा सकता है और इससे शरीर सुन्दर दिखेगा. पर आज उस परिधान को लेकर एक बहस छिड़ गई है. बहस ये है कि लड़कियां जब बाहर निकले तो अपने परिधान और शालीनता का ध्यान रखें. बेशक इसमें कोई बुराई नहीं है. पर आखिर ये समाज किस परिधान को शालीन मानता है? अगर एक लडक़ी जीन्स-टप पहन ले और उसे एक लडक़ा छेड़ दे तो पूरा पुरूष वर्ग एक सुर में कहता है कि लडक़ा तो जो किया वो गलत है पर लडक़ी भी बराबर की भागीदार है क्योंकि वो ऐसे कपड़े पहन के निकलती है. तो क्या मैं ये समझूं कि अन्ना को भ्रष्टाचार का आंदोलन छोड़ कर एक नया आंदोलन शुरू करना चाहिए जिसके तहत वो कम-से-कम भारत में जीन्स-टप जैसे कपड़ों पर रोक लगा सके. अगर लडक़ी अपने ही देश में, शहर में और गली में जीन्स-टॉप नहीं पहन सकती क्योंकि उसे उसी के समाज के पुरूषों के द्वारा टीका-टिप्पणी और अभद्रता का सामना करना पड़ेगा तो मुझे बहुत ही दु:ख है कि मैं ऐसे समाज का हिस्सा हूं. पढ़े-लिखे समाज में हुई एक सार्थक बहस से मुझे ये पता चला कि लोग आज भी शोषण का शिकार हुई लड़कियों पर अफसोस करते हुए वो दोष खोज निकालते हैं Indian-girlsजो लडक़ी में है जिसके कारण वो शोषण का शिकार हुई है.

वाह! यही समाज प्रगति करता है. अगर वाकई पहनावे के कारण लड़कियों के साथ छेड़-छाड़ होती है तो फिर कुछ सवाल हैं उन परिधान के विशेषज्ञों से:-

  • आखिर क्यों पुरूष एक साड़ी में लिपटी औरत पर अश्लील टिप्पणी करता है?
  • क्यों सलवार सूट पहनी शादी-शुदा औरत को अश्लीलता और छेड़छाड़ सहनी पड़ती है?
  • क्यों बाज़ार जाती मां को अधेड़ या युवा के बेहुदेपन का सामना करना पड़ता है?
  • क्यों छोटी-छोटी बच्चियों को यौन शोषण जैसे दुष्कृत्य से गुज़रना पड़ता है?
  • क्यों स्कूल आती-जाती बच्चियों को हर रोज़ खुद को शोहदों से बचाना पड़ता है?

 

आखिर क्या कमी है हमारी मां-बहनों के परिधान में? साड़ी हो या सलवार, फ्रॉक हो या जीन्स, हर लिबास में उसे शोषण का सामना करना ही पड़ता है जो ज्यादातर मौखिक कटाक्ष होते हैं और इस तरह से कसे जाते हैं कि होंट सिल जाते हैं. भीड़-भाड़ वाली जगह हो या सुनसान रास्ते, हर कहीं पुरूष ने अपनी हैवानियत, जिसे वो अपनी मर्दानगी कहते हैं, का प्रदर्शन करने का रास्ता खोज लिया है. मैं ये पूरी तरह से मानती हूं कि लिबास जितना सभ्य हो उतना ही उत्तम होता है. पर अब समय बदल चुका है. एक समय था जब लडक़े मांग में सिंदूर और गले में मंगल-सूत्र देखकर खुद को संभालते हुए निकल जाते थे. इस कारण कई लड़कियों ने इसे अपना लिया ताकि वो खुद को सुरक्षित रख सके. पर आज अकेली चलती हर औरत चाहे वो किसी भी उम्र की हो, किसी भी लिबास में हो, उसे बख्शा नहीं जाता है. यहां तक कि समूह में अपनी भूख मिटाने निकले भेडिय़ों को अगर सुनसान जगहों पर जोड़े मिल जाते हैं तो वो उन्हें भी नोच डालते हैं.

