ब्रिक सम्मेलन में चीन के सामनें क्यों मौन रहे मनमोहन?

praveen gugnani

पिछले दिनों हमारें प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने डरबन में ब्रिक्स शिखर सम्मलेन में आये  चीन नव नियुक्त के राष्ट्रपति शी चिनफिंग से भेंट की. चीन में नेतृत्व परिवर्तन के बाद दोनों देशों के बीच यह पहला उच्च स्तरीय संपर्क है. SecondBRIC2-source-Jose-Cruz_ABr-singh-and-jintao-300x200इस बैठक के ठीक पूर्व राजनयिक दृष्टिकोण से दोनों देशों द्वारा जारी व्यक्तव्यों में जो कहा गया उससे इस बैठक में भारत चीन के बीच दशकों से उलझें विवादों पर चर्चा या कोई सार्थक परिणाम की आशा व्यर्थ ही थी. कुछ दशकों में ऐसा स्पष्ट देखनें में आया है कि विवादित विषयों पर चीनी नेतृत्व ने जानबूझकर उकसानें वाले  कृत्य किये या अनावश्यक बयानबाजी की है और इस सभी अवसरों पर भारतीय नेतृत्व ने सुरक्षात्मक प्रकार के जवाब देकर या चुप रह कर अपनी लाचारगी और बेचारगी का प्रदर्शन भर किया है. अन्दर खानें चर्चा थी अपनें कि प्रधान मंत्रित्व के अंतिम वर्ष में मौन सिंह के लेबल को हटानें के लिए वे अन्तराष्ट्रीय टेबिलों पर (ख़ासकर पाकिस्तान और चीन के विरुद्ध)लड़ाके का रूख अख्तियार करेंगे किन्तु ऐसा कुछ हुआ नहीं. हाल ही में और अधिक उलझनें की और अग्रसर विषय ब्रह्मपुत्र, तिब्बत, ग्वादर बंदरगाह और अरुणाचल प्रदेश और चीन द्वारा समय समय पर जारी किये जानें वालें विवादित भौगोलिक नक्शों पर राजनयिक कौशल्य का प्रदर्शन करनें के बजाय हमारें प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने इस बैठक के दौरान अपनी बातचीत में चीनी राष्ट्रपति से बड़े ही मधुर स्वर में कहा कि उन्हें बड़ा सुखद लगता है कि वे पिछलें एक दशक के दौरान चीनी नेतृत्व के साथ चौदह से अधिक बैठकों और मुलाकातों में सम्मिलित हो चुकें हैं. चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने भी शक्कर घोल लपेट कर  प्रधानमंत्री से कहा कि उन्हें अपने पूर्ववर्ती हु जिन्ताओ और पूर्व प्रधानमंत्री वेई के साथ उनके (सिंह के) अच्छे संबंधों की जानकारी है और वह इसे आगे भी जारी रखना चाहेंगे. “लब्बोलुबाब यह कि इस बैठक में भारतीय हितों के शोरबे बनें जो चीनियों को बड़े जायकेदार लगें”!!

                                          पिछले ही वर्ष की बात है जब भारत के विदेश मंत्री ऐ. के. अन्थोनी ने भारतीय गणराज्य के अविभाज्य अंग अरुणाचल प्रदेश का आधिकारिक प्रवास किया तो इस पर चीनी विदेश मंत्रालय ने आपत्ति जताई थी. भारतीय विदेश मंत्रालय ने तब इस बात पर रोष भी प्रकट किया था किन्तु आज यदि हमें चीन से सम्बन्ध सुधारनें की बैठक में बैठना है तो इस विषय को भी हमें भूलना और ताक पर रखना पड़ा है तो यह एक प्रकार का वैचारिक और रणनीतिक पक्षाघात ही है.  किन्तु प्रश्न यह है कि आखिर इन भेंट मुलाकातों का परिणाम क्या है? यह  कि निर्विवादित है  कि राष्ट्राध्यक्षों को परस्पर विवादों के बाद भी मिलतें रहना चाहियें किन्तु यहाँ पर हमें यह देखना होगा  व समीक्षा करनी होगी कि क्यों हमारें प्रधानमन्त्री पिछली चौदह भारत चीन मुलाकातों में सदैव ही भारतीय भारतीय हितों को दृढ़ता से रखना और उस पर अड़े रहना तो छोडिये उन्हें स्वर भी नहीं दे पा रहें हैं!! यह अब स्पष्ट हो चला है कि इन पिछली चौदह मुलाकातों में चीनी नेतृत्व ने भारत चीन के बीच के अविवादित मुद्दों पर भी भारतीय हितों को चोटिल किया और बेहतर और अपेक्षाकृत अधिक राजनयिक चतुराई से अविवादित विषयों को भी अन्तराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष विवादित कर देनें के अपनें चतुराई भरे अभियान में सफल रहा हैं.  भारतीय विदेश मंत्रालय पिछले लगभग एक दशक से चल रहे इस चीनी अभियान को समझ तो रहा है किन्तु बेहतर राजनयिक नेतृत्व के अभाव में न तो वह यथोचित उत्तर दे पा रहा और न ही समयोचित स्वर में बात कर पा रहा है. हाल ही डरबन में सपन्न राजनयिक भेंट भी चीन द्वारा चलाये जा रहे “हाइड एंड सीक” गेम की बलि चढ़ गई लगती है. कहना न होगा की “यह बैठक भारत चीन विवाद के प्रमुखतम विषय अरुणाचल सीमा विवाद, तिब्बत विवाद, ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन द्वारा बनाएं जा रहें तीन बांधों का विवाद और हाल ही में समस्या का स्थायी रूप ले चुके ग्वादर बंदरगाह आदि विवादों पर भारतीय पक्ष प्रस्तुत किये बिना ही समाप्त होकर चीन  की “विवाद उपजाओ” – “चर्चा करो पर सामनें वाले को बोलनें मत दो” और फिर “कब्जा कर लो” अभियान का एक अंश भर है.

