खुल गये स्कूल, हलकी करिए जेब…

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-दिलीप सिकरवार||

स्कूल चले हम ….! सरकार का बच्चों को स्कूल भेजने के नारे के पीछे कितने लोगों का पेट पलता है, इसका नमूना गली- गली में खुले स्कूलों और इन स्कूलों में चलनेवाली ड्रेस, कापियां, किताबें, बेचने वाली संस्थाओं से पूछिये. यकीन मानिये, इस धंधे में इतना मुनाफा है की चंद दिनों की कमाई में यह दूकानदार महीनों चैन से खा-पी सकते हैं . ऐसी कई किताबें इन दिनों आपको खरीदनी होगीं  जो शायद आप फ्री में भी न लें. स्कूलों का आतंक इतना है की अपने बच्चों को यहाँ पढ़ना है तो उनकी सुनना ही होगा.school

पालकों के लिए यह समय दुविधा भरा है. स्कूलों के खुलने के साथ ही उनकी जेबें हलकी होने का सिलसिला शुरू हो जाता है जो पूरे सालभर चलता है. कॉपी, किताबों से लेकर फीस में अच्छों की हालत खराब हो रही है. बड़ी क्लासों की बात छोड़ दें तो छोटी क्लास की किताबें दो से ढाई हजार में मिल रही है. केवल बुक्स. इसके अलावा बच्चों को लुभाने वाटर बेग, पेंसिल, कोवेर्रोल वगेरा का खर्च अलग.

स्कूल प्रबंधन भी आपसे ही चलेगा, सो अनुदान की व्यवस्था पालकों के जिम्मे होती है. यहाँ सर देख कर टोपी पहना दी जाती है. सामान्य तोर पर ४ से ६ हजार मामूली बात है. स्कूल के हिसाब से दाम देने पढ़ते हैं. हां, ये जान लें की इन पर किसी का अंकुश नहीं है.न प्रशासन का, न शासन का….. शासन तो कई स्कूलों के मालिक चलातें है. सो इन्हें पूरी छुट है लूटने की. यह तर्क दे सकतें हैं की स्कूल की व्यवस्था, आदि में बहुत खर्च होता है जिसे हम पालकों से नहीं तो फिर किससे वसूल करेंगे?

यही वजह है की स्कूल छुतियों का पैसा भी पालकों से वसूल रहे है. वो भी एक महीने स्कूल की आड़ में तीन महीने की फीस ली जा रही है. यानि अवकाश में भी कमाई.

आरटीआई का मजाक बन गया. किसी का ध्यान नहीं है.मार्च में ही कई स्कूलों में प्रवेश फुल के बोर्ड लगा दिए थे. मिशनरी स्कूल तो किसी से नहीं डरते. ऐसे में ‘स्कूल कैसे चलें हम’ कहना बेहतर लगता है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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