बाबा रामदेव! यह आपने क्या किया?

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-आनंद सिंह
बाबा रामदेव को लेकर हमारी बिरादरी वाले पृथक-पृथक बातें कर रहे हैं। कुछ साथियों का कहना है कि बाबा रामदेव भ्रष्ट सरकार के झांसे में आ गए तो कुछ साथियों की तल्ख टिप्पणी है कि बाबा रामदेव के साथ सरकार ने विश्वासघात किया है। चर्चाओं का दौर जारी है। सरकार को अंदेशा है कि भगवा ब्रांड के लोग देश भर में इसी बहाने उपद्रव फैलाने की कोशिश करेंगे इसीलिए गृह मंत्रालय ने देश भर में एलर्ट जारी कर दिया है। अनेक स्थानों से काला दिवस और प्रतीकात्मक विरोध की खबरें आ रही हैं। पर, इन घटनाक्रमों के आलोक में किंचित हम तथ्यों को बिसार चुके हैं। जो तथ्य हैं, वे भयावह हैं।
विभिन्न मीडिया संगठनों से छन-छन कर जो खबरें आ रही हैं, उसमें यह साफ-साफ कहा गया है कि बाबा और सरकार के बीच समझौता हुआ था। यह समझौता था दो दिनों तक रामलीला मैदान में भाषण, प्रवचन, योग शिविर और तप करने के संबंध में। बाबा ने लिखित सहमति दी थी कि वह 4 तारीख को दोपहर बाद किसी भी वक्त तप करने की घोषणा कर देंगे ताकि केंद्र सरकार की सेहत पर कोई असर न पड़े। पर, बाबा ने यह नहीं किया। बढ़ती भीड़ के साथ बाबा का मनोबल बढ़ता गया। यह सब देख केंद्र सरकार की तरफ से वार्ता करने वालों के तेवर कड़े हो गए। मानव संसाधन विकास मंत्री सिब्बल, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, सुबोधकांत सहाय ने ने एक स्वर में कहा कि लोगों को बरगलाने का प्रयास करने पर बाबा के खिलाफ एक्शन भी लिया जा सकता है। और, रात डेढ़ बजे यही हुआ। क्या हुआ, यह आपको बताने की जरूरत नहीं। क्या आपको नहीं लगता कि बाबा ने हमसे और आपसे छुप कर सरकार से जो सहमति पत्र पर दस्तखत किया, वह देश की जनता से छल था। क्या आपको नहीं लगता कि योग के नाम पर 4400 करोड़ रुपये की संपत्ति जमा करने वाले रामदेव बाबा अतिरेक में बह कर अति की सीमा पार कर रहे थे। सच तो यह है कि योग के नाम पर लोगों को रामलीला मैदान में जमा कर वह अन्ना हजारे के मारे डरी केंद्र सरकार को और डरा कर अपना हित साधने के मूड में थे। एक संन्यासी को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यह आप खुद से पूछें और जवाब में जो बातें सामने आती हों, उसे 4 तारीख के घटनाक्रम से टैली कर देखें। सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
भारत का 400 लाख करोड़ रुपये विदेशी बैंकों में जमा है, यह रहस्योद्घाटन बाबा रामदेव ने नहीं किया था। यह तो विगत कई सालों से इस देश की जनता जान ही रही थी। अजिताभ बच्चन का प्रकरण कौन भूल सकता है। तब राजा मांडा, विश्वनाथ प्रताप सिंह इस देश के प्रधानमंत्री थे। वीपी चले गए, भाजपा ने इस मुद्दे को कैच कर लिया। पर, रामदेव भाजपाइयों से भी चालाक निकले। उन्होंने विदेशों में पड़े धन की इतनी मार्केटिंग कर डाली कि लोगों को लगने लगा कि यह मसला बाबा का ही उठाया गया है। लोग उनके साथ जुड़ने लगे क्योंकि इस देश में करप्शन का मारा हर दूसरा भारतीय है। मुद्दा समकालिक था, लिहाजा बाबा को लोगों का समर्थन मिलने लगा। लगातार समर्थन मिलते देख बाबा बौड़ा गए और अपना हित सबसे ऊपर रखा। मेरी धृष्टता माफ करें। मुझे बताएं, जनता से क्यों कहा गया कि बाबा रामदेव अनिश्चितकालीन आमरण अनशन पर बैठ रहे हैं (मंच पर सबसे बड़ा बैनर यही लगा था) और सरकार से शुरू हुयी वार्ता में यह क्योंकर लिख कर दिया गया कि दो दिनों में अनशन समाप्त कर दिया जाएगा। यह जनता को छलने का प्रयास नहीं तो और क्या है।
आप चाहें तो कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह को जम कर गरिया सकते हैं पर उनका सवाल माकूल है। उन्होंने पूछा था कि अगर आमरण अनशन ही करना था तो इतनी भीड़ क्यों। भीड़ को पानी पिलाने के लिए 150 आरओ, एसी, कूलर, पंखे पर जो लाखों का खर्च आ रहा है, वह पैसा कहां से आया। मजेदार यह कि किसी ने भी इस सवाल का जवाब नहीं दिया। दिग्गी ने यह भी पूछा था कि आगे बैठने वालों से 21,000, 11,000, 5000, 31,00 रुपये लिये जाते हैं, योग सिखाने के नाम पर तो जब आप योग सिखा रहे हो और पैसे वसूल रहे हो तो आपमें और एक साधारण बिजनेसमैन में क्या फर्क रह गया। आप भी सोचें, मनन करें कि दिग्गी राजा ने क्या गलत कहा।
दरअसल, करप्शन खत्म करने के बहाने अपनी राजनीति चमकाने वाले इस माधर जात राजनीतिज्ञों से बचने की जरूरत है। करप्शन का यह मसला हमारे-आपके बीच का है। इसे हम ही सलटा लें तो ज्यादा बेहतर। वरना कौन किस वेश में डकैत निकल आए, पता ही नहीं चलेगा।

(लेख आनंद सिंह के फेसबुक पोस्ट पर आधारित)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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