इस बैठक के पूर्व जो राजनयिक प्रस्ताव दोनों  देशों के द्वारा किया गया उसमें ही विषबीज स्पष्ट हो जातें हैं. चीनी राष्ट्रपति शी ने कहा था की “परस्पर संबंधों को सुधारनें के लिए दोनों देश विभिन्न विषयों पर पूर्व के विवादों व मतभेदों को दरकिनार कर चर्चा करेंगे. यह तो हाथ बाँध कर पंगत पर बैठाने जैसा ही काम था जी हमारें प्रधानमन्त्री ने किया भी.

पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में चीनी निवेश, ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध का निर्माण और पाकिस्तान के चश्मा विद्युत परियोजना में चीनी परमाणु रिएक्टर का निर्माण शामिल है ऐसे विषय है जो इतिहास की दृष्टी से अपेक्षाकृत नयें हैं और चीन इन वैदेशिक व राजनयिक मोर्चों की सफलता के माध्यम से इनमें हावी होता जा रहा है. इधर सीमा विवाद के विषय में भी चुप्पी ही रही जिसमें  भारत लगातार जोर देकर कहता रहा है कि सीमा विवाद 4,000 किलोमीटर इलाके मैं फैला है, जबकि चीन का दावा है कि इसके तहत अरुणाचल प्रदेश का 2,000 किलोमीटर क्षेत्र आता है, जिसे चीन दक्षिणी तिब्बत कहता है. चीन द्वारा निरंतर सताए और शोषित किये जा रहे तिब्बती समुदाय की तो लगता है बात ही इस बैठक में विस्मृत हो गई थी. ये समझना अत्यंत कठिन काम है कि ये दोनों नेता भारतभूमि पर सतत हो रहे तिब्बती युवाओं के दर्द भरे आत्मदाहों की लम्बी श्रंखला पर चर्चा क्यों नहीं कर पाए. आज केवल भारतीय ही नहीं सम्पूर्ण विश्व की आँखें तिब्बतियों के स्वतंत्रता संघर्ष, दलाई लामा  की अपीलों और तिब्बती युवाओं की आत्मदाह की घटनाओं पर लगी रहती हैं. दलाई लामा के संघर्ष को भारतीय विदेश नीति से निर्बाध समर्थन और सुहानुभूति है फिर क्यों हम चीन के साथ टेबल पर बैठ कर भी इस विषय पर भारत और विश्व समुदाय की चिंता को चीनी नेतृत्व के सामनें नहीं रख पाए?

सबसे अधिक हैरानी वाला विषय चीन द्वारा पाकिस्तान से ग्वादर बंदरगाह पर चुप्पी का रहा. आनें वालें समय में भारत पाकिस्तान चीन सम्बन्ध त्रिकोण और इस क्षेत्र की भौगोलिक, सैन्य और अन्तराष्ट्रीय विषय इस बंदरगाह पर खड़े होकर ही देखें और निर्णित किये जायेंगे इस विषय को पता नहीं क्यों भारतीय विदेश  मंत्रालय अनदेखा सा कर रहा है?  उधर इसके उलट ग्वादर बंदरगाह के अधिग्रहण और अन्य घोषित अघोषित गतिविधियों और षड्यंत्रों से दक्षिण एशिया में चीन आर्थिक और कूटनीतिक कोशिशें तेज कर रहा है. हिंद महासागर के आस पास चीन के बढ़ते प्रभाव ने नई दिल्ली को चिंता में डाल दिया है. बीजिंग के श्रीलंका, बांग्लादेश, मालदीव और म्यांमार जैसे देशों से चीन के संबंध मजबूत होते जा रहे हैं. भारत के इन पड़ोसियों को चीन आर्थिक मदद भी दे रहा है और वहां आधारभूत संरचनाएं भी पक्की कर रहा है.

चीन द्वारा ग्वादर बंदरगाह के अंधाधुंध किन्तु आधुनिक और तकनीकी विकास का काम पूरा होने के बाद चीन की नौसेना इसका उपयोग कर भारतीय  सामरिक सुरक्षा को चिंता और चुनौती दोनों में ही डालेगी. अरब सागर में स्थित ग्वादर बंदरगाह के विकास पर आने वाले 24 करोड़ 80 लाख डालर के खर्च का 80 फीसदी हिस्सा देकर चीन इस क्षेत्र में पाकिस्तान से पश्चिमी चीन तक ऊर्जा एवं खाड़ी देशों से व्यापार के लिए कारिडोर खोलने की योजना बना चुका है. चीन ने भारत के पड़ोसी देशों श्रीलंका के हंबनटोटा और बांग्लादेश के चटगांव में भी बंदरगाहों के निर्माण में वित्तीय मदद दी है वह भी भारतीय संप्रभुता को एक विस्तृत खतरा बन गई है. चीन द्वारा चलायें जा रहें खरबों डालर के इस अभियान की वसूली वह भारतीय संप्रभुता से करेगा इसकी चिंता या तो हमें है नहीं या हमें बोलतें, व्यक्त करतें नहीं आता; वर्तमान परिदृश्य में यह कहना यद्दपि लाचारगी दर्शाता है तथापि कठोर धरातल पर कडवी सच्चाई तो यही कहती है.

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