मुझे वाकई डर लगने लगा है और अपनी बेटियों की चिंता हो रही है जिन्हें रोज़ाना इन्हीं के बीच से गुज़रना पड़ता है. क्योंकि वो भीड़ में भी अकेली होती है. भीड़ केवल मूक दर्शक है. भीड़ में वे लोग होते हैं जो नपुंसकता का प्रतिनिधित्व करते हैं. जिनमें शिकार करने की हिम्मत तो नहीं होती पर किसी और के शिकार का लुत्फ ज़रूर उठाते हैं. अगर आप ये कहें कि लडक़ी को बाज़ार नहीं जाना चाहिए या निकलना नहीं चाहिए तो उनकी शादी नहीं हो सकती. जी हां! ये सच है क्योंकि आज के युग में हर लडक़ा एक ऐसी पवित्र लडक़ी चाहता है जिसका चरित्र सीता की तरह हो और जो इंदिरा नूयी की तरह कमाऊं और सफल हो. जो एक सीढ़ी बने उसे उसकी मंजिल तक पहुंचाने के लिए और मंज़िल पर पहुंचते ही वो राम बनकर अपनी सीता की अग्नि परीक्षा ले. आखिर ऐसी मानसिकता वाले बीमार समाज से आप क्या उम्मीद रखते हैं?.. कि वो आपकी हिफाज़त करेगा..? कतई नहीं. वो आपको और आपके पहनावे पर उंगली उठाएगा और मज़े ले-लेकर इसके बारे में बात करेगा. यू-ट्यूब पर वीडियो डाऊनलोड करके फेसबुक पर शेयर करेगा.

परिधान के विशेषज्ञ अपने परिधान के नीचे इसी रूग्ण मानसिकता को ढ़ंकते हैं. परिधान से छेड़छाड़ का रिश्ता जोडऩा एक बेहद शर्मनाक बात है, खासकर एक पढ़े-लिखे वर्ग के लिए. वो भी उस समय जब आए दिन महिला आवासों, जेलों, मानसिक अस्पतालों, पुर्नावास केन्द्रों और यहां तक की एंबुलेंसों में नारी की अस्मत से हो रहे खिलवाड़ की खबरें तक रोज अख़बारों की सुर्खियाँ बनती हैं. बहस के दौरान एक सज्जन ने बड़ी ही अच्छी बात कही कि चीन जहां अंतरिक्ष में दूसरी दुनिया बसाने जा रहा है वहीं हम अभी भी समाज की कुरीतियों पर बहस करने में व्यस्त हैं. उनसे मैं प्रभावित हुई. परन्तु बहस ना करने का ही ये नतीजा है कि आज समाज का एक तबका इस तरह से बहशीपन पर उतर आया है कि अपनी तरफ उठती हर आंख से लडक़ी सहम उठती है. हमें इस बहस की बहुत ज़रूरत है. अगर अभी भी शर्म के कारण इस पर बहस ना की गई तो फिर हमें महफूज़ रहने का कोई अधिकार नहीं रह जाएगा…

मेरी चौखट पर सर टेकने वाले, मुझे उस नकार से ना देख.

नौ दिन जागराता करके मेरा, मुझ पर फब्तियां न फेक..

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4 thoughts on “बेटियां पूछ रही हैं, क्या ओढ़ू मैं….

  1. iesi liye oodo ki tumeh koyee paridhan samman ko soch kar hi banay hai tum hamari beti ho bahan ho tumeh kaiya karna hai kais karna hai yes hamare mata pita bade log tumhari bhalayee chahate hai tumara saman banaye rkhana chate hai yadi aaj yahi prashan hai ki kaiyo oodu to aap apneni marji se sadak par nirbassta ho kar ghumo janwaro ki tarah koyee naho rokega chahe jo so karo koyee kuchh nahi kahega kaiya hoga koyee nahi jaanta kisi ke prati koyee jabab dehi nahi banegi AAP SWATANNTAR HO RAHO.

  2. bchchiya [bahine] mataye sharm odde hayaa pahane prem orr vishawash ke sath aatiymbal ki prati moorti bane apne aap dharsti dosh khatam ho jayega chimgam chawati hai ooden shar par leti nahi shina tane be hayaaayi se lajja chod kar ghumti hai kisi ka samman karti nahi naitk shikachh ab shikachha chhetar mai bachi nahi shikchh ne to kewal mashain bana suru kar diya hai kewal paisa bali mashin ho kar nilte hai bachce fier ye bimariyr to aayegi hi dosh kis ko dena

  3. bharat ki ladkiya sharm oode hayaa pahane sabskar ke aachana kare chigamm chabat hai oddni leti nahi kisi ka samman kari nahi by haayayi ka vyvhaar karti hai yese mai yes ghatan ho jaati hai aadni [purush] bhi maryaadit ho shikchha ka praroop badlo sanskar ke adhar ki shikachh ho kewal mashin banane wali shikchha pranalibann karo yese rone se kaama nahi chaleg kisi ko koshane se bhibaat nai bangi.

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