संसाधन विहीन कालेज कैसे बनायेगा अभियन्ता..?

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अम्बेडकरनगर: जिले का इंजीनियरिंग कालेज उपेक्षा का शिकार..प्राचार्य से लेकर प्रवक्ता तक की नियुक्ति स्थाई नहीं…प्रयोगशाला एवं छात्रावास की व्यवस्था नहीं….

-रीता विश्वकर्मा||
अम्बेडकरनगर। मायावती द्वारा बसपा शासनकाल में इस जिले को दिए गए कई खास तोहफों में से एक मान्यवर कांशीराम इन्स्टीट्यूट ऑफ इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी कालेज उपेक्षा का शिकार है। कालेज भवन व हास्टल निर्माण तो प्रभावित हुआ ही है साथ ही अभी तक इसे आई.सी.ए.सी.टी. से मान्यता भी नही मिल पाई है, जिसके चलते इस कालेज का अपना कोई अस्तित्व ही नहीं दिखाई पड़ रहा है। मान्यवर कांशीराम आई टी इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ने वाले छात्र/छात्राओं को कई कठिन परिस्थितियों से भी जूझना पड़ रहा है, जिसमें ‘छात्रावास’ एवं प्रयोगशाला की व्यवस्था का न होना सर्व प्रमुख है। इस आई टी कालेज की स्थापना मायावती के चतुर्थ शासन काल में हो गई थी और छात्र/छात्राओं का प्रवेश 2010 में ही शुरू हो गया था।Photo I.T. Collage
2010-11 और 2011-12 दो शिक्षा सत्र में इस कालेज में प्रवेश पाए छात्र/छात्राओं ने दो वर्ष तक के.एन.आई.टी. सुल्तानपुर में शिक्षा ग्रहण किया और तीसरे वर्ष 540 भावी अभियन्ताओं का स्थानान्तरण मा.कांशी राम आई.टी. इंजीनियरिंग कालेज अम्बेडकरनगर में सत्र 2012-13 के शिक्षण हेतु कर दिया गया। कालेज में इंजीनियरिंग की तीन शाखाओं में सिविल इंजीनियरिंग, इंफार्मेशन टेक्नोलॉजी व इलेक्ट्रिकल विभागों का संचालन किया जा रहा है। उक्त तीन विभागों के 540 छात्र/छात्राओं को प्रवेश उपरान्त के.एन.आई.टी. सुल्तानपुर में दो वर्ष तक कुल 4 सेमिस्टर शिक्षा ग्रहण करनी पड़ी और फिर दो वर्ष उपरान्त सत्र 2012-13 की पढ़ाई के लिए उन्हें अम्बेडकरनगर स्थानान्तरित होना पड़ा। वर्तमान सत्र में प्रथम से लेकर तृतीय वर्ष की छात्र/छात्राएँ शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
गौतमबुद्ध प्राविधिक विश्व विद्यालय की शाखा के रूप में स्थापित इस आई.टी. कालेज को एन.सी.ई.टी.ई. से मान्यता भी नहीं मिल सकी है। इस कालेज के छात्रों को पढ़ाई व प्रयोगशाला आदि के लिए सुल्तानपुर के.एन.आई.टी. तक का चक्कर लगाना पड़ रहा है। वहाँ भी छात्रों की संख्या अधिक होने के चलते यहाँ के बच्चों को कहने भर का समय प्रयोगशाला आदि के उपयोग के लिए मिल पाता है। शिक्षण व प्रशासनिक भवन के अलावा छात्रावास का भवन अभी निर्माणाधीन है। छात्रावास के अभाव में लड़कियों को परेशानी न हो वैकल्पिक व्यवस्था के तहत कालेज प्रशासन द्वारा शहजादपुर कस्बे में किराए के एक आवासीय परिसर को गर्ल्स हॉस्टल के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा जिसमें 92 छात्राएँ व 6 महिला प्रवक्ता रहतीं हैं। इनको आने-जाने में कोई दिक्कत न हो इसके लिए एक बस की व्यवस्था की गई है। उक्त हॉस्टल में तीन महिला वार्डेन मिस विनीता गुप्ता, मिस आरती सिंह, सोनालिका मौया (तीनों प्रवक्ता) भी हैं। इस तरह लड़कियों को तो आवासीय व्यवस्था उपलब्ध करा दी गई है, लेकिन छात्रों को ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कई छात्रों ने बताया कि वह लोग कालेज के निकटवर्ती गाँवों, कस्बों एवं मोहल्लों में महंगे किराए पर कमरे लेकर रह रहे हैं, जहाँ अव्यवस्था के चलते वे लोग पढ़ाई ठीक ढंग से नहीं कर पाते हैं। यहाँ यह भी बताना आवश्यक है कि एक छात्र की सालाना फीस 55,500रू. है। चार वर्षीय कोर्स के लिए लगभग ढाई लाख रूपए का खर्च आता है। कालेज परिसर मे छात्रावास न होने से वोर्डिंग और फूडिंग पर प्रतिमाह 5 हजार से अधिक खर्च हो रहे हैं। छात्र भले ही न परेशान हों, लेकिन उनके अभिभावकों को अवश्य ही आर्थिक रूप से हानि उठानी पड़ रही है।
आश्चर्य का विषय है कि ऐसे महत्वपूर्ण अभियान्त्रिकी संस्थान में अभियन्ता बनाने वाले शिक्षार्थियों को पढ़ाने के लिए 27 मेहमान प्रवक्ताओं का सहारा लेना पड़ रहा है। इस कालेज के प्राचार्य से लेकर प्रवक्ताओं की नियुक्ति भी स्थाई नहीं है। कालेज के कोआर्डिनेटर डॉ. बी.एन. राय का इस बारे में कहना है कि शीघ्र ही प्रवक्ताओं और गैर शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति कर ली जाएगी। इसके लिए जी.बी.टी.यू. द्वारा समाचार-पत्रों में विज्ञप्तियाँ जारी की जाएँगी। अभी तक जो भी टीचर हैं वह एक वर्ष के अनुरोध-अनुबन्ध पर यहाँ के छात्र/छात्राओं को पढ़ा रहे हैं। वह स्वयं के.एन.आई.टी. में अध्यापक हैं और सुल्तानपुर से अप-डाउन करते हैं। कोआर्डिनेटर डॉ. राय ने कहा कि यहाँ सबसे बड़ी समस्या प्रयोगशाला की है। प्रयोगशाला न होने की स्थिति में प्रयोगात्मक अध्ययन के लिए छात्र/छात्राओं को के.एन.आई.टी. ले जाना-आना पड़ता है, जो काफी कठिन एवं कष्टकारी है। इंजीनियरिंग कालेज में आगामी कुछेक महीनों में शिक्षक एवं गैर शिक्षक (50 के लगभग दोनों) की नियुक्ति गौतमबुद्ध प्राविधिक विश्व विद्यालय द्वारा कर ली जाएगी। पहले 27 टीचर्स की स्थाई नियुक्ति होगी तत्पश्चात् 23 नॉन टीचर स्टाफ की भर्ती होगी। कुल मिलाकर यदि देखा जाए तो जुगाड़ के सहारे चल रहे इस आई टी कालेज में छात्र/छात्राओं को पग-पग पर बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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