अशोक गहलोत की ईमानदारी चढ़ी कसौटी पर…

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खुद को गांधीवादी और घोर ईमानदार बताने वाले राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भले ही खान आवंटन के मामले में रिश्तेदारों को ऑब्लाइज करने के मामले में सीना ठोक कर जांच की बात कह रहे हों, मगर अपने कार्यकाल के आखिरी चरण में लगे इस दाग के पीछे रही चूक से तो मुक्त नहीं हो पाएंगे।D-563 भले ही ये माना जाता हो कि वे आम तौर पर अपने रिश्तेदारों से दूरी ही रखते हैं, मगर इस प्रकरण से यह साफ हो गया है कि यह धारणा गलत है। भले ही उन्होंने सीधे तौर पर अपने रिश्तेदारों को ऑब्लाइज नहीं किया हो, मगर यह तो पक्का ही है न कि उनके मुख्यमंत्रित्व काल में उनके रिश्तेदारों को फायदा पहुंचा तो उनके प्रभाव की वजह से ही। हालांकि पूरे तथ्य तो जांच के बाद ही सामने आएंगे, मगर इतना तो तय है कि सरकार ने जिस प्रकार खान आबंटन के मामले में लचीला रुख अख्तियार किया, वह सोची-समझी योजना का हिस्सा है।
गहलोत के पास सबसे बड़ा तर्क ये है कि उनके जोधपुर इलाके में उनकी जाति के अधिसंख्य लोग सैकड़ों सालों से खानों का काम करते हैं और सभी से नजदीक या दूर की रिश्तेदारी है ही, मगर यह तर्क इस कारण कमजोर पड़ जाता है क्यों कि यह तथ्य उनकी जानकारी में होने के बाद भी उन्होंने सावधानी क्यों नही बरती? क्या उन्हें इतना भी ख्याल नहीं रहा कि आगे चल कर यह उनके लिए मुसीबत बन जाएगा? उन्होंने इससे बचने का रास्ता क्यों नहीं निकाला? कोई व्यक्ति निजी तौर पर भले ही कितना भी ईमानदार क्यों न हो, मगर उसे इस बात का भी ख्याल रखना ही होगा कि कहीं उसके नाम से उसके रिश्तेदार फायदा तो नहीं उठा रहे हैं। अगर ये मान भी लिया जाए कि उनकी खान आबंटन में कोई भी सीधी भूमिका नहीं है, मगर इस मामले में साफ तौर पर यह बात उभर रही है कि इस मामले में उन्होंने पूरी लारपवाही बरती, जो कि आज उनके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप के रूप में उभर कर सामने आ रही है।
गहलोत के एक हितचिंतक निरंजन परिहार ने आरोप को डाइल्यूट करने के लिए कितने लचर सवाल उठाए हैं, उनकी बानगी देखिए-आपके भांजे के साले का भतीजा कौन है? जरा बताइए तो? आपके भांजे के साले का समधी कौन है? या फिर आपके भांजे के साले के समधी का साला कौन है? या फिर भांजे के साले के समधि का भाई कौन है? आप नहीं बता सकते। क्योंकि दूर के रिश्तेदारों के भी बहुत दूर के रिश्तेदारों को रिश्तेदार तो बेचारे कहने भर के रिश्तेदार होते हैं। परिहार ने बड़ी ही चतुराई दिखाई है, मगर उन्होंने इस तथ्य को नजरअंदाज ही कर दिया कि इस प्रकार के सवाल आम आदमी के लिए तो ठीक हैं, मगर वीआईपी के मामले में इसी प्रकार के दूर के रिश्तेदार ही निकट आ कर फायदे उठाया करते हैं। हम अपना ही उदाहरण लें। हमें नहीं पता होता कि हमारा दूर का रिश्तेदार कौन है, मगर जैसे ही हम किसी बड़े पद पर पहुंचते हैं तो दूर के रिश्तेदार किस प्रकार उस रिश्ते का हवाला दे कर हमारे निकट आने की कोशिश किया करते हैं। रिश्तेदार ही क्यों, जिस समाज से हम होते हैं, उसके हर आदमी को नहीं जानते, मगर समाज का हवाला देकर लोग काम करवाने पहुंचते ही हैं। अगर अंदाजा न तो जोधपुर जा कर देखिए कि गहलोत के रिश्तेदारों व उनकी समाज के लोगों के गहलोत की वजह से कितना दबदबा है। माना कि गहलोत के मुख्यमंत्री बनने के कारण खानों का काम करने वाले उनके रिश्तेदार अपना पुश्तैनी काम छोड़ कर भीख मांगना शुरू नहीं कर देंगे, मगर गहलोत को तो इतना ख्याल रखना ही था कि वे इस मामले में पूरी पारदर्शिता बररते। साफ है कि गहलोत ने सावधानी नहीं बरती, उसी का नतीजा है कि आज विपक्ष को उन पर आरोप लगाने का मौका मिल गया है। रहा सवाल जांच का तो सब जानते हैं कि हमारे यहां जांचों का क्या हश्र होता है। इस मामले में भी पतली गली से बचने के रास्ते निकाल लिए जाएंगे।
-तेजवानी गिरधर

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tejwanig

अजमेर निवासी लेखक तेजवानी गिरधर दैनिक भास्कर में सिटी चीफ सहित अनेक दैनिक समाचार पत्रों में संपादकीय प्रभारी व संपादक रहे हैं। राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रदेश सचिव व जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ राजस्थान के अजमेर जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। अजमेर के इतिहास पर उनका एक ग्रंथ प्रकाशित हो चुका है। वर्तमान में अपना स्थानीय न्यूज वेब पोर्टल संचालित करने के अतिरिक्त नियमित ब्लॉग लेखन भी कर रहे हैं।
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