बिल की सार्थकता संदिग्ध दिखती है….

-डॉ. कुमारेन्द्र सेंगर||

दिल्ली के गैंग रेप केस के बाद पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कड़े से कड़ा कानून बनाये जाने के स्वर मुखरता से उठे. सभी ने एकमत से सरकार से सकारात्मक कानून बनाने की मांग की. इधर सरकार इस केस में बुरी तरह से फंसती दिख रही थी क्योंकि केस दिल्ली का था और ऊपर से समस्या यह थी कि इस घटना के बाद से दिल्ली में कई और घटनाएँ गैंग रेप की हुईं.Rape+victims इसी के साथ पूरे देश में जैसे बलात्कार सम्बन्धी घटनाओं की बाढ़ सी आ गई थी (अभी भी आई हुई है) दिल्ली केस के आरोपियों को फांसी देने की मांग के साथ बलात्कारियों को फांसी अथवा अंग-भंग जैसी कठोर, अमानवीय सजा की मांग भी पुरजोर ढंग से उठाई गई. महिला-छेड़छाड़ की, महिला-हिंसा की घटनाएँ सरकार के गले की हड्डी बन चुकी हैं और सरकार अपनी तमाम फजीहतों के बीच कोई कड़ा कदम उठाकर देश को दिखाना चाहती थी कि वो महिलाओं की सुरक्षा के लिए दत्तचित्त है.

सरकार ने अपने दायित्वबोध को दर्शाते हुए (मंशा इसके पीछे क्या हो, ये बाद की बात है) एक बिल सदन में प्रस्तुत किया. इस बिल में तमाम सारे प्रावधानों पर सांसदों में मतभेद भी दिखे किन्तु फिर जैसा कि खबरों के माध्यम से सामने आया, उससे पता चला कि लड़कियों को देखने, छूने, छिपकर देखने, पीछा करने को भी गैर जमानती धाराओं के अंतर्गत अपराध माना है. महिलाओं के साथ इस तरह की हरकतों को बलात्कार की श्रेणी में शामिल माना गया है. संभव है कि सरकार की मंशा वाकई कुछ सकारात्मक करने की हो और वो वाकई इस बिल के माध्यम से महिलाओं की सुरक्षा करना चाहती हो, अपराधियों में, दुराचारियों में डर पैदा करना चाह रही हो किन्तु जिस तरह से हालातों को बिल के प्रावधानों द्वारा गैर जमानती अपराध बनाया जा रहा है वो चिंतित करता है, डराता भी है.

अब जिस बिल को, जिन-जिन कानूनी प्रावधानों के साथ सरकार लागू करने का विचार बना रही है वो एकबारगी भले ही दुराचारियों में, अपराधियों में डर का भाव पैदा कर दे किन्तु उससे ज्यादा खाकी वर्दी को निरंकुश बना रही है. इस कानून का लाभ उस स्थिति में मिलना तय है जबकि हमारा समाज, हमारे परिवार लड़कियों की शिकायतों पर गंभीरता से ध्यान देना शुरू करें. अभी भी लड़कियों को संयम से, शांति से रहने की सलाह दी जाती है, कॉलेज, बाजार, ऑफिस आदि आने-जाने में उनको ही नियंत्रण में रहने का मशविरा दिया जाता है. ऐसे में कैसे कोई लड़की या उसका परिवार किसी अपराधी के खिलाफ, दुराचारी के विरुद्ध शिकायत करने का साहस जुटा सकेगा?

परिवार के, समाज के इस विभेदपूर्ण व्यवहार, इस विभेदपूर्ण सोच से तो एकबारगी कोई निपट भी ले किन्तु शिकायत दर्ज करने को बैठे खाकी वर्दी वाले महानुभावों से कोई कैसे निपटेगा? खाकी वर्दी का हाल क्या है ये किसी से छिपा नहीं है. इन लोगों को कोई न कोई बहाना चाहिए अपनी जेब गरम करने का, इसके लिए किसी निर्दोष को, किसी मासूम तक को पकड़ के अन्दर करना पड़े तो भी कोई समस्या नहीं. ऐसे विषम हालातों में सरकार को समझना चाहिए कि कहीं वो इस बिल के रूप में खाकी वर्दी के नख-दन्त को और नुकीला-विषैला तो नहीं कर रही? कहीं ऐसा न हो कि आने वाले दिनों में महिलाओं की असुरक्षा ज्यों की त्यों बनी रहे, एक असुरक्षा का मुद्दा और खड़ा हो जाये? इस बिल को और बेहतर बनाकर महिलाओं के पक्ष में लाये जाने की आवश्यकता है न कि ज़ज्बात में आकर सिर्फ नाखून, दांत दिखाने.

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4 thoughts on “बिल की सार्थकता संदिग्ध दिखती है….

  1. भाई आपको सभी पर शक हो रहा है ऐशा न हो की लोग आप पर शक करने लंगे

  2. ye congres party ka gorkhdhandha hai kewal yuvayo ko be bakuf banane kinotannki hai kirpiya aap vichar kare [1] tada,, n s a ,, makoka,, jaise kanoon kab kaiyo kis uddesh ke liye bane ye kewal samay ki maang thi desh ki parasthiti ke anusar ye kanoon aaye ye vivatha se sammbanndh rakhte hai [2] aayu kam karne yaa badane se samaj mai aayi virrikti kaiy kanoon se thik ki jaa sakti hai to jabba yahi hoga kabhi nahi ye to samaj ke naitik patan ke karna ho raha hai jo kayee varshi ka dasako na natija hai ies ko thik karana hai to kewal samaj ke log samaj ko uthane ka kaam shikchha se hi sammbhav haii istrument se sadhan se samaj nahi sudhare jaa sakte yah baat ye sab log jante hai magar yuvayo orr naiyee pidi ko jhoote bahakabe mai dal kar vote thagne ki ye naakam koshisha hai

  3. पाकिस्तान को भारत के अंदरूनी मामले में दखल अंदाजी नहीं करना चाहिए / भारत पाक से अमन की आषा ना रखे और पाक को मुह तोड़ जवाब दे/.
    mahilaao ko surksha do.

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