ट्रेड लाइसेंस को लेकर गिरोहबंदी…!

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-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​||

पश्चिम बंगाल के हर नगरनिगम और नगरपालिकाओं के दफ्तरों में कर्मचारियों और दलालों की गिरोहबंदी का आलम यह है कि नकद भुगतान पर किसी को भी बिना जांच पड़ताल ट्रेड लाइसेंस जारी कर दिया जाता है। राज्यभर में चिटफंड कंपनियों की बाढ़ के पीछे यह गिरोहबंदी बहुत बड़ी ताकत के रूप में काम कर रही है। लेकिन आम नागरिकों के लिए जिनके पास ऐसे गिरोह को उनकी मांग के मुताबिक भुगतान के लिए पर्याप्त पैसे नहीं होते, दर दर पापड़ बेलने पड़ते हैं अपना अपना कारोबार शुरु करने के लिए।Picture156_14Nov09

यह किस्सा हावड़ा हो या कोलकाता, मालदह हो या सिलिगुड़ी, आसनसोल हो या दुर्गापुर या कोई जिला या फिर शहर, सर्वत्र आम है। राज्यभर में लोग अपना कारोबार शुरु करने के लिए इस अपराध गिरोह के मोहताज हैं, जिन्हें मजबूत राजनीतिक संरक्षण मिला होता है।

म्युटेशन के मामले जो झमेला है, उससे कई गुणा ज्यादा मुश्किल काम है जेनुइन लोगों के लिए ट्रेड लाइसेंस निकालना। फर्जी लोगों के लिए कोई मुश्किल नहीं है।

आप कायदा कानून के मुताबिक कुछ लिये दिये बिना लाइसेंस हासिल करने की उम्मीद से हैं तो लगाते रहिये लाइसेंस बाबू के दफ्तर में चक्कर। वे आपको चरखी तरह नचाकर दम लेंगे। पर आपकी मुश्किल आसान नहीं होगी। लेकिन जहां आप दादा गिरोह की शरण में चले गये, तो जेबें हल्की करा लेते ही आपके हाथों में होगा ट्रेड लाइसेंस।

दादाओं की मेहरबानी अपरंपार है। अगर उनकी पूजा सही तरीके से हो गयी तो कोई जरुरी नहीं कि आपको लाइसेंस नगर निगम या पालिका दफ्तर जाकर लेना पड़े। लाइसेंस चलकर आपके ठिकाने तक पहुंच जायेगा। दादाओं के अपने अपने दफ्तर बी है जो खूब चलते हैं।आप ​​लाइसेंस बाबू को दर्शन दिये बिना वहां से भी लाइसेंस हासिल कर सकते हैं।

ऐसा भी नहीं है कि संबंधित निकाय के मेयर या पालिकाअध्यक्ष या विपक्ष को इस गोरखधंधे के बारे में कुछ मालूम नहीं है। पर इस गिरोहबंदी के आगे उनकी राजनीतिक ताकत छोटी पड़ जाती है अक्सरहां। अमूमन बहती गंगा में हाथ दो लेने वाले भी कम नहीं होते। उनकी ओर उंगली उठा ली तो गये आप काम से !

राजनीतिक लोगों से पंगा लेकर किसकी छाती में इतना दम है कि कारोबार शुरु भी कर लें तो बिना हुज्जत के चला लें। फिर किस दीवाने को हुज्जत लने का शौक होगा?

इस गिरोहबंदी की असली ताकत यह है कि कारोबारी जमात ज्यादा झमेले में नहीं पड़ता। ज्यादातर किस्से ले देकर मामला बना लेने के हैं।बाकी लोग भी देखादेखी मुश्किल आसान करने में ही अपना हित देखते हैं।

फाइलें इन दादाओं की मर्जी से उड़ती हैं या ठहर जाती हैं। अफसरों को तो घोड़ा बेचकर सोने की आदत है। उनको तो पता ही नहीं चलता कि उनके महकमे में उनके नाम से कैसा कैसा धंधा चलता है। मालूम हुआ , फिर भी वे सोते रहते हों, तो इसे क्या कहा जाये?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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