प्रदेश के विकास के लिए भूमि बैंक भी स्थापित करने होंगे हिमाचल में

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केन्द्रीय विश्व विद्यालय सहित हर शहर में कई योजनाएं जमीन की उपलब्धता न होने  के कारण है  बंद पड़ी हैं..

-अरविन्द शर्मा||
हिमाचल विकासशील प्रदेश है , यहाँ की सरकार तथा जनता इसे तरक्की के शिखर तक ले जाना चाहती है।  परन्तु यहाँ 99 प्रतिशत काम भूमि की उपलभधता न होने के कारण रुक जाते है या कभी कभी तो होते ही नहीं है। ऐसा नहीं है की सरकारी या बेकार पड़ी जमीन हिमाचल में उपलब्ध नहीं है, परन्तु असल में भूमि का युक्तिकर्ण नहीं किया गया है। उच्चतम न्यायालय के आदेशों के अनुसार वन भूमि को अन्य किसी कार्य के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना भी तरक्की में बड़ा बाधक है, क्यूंकि एक जमाने में अधिकतर खाली पड़ी सरकारी जमीन को वन विभाग के नाम कर दिया गया तथा और अब यही कदम हिमाचल प्रदेश के विकास सबसे बड़ा बाधक बन गया है। shimla-city
पूर्व प्रशासनिक अधिकारी आर एम् शर्मा कहते है , “अब सने आ गया है की सरकार एक बड़ी योजना बना कर हर कस्वे के आस पास की जमीन का एक भूमि बैंक के अंतर्गत अधिकरण करे और जब भी तरक्की के लिए जरूरत  हो तो इसे आवश्यकता अनुसार बांटा जाये। सरकारी उपलब्ध भूमि का हर जगह बेतरतीब मिलना और सम्बन्धित विभागों को इसकी जानकारी न , तरक्की में बड़ी बाधक मणि जाती है। ” शर्मा कहते है की इसी कारण धरमशाला में स्थापित किये जाने वाले केन्द्रीय विश्व विद्यालय  को आज तक भूमि न मिल पाई है।
पूर्व पुलिस अधिकारी पी आर ठाकुर कहतें है की अगर धर्मशाला का ही उधाहरण ले तो कई विभागों तथा उनके उछ अधिकारियों की कोठियों की साथ बेशुमार भूमि अंग्रेजों के समय से दी गयी है। उदाहरन के लिए चील गाड़ी की सभी कोठियां अथवा एस पी हाऊस,  डी सी हाऊस  तथा सी एम ओ हाऊस इत्यादि शामिल हैं। सरकार को एक क़ानून बना कर अधिकारियों की कालोनिया अलग बनानी चाहिए तथा बाकी की भूमि को भूमि बैंक में डालना चाहिए। ऐसी फालतू भूमि लगभग हर शहर अथवा कस्वे में मौजूद है।
सदी के सवालों से जूझते हिमाचल  की जरूरतें अब ऐसी जमीन को खोज रही हैं, जहां अगली सदी की आधारशिला रखी जा सके। बिना भूमि के मास्टर प्लान हो नहीं सकता। अतः यहां लैंड बैंक के जरिए उपलब्ध खाली जमीन का नए सिरे से इस्तेमाल करना होगा। यह समस्या प्रदेश के हर छोटे-बड़े शहर की है।  प्रदेश में जनसंख्या दबाव और शहरी गतिविधियों में बदलाव अब नगर निकायों की क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है।  असली समस्या शहरीकरण के प्रबंधन की है और  हिमाचल को इसे संजीदगी से लेना होगा ओर अपने शहरों का क्षमता का विस्तार करना होगा। इस तरह ही  शहरों के आसपास बेतरतीब आवास, परिवहन, शिक्षा व चिकित्सा क्षेत्र विकसित हो पायेंगे । अब यह हर तरह से अति आवश्यक बन गया है की  प्रदेश के हर शहर के लिए मास्टर प्लान बनाना चाहिए और इसको अमल में लाने के लिए नगर निकायों के भूमि बैंक भी स्थापित करने होंगे।
यदि  लैंड बैंक न बनाये गए तो  राजनीतिक आधार की गयी  घोषणाएं जमीन उपलब्ध न होने से हमेशा की तरह खारिज होती जायेंगी हैं। केन्द्रीय विश्व विद्यालय सहित हर शहर में कई योजनाएं जमीन की उपलब्धता के कारण बंद हैं। लैंड बैंक के जरिए शहरों को आगे बढ़ने का मौका मिलेगा और इससे शहरी क्षमता का विकास होगा। हिमाचल को इसके लिए  पुणे शहर का उदाहरण लेकर  हिमाचली शहरों को अतिरिक्त भूमि हासिल करने का कोई न कोई जरिया ढूंढना होगा।
केंद्र से मांग की जानी चाहिए कि  वन विभाग की बंजर जमीन विकास के लिए राज्य सरकार को मिले।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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