दैनिक अखबारों की तो ठीक मगर साप्ताहिक की डगर कठिन- मयंक

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-दिलीप सिकरवार||

वरिष्ठ पत्रकार मयंक भार्गव ने माना कि दैनिक समाचार पत्र का प्रकाशन मुश्किल भरा होता है किन्तु नामुमकिन नही. क्योंकि सरकार की रहम दृष्टी से डेली अखबार चल जाते है, मगर साप्ताहिक समाचार पत्र का सम्पादन घास के ढेर में अंगूठी तलाशने जैसा है.IMG0278A कोई सालों से साप्ताहिक अखबार चला रहा है तो वाकई ऐसे जज्बे को सलाम किया जाना चाहिए. श्री भार्गव खुद राष्ट्रिय एवं प्रादेशिक स्तर के अखबार, टी वी न्यूज़ चैनल में काम कर चुके हैं. आज उनका दैनिक राष्ट्रिय जनादेश निकल रहा है. जो अपनी खासी पहचान बना चूका है.
पापुलर न्यूज़ इंडिया/ आत्मा का तांडव के एक कार्यक्रम में श्री भार्गव बोले- आज का समय प्रिंट और द्रश्य दोनों ही के लिए जटिल है. अपनी पहचान कायम रखने के लिए सतत महनत जरूरी है. केवल अखबार निकल लेना ही काफी नही है.
सम्पादक विन्देश तिवारी ने जटिल परिस्तिथि में अख़बार का प्रकाशन के भेद खोले. इस कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा, कुकुट विकास निगम के अध्यक्ष मोईनुद्दीन, कलक्टर राजेश मिश्रा, पूर्व विधायक विनोद दागा, निगरानी समिति चेयर मेनन प्रशांत गर्ग, हरिओम, राजेन्द्र आदि शामिल थे.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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