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सुब्रत राय: पानी में फंसा मगरमच्छ ( एक )

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-कुमार सौवीर||

सुब्रत राय को हवाई किले और महल बनाने में महारत है। अपनी ऐसी हवाई वायदों की योजना के तहत पहले तो सहारा ने प्रचारित किया कि निवेशकों की रकम तीन साल में दुगुनी की जाएगी। इसके लिए निवेशकों को बताया गया कि सहारा इंडस्ट्रियल कम्पनी है। लेकिन हकीकत यह थी कि सहारा ने लोहे की कील तक बनाने की फैक्ट्री नहीं बनायी। subrato royइसके बाद तो वायदों की जैसे बारिश ही आ गयी। सहारा टेक्सटाइल्स, एयर सहारा वगैरह-वगैरह। लेकिन जमीन पर कोई काम धेला भर का नहीं हुआ। खेल और खिलाडि़यों को प्रायोजित करने के प्रयोग भी कंपनी के प्रचार में सफल हुए। लोगों को आकर्षक सुनहले वायदे बेच कर रकम उगाना ही सहारा का इकलौता धंधा बन गया। तीन साल में निवेशकों की रकम दोगुना हो रही थी, तो निवेशक खुश थे। उन्हें  पता ही नहीं था कि सुब्रत राय और सहारा इंडिया का मूल धंधा था केवल इसकी टोपी उसके सिर। यानी पैसा उगाहो, म्यूचिरिटी की वक्त पर अदायगी करो, और प्रशंसा हासिल करते हुए कई-कई गुना ज्यादा उगाही करना। बस।

सुब्रत राय को जल्दी ही पता चल गया कि आम आदमी की नब्ज क्या, कितनी और कैसे दबायी जा सकती है, ताकि पैसों का पहाड़ सहारा में बन जाए। सुब्रत राय ने अपना धंधा चिट-फंड फर्म से हटा कर कम्पनी के तौर बदल दिया और बाजार में उतारी एक नयी स्कीम। नाम था गोल्डेन-की। निवेशकों को झांसा दिया गया कि यह सपनों को साकार करने वाली चाबी है और जिसकी परची निकलेगी, उसे भारी रकम मिलेगी। इसने भारी उगाही की। लेकिन अचानक ही सरकार ने इस योजना को अवैध उगाही की श्रेणी में डालते हुए उसे फौरन बंद करने और निवेशकों की रकम उन्हें वापस दिलाने का हुक्म दिया। मगर तब के राजनीतिक हालातों ने सहारा के पक्ष में माहौल बनाया और सहारा को वक्त दिला दिया कि वह पैसा अदा करने के बजाय कम्पनी की दूसरी योजनाओं स्थानांतरित कर दे। इतना ही नहीं, राजनीति में पैसे के दमखम का ढोल बजने के चलते सहारा ने कई नव-बड़े मालदार नेताओं से रिश्ते बनाये और उनकी रकम कम्पनी में लगायी। बताते हैं कि वायदा यह दिया गया कि इससे उनका पैसा सुरक्षित तो रहेगा ही, साथ ही नेताओं का काला पैसा सहारा अपनी जादू की छड़ी फेरते हुए सफ़ेद करने का वादा किया।

यह स्कीम हिट हो गयी, और इसके साथ ही कम्पनी भी। काला पैसा आया तो सहारा ने क्रिकेट वगैरह कार्यक्रम बेहिचक और दिल खोल कर प्रायोजित कराये, माध्यम बनाये और खरीदे भी। खास-खास शहरों में बड़ी बिल्डिंग बनवायी ताकि निवेशकों का और ज्यादा भरोसा हासिल किया जा सके। यह धंधा चलता गया और सुब्रत राय और सहारा इंडिया के सपनों को अचानक मानो पंख ही लग गये। जल्दी ही एयर-सहारा के नाम से पंखा के बजाय हवाईजहाज आसमान में दिखने लगा लेकिन इसके जहाज जल्दी ही जमीन पर खड़े हो गये और यह एयर कम्पनी बिक गयी। इसके बाद से ही कम्पनी के पास उत्पादन के नाम पर कुछ नहीं बचा। कम्पनी अब केवल उगाही में ही जुटी रही। झूठे वादों की सफलता के बल पर कंपनी बढ़ती जा रही थी। मगर उसकी टोपी उसके सिर वाली शर्त पर. सहारा के लिए यह जरूरी था कि वह निवेशकों को बताते रहे कि कम्पनी में ठोस काम चल रहे हैं। इसके लिए विजय माल्या वाली फार्मूला वन टीम का 500 करोड़ रूपये मूल्य का 42-5  प्रतिशत हिस्सा खरीद लिया। आईपीएल पर अपनी दावेदारी के लिए सुब्रत शुरू से ही केवल प्रदर्शन के स्तर पर काम कर रहे थे। जाहिर है कि प्रचार-प्रदर्शन से खर्च बेहिसाब हो रहा था, जबकि उगाही की दर बेहद कम।

ऐसे में सहारा की रियल इस्टेट से जुड़ी दो कम्पनियों सहारा कमॉडिटी सर्विसेज कार्पोरेशन लिमिटेड (एससीएससीएल, जिसका नाम पहले सहारा इंडिया रियल एस्टेट कार्पोरेशन लिमिटेड था) और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन (एसएचआइसीएल) से पूरी तरह परिवर्तनीय डिबेंचरों (ओएफसीडी) से हजारों हजार करोड़ रूपया उगाह लिया। सेबी का दावा है कि सहारा ने इसमें कुल 24,029 करोड़ रूपया उगाहा था। ( जारी )

(सौजन्य: मेरीबिटिया.कॉम)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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