गहलोत ने तोड़ी मर्यादा की सीमाएं, वसुंधरा भी कम नहीं

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कांग्रेस की संदेश यात्रा और भाजपा की सुराज संकल्प यात्रा के दौरान रोजाना मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे एक दूसरे के शासन पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप लगाते-लगाते व्यक्तिगत टीका-टिप्पणियों पर उतर आते हैं। इससे कहीं न कहीं ऐसा प्रतीत होता है कि सत्ता प्राप्ति के जुनून में उन्हें यही ख्याल नहीं रहता कि उनकी भाषा मर्यादा की पटरी से उतर जाती है। इस वजह से जहां आमजन में दोनों खिल्ली के पात्र बन रहे हैं, वहीं राजनीतिक माहौल में गरमाहट के साथ कड़वाहट भी फैल रही है।Ashok-Gehlot1
स्वाभाविक सी बात है कि चूंकि वसुंधरा विपक्ष में हैं, इस कारण उनके पास हमला करने के लिए कई मुद्दे हैं, जबकि गहलोत का सारा जोर अपनी उपलब्धियों पर रहता है, मगर आम तौर पर संयत रहने वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक सभा में वसुंधरा के बारे में प्रचलित जुमले एट पीएम नो सीएम का प्रयोग कर मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दीं। ऐसा करके न केवल उन्होंने अपना स्तर गिरा दिया, अपितु इसकी तीखी प्रतिक्रिया भी हुई। ईटीवी राजस्थान पर तो इस मुद्दे पर बाकायदा बहस तक हो गई, जिसमें कांग्रेस प्रवक्ता के पास केवल ये कहने को था कि वसुंधरा भी तो व्यक्तिगत टीका टिप्पणियां करती हैं। दूसरा ये कि यह जुमला कोई गहलोत ने नहीं बनाया है, यह तो आम जनता में पहले से प्रचलित है। बहरहाल, जो कुछ भी हो इस प्रकार की व्यक्ति आधारित चरित्रगत टिप्पणी को गहलोत की गरिमा के सर्वथा प्रतिकूल माना जा रहा है।
असल में इस प्रकार की टीका टिप्पणियों का दौर पिछले काफी समय से चल रहा है। इससे पहले जैसे ही वसुंधरा राजे ने एक मुहावरे का उपयोग किया तो उस पर वार-पलटवार ऐसा हुआ कि मुहावरे का ही पोस्टमार्टम हो गया। असल में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वसुन्धरा राजे के इस बयान पर कि हमने चूडिय़ां नहीं पहनी हैं, जैसे ही पलटवार करते हुए कहा कि यह बयान नारी जाति का अपमान है और इसके लिए वसुंधरा को सम्पूर्ण नारी जाति से माफी मांगनी चाहिये, वसुंधरा ने भी पलट कर कह दिया कि उन्हें तो मुख्यमंत्री के ज्ञान पर तरस आता है, जिन्हें चूडिय़ां नहीं पहन रखी जैसे मुहावरे तक का भावार्थ मालूम नहीं है। अच्छा होता बयान देने से पहले वे इस मुहावरे का किसी समझदार व्यक्ति से अर्थ मालूम कर लेते। मैं तो आज भी दोहरा रही हूं कि हमने अर्थात हमारी पार्टी ने चूडिय़ां नहीं पहन रखी। उन्होंने ये भी कहा कि  सम्पूर्ण नारी जाति से तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को माफी मांगनी चाहिए, जिनके गृह मंत्री होते हुए राजस्थान में महिलाओं की इज्जत हर दिन तार-तार हो रही है।
इसी प्रकार एक मुद्दा और भी गरमाया हुआ है। वसुंधरा बार-बार कह रही हैं कि वे गहलोत की धमकी से घबराती नहीं हूं, जो आज तक अपने आरोपों को साबित नहीं कर पाए हैं। यह बात उन्होंने पूर्व गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया का नाम सोहराबुद्दीन एनकाउंटर में शामिल किए जाने के बाद तो काफी जोर-शोर से कही। इस मुद्दे पर गहलोत की ओर से कहा गया कि वसुन्धरा राजे बार-बार कह रही है कि वे डरती नहीं है। मैं जानना चाहता हूं कि उन्हें किसने और कब धमकी दी और क्यों दी तथा उनके डर का कारण क्या है, इसका खुलासा करें। जब कि सच ये है कि वसुंधरा ने नहीं डरने वाला बयान दिया ही इस कारण था कि वसुंधरा के सिलसिले में गहलोत तमिलनाडू और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री के जेल जाने तक के उदाहरण दिये थे। जो सीधे तौर पर एक व्यक्तिगत धमकी ही थी।
दोनों के बीच अन्य कई टिप्पणियां भी हुईं, जो कितनी स्तरहीन हैं, इसका अंदाजा आप पढ़ कर स्वयं ही लगा सकते हैं:-
सलूंबर व लसाडिय़ा की सभाओं में वसुंधरा ने कहा कि कांग्रेस सीबीआई से डराती है लेकिन मैं सीबीआई के बाप से भी नहीं डरती। कांग्रेस हमारी यात्रा की नकल में यात्रा निकाल रही है। यह संदेश यात्रा नहीं शोक संदेश यात्रा है।
इसी प्रकार बांसवाड़ा के परताऊ, अरथूना, आनंदपुरी में उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री की सभाओं में कोई ताली नहीं बजाता। वे इसलिए अपने भाषण में बार बार कहते हैं, बजाओ ताली। गहलोत ने अपने भाषण में कहा कि मुझे बहनजी नहीं मैडम कहलवाना पसंद है। मैं 36 कौम की बहन थी, हूं और रहूंगी। मैं ऐसे लोगों की बहन नहीं जो बहनों को सुबह शाम गालियां निकालते हैं। ऐसे भाइयों को तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।
यात्रा के दौरान गोगुंदा में तो यह तक कह दिया कि इस सरकार के मुखिया इतिहास के सबसे भ्रष्टतम मुख्यमंत्री हैं और यह सरकार भ्रष्टतम सरकार। मुख्यमंत्री तो गोपालगढ़ में गोलियां चलवा रहे थे और मैं दुख दर्द बांट रही थी।
गहलोत ने भी टिप्पणियां करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी है। श्रीकरणपुर की सभा में उन्होंने कहा कि राजा रानियों को तो कांग्रेस ने अंग्रेजों के साथ ही रवाना कर दिया था, वसुंधरा राजे के रहने के लिए लंदन ही ठीक है। राजस्थान को पांच साल लूट लिया, अब फिर से लूटने के लिए तैयार हो रहे हैं। सुराज लाएंगे या सुरा राज लाओगे।
इसी प्रकार संगरिया, नोहर व भादरा की सभाओं में उन्होंन कहा कि वसुंधरा राजे अब मोटरसाइकिल पर बैठ रही हैं। वसुंधरा चाहे मोटरसाइकिल पर बैठें या ऊंट पर, लेकिन भाजपा की सरकार फिर भी नहीं बनने वाली। गंगानगर की सभा में व्यक्तिगत छींटाकशी करते हुए उन्होंने कहा कि वसुंधरा नई नई पोशाकें पहन कर लोगों के बीच जा रही हैं। नई पोशाकें पहनने से नया राजस्थान नहीं बनता। श्रीकरणपुर में कहा कि चुनावी साल में अब वे यहां आएंगी और कई लटके झटके दिखाएंगी। हमसे ये लटके झटके तो होते नहीं है। मैं तो सीधे तरीके से जो दिल में आता है अपनी बात कह देता हूं। लटकों झटकों से लोकतंत्र नहीं चलता है। आप इन लटकों झटकों के चक्कर में आ गए और वोट दे दिया तो नुकसान ही होगा।
इसी प्रकार हनुमानगढ़ की सभा में कहा कि पांच साल के कुशासन में वसुंधरा राजे ने प्रदेश को जमकर लूटा। इसे जयपुर का बच्चा-बच्चा जानता है, किस तरह दलाल होटलों में बैठक सौदे करते थे। वसुंधरा के अफसर बेशकीमती गलीचे चोरी करके ले गए। वसुंधरा ने धौलपुर में दलितों की जमीन हड़प ली। लुटेरे फिर आ गए हैं।
बांसवाड़ा के कुशलबाग में उन्होंने कहा कि वसुंधरा राजे आदिवासियों के बीच झूठ बोलकर गईं कि भाजपा राज में 10 लाख नौकरियां दी गईं। जब प्रदेश में सरकारी कर्मचारी ही 6.5 लाख है तो 10 लाख नौकरियां कहां से दे दी?
कुल मिला कर दोनों की तल्ख व्यक्तिगत टिप्पणियों से राजस्थान का माहौल खराब होता जा रहा है। ऐसे में राजनीति के जानकारों को अचरज हो रहा है कि कांग्रेस व भाजपा के इन दोनों दिग्गजों को क्या हो गया है। होना तो यह चाहिए कि वे अपना भावी एजेंडा पेश करते, जिसके गुणावगुण पर विचार करके मतदाता अपना मानस बना सके। हालत ये है कि अब तक दोनों पार्टियों ने अपने घोषणा पत्र तक नहीं बनाए हैं।
-तेजवानी गिरधर

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अजमेर निवासी लेखक तेजवानी गिरधर दैनिक भास्कर में सिटी चीफ सहित अनेक दैनिक समाचार पत्रों में संपादकीय प्रभारी व संपादक रहे हैं। राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रदेश सचिव व जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ राजस्थान के अजमेर जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। अजमेर के इतिहास पर उनका एक ग्रंथ प्रकाशित हो चुका है। वर्तमान में अपना स्थानीय न्यूज वेब पोर्टल संचालित करने के अतिरिक्त नियमित ब्लॉग लेखन भी कर रहे हैं।
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3 thoughts on “गहलोत ने तोड़ी मर्यादा की सीमाएं, वसुंधरा भी कम नहीं

  1. गहलोत तो शुरू से ही छिछले राजनीतिज्ञ रहें हैं,परन्तु वसुंधरा का सीमाओं को लांघना उपयुक्त प्रतीत नहीं होता,गहलोत के हाव भाव तथा भाषणों की पटकथा कुछ खिसयाई खिसयाई सी लगती है.पता नहीं क्यों वे बेक फुट पर नजर आये लगते हैं.पिछले कार्यकाल में गहलोत सारा पैसा जमा कर कांग्रेस के चुनावी फण्ड में दे रहे थे,इस बार वे कुछ खर्च कर रहें हैं पर शोर ज्यादा है,योजना चालू करने का श्रेय वे लेना चाहते हैं,पर वास्तविकता के धरातल पर उनका क्या हश्र है,शायद उन्हें इसका पता नहीं या वह अनदेखा कर रहें हैं.लगता है योजनाओं पर खर्च से ज्यादा वह उपलब्धियों के विज्ञापन पर कर रहें हैं.देखतें हैं अगले छह माह में ऊंट किस करवट बैठता है,

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