पति की शहादत की सौदागरनी को आखिरकार लालची बनाया किसने?

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-आशीष वशिष्ठ||

उत्तर प्रदेश में युवा पुलिस अधिकारी जियाउल हक हत्या के बाद पीड़ित परिवार द्वारा प्रदेश सरकार से मुआवजे और अधिक से अधिक सुविधाएं पाने के लिए की जा रही पैंतरेबाजी और अड़ियल रवैये ने ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी की शहादत का मजाक बना डाला है. शहीद की पत्नी परवीन आजाद का जो लालची चेहरा सामने आया है उसने संवेदना के स्थान पर वितृष्णा के भाव पैदा कर दिये हैं और प्रथम दृष्टया यह आभास हो रहा है कि शहीद का परिवार मौत की कीमत वसूलने पर उतारू है. 10-co-kundaशहीद की पत्नी के इस व्यवहार के चलते मीडिया ने उन्हें लालची और ब्लैकमेलर तक का तगमा दे डाला. डीएसपी की मौत एक हफ्ते के अंदर ही परिवार ने प्रदेश सरकार के सामने सवालों और मांगों की झड़ी लगा दी. सरकार ने पीड़ित परिवार को मरहम लगाने और मौके की नजाकत समझते हुए मांगे मानने में देरी नहीं की लेकिन जिस तरह डीएसपी की विधवा हठी चरित्र का प्रदर्शन कर रही है वो कई सवाल खड़े करता है. डीएसपी जियाउल हक की शहादत से पहले भी कई मामलों में शहीदों के परिजनों द्वारा मुआवजे और सुविधाएं के लिए हठ और प्रदर्शन सामने आया है. इस परंपरा की शुरूआत केन्द्र और राज्य सरकारों ने ही की है जिसकी आग पूरे देश में फैल चुकी है और अब अधिकतर मामलों में शहीदों के परिजनों का हठी और लालची व्यवहार देखने को मिलने लगा है. यह व्यवहार शहादत के अनमोल और सर्वोत्तम जज्बे को गौण तो बनाता ही है वहीं पीड़ित परिवार के प्रति संवेदना, सहानुभूति और सम्मान को भी घटाता है.

जियाउल हक की पत्नी और परिजनों के प्रति मेरी और देशभर की सहानुभूति है लेकिन मनमानी नौकरी पाने और अपनी बातें मनवाने के जो व्यवहार डीएसपी की पत्नी कर रही है उससे परिवार की छवि तो धूमिल हो ही रही है वहीं उसने कई सवालों को भी जन्म दिया है. क्या शहादत बिकाऊ है? क्या शहादत की कोई कीमत लगायी जा सकती है? क्या शहादत को खरीदा बेचा जा सकता है? क्या शहादत को जात-पात और धर्म के चश्मे से देखा जाना चाहिए? क्या मुआवजे की राजनीति से शहादत का गुणगान होता है या फिर अपमान? शहादत के बाद परिवार का लालची चरित्र आखिरकर क्या दर्शाता है? सवाल यह भी है कि आखिरकर शहीदों के परिजनों को लालची बनने के लिए किसने प्रेरित किया?

उत्तर प्रदेश के जनपद प्रतापगढ़ की तहसील कुंडा के गांव वलीपुर में 2 मार्च को जो कुछ भी हुआ उसने एक जाबांज और ईमानदार पुलिस अधिकारी को हमसे छीन लिया. मामले की सच्चाई जानने के लिए प्रदेश सरकार ने केस देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई को सौंप दी है. पुलिस अधिकारी की हत्या मामले में प्रदेश सरकार के एक कद्दावर मंत्री और कुंडा के निर्दलिय विधायक रघुराज प्रताप उर्फ राजा भैया का नाम सामने आया है. प्रदेश पुलिस और सीबीआई ने मामले में दर्ज रिपोर्ट में राजा भैया का नाम शामिल किया है. लेकिन इस पूरे मामले में प्रदेश सरकार की अति सर्तकता, संवेदनशीलता और भारी भरकम मुआवजे की धनराशी और परिजनों को नौकरी देने की नीति ने एक नयी बहस हिन्दू राजा और मुस्लिम अफसर के साथ शहादत का जातिकरण और मुस्लिमकरण करना शहादत को कमतर कर आंकने के सिवाय कुछ और नहीं कहा जा सकता. एक जाबांज अधिकारी की कर्तव्यनिष्ठा की बजाय मीडिया और आम लोगों के बीच इसी बात की चर्चा होने लगी कि डीएसपी की बेवा और परिजन मौत को कैश कराने में जुटे हैं और सरकार मुस्लिम संप्रदाय को खुश करने की नीयत से खजाना लुटा रही है. इस सारे घटनाक्रम ने उस बहादुर अधिकारी के प्रति मन में श्रद्धा और संवेदना के स्थान पर ऐसे भाव आने लगे मानो उसकी शहादत की कीमत पचास लाख और पत्नी, भाई या किसी और रिशतेदार को नौकरी ही तो है. मुआवजे की राजनीति वोट बैंक का संतुलन साधने के साथ पीड़ित परिवार का मुंह बंद करने का वो कारागर हथियार बन चुकी है जिसके प्रयोग का चलन धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है. वोट बैंक की राजनीति के तहत ही प्रदेश के मुख्यमंत्री एक दिन शहीद डीएसपी और अगले दिन वलीपुर गांव के दिवंगत ग्राम प्रधान नन्हे यादव और उनके भाई सुरेश यादव के परिजनों सांत्वना और मुआवजा देने पहुंचते हैं. ऐसे मामलों में सरकार के साथ राजनीतिक दलों का चरित्र भी सामने आता है और वो चिताओं पर राजनीतिक रोटियां सेंकने से बाज नहीं आते हैं.

भारत पाक सीमा पर पाकिस्तान सैनिकों द्वारा दो भारतीय सैनिकों का सिर कलम कर देेने की घटना ने देश को झकझोर दिया था. दोनों शहीदों में से एक लांस नायक हेमराज उत्तर प्रदेश के जनपद मथुरा के ग्राम शेरनगर के निवासी थे. हेमराज की शहादत के बाद राजनीति का जो नजारा देखने को मिला उसने शहादत को मजाक में बदल डाला. मीडिया में जब यह खबर फैली की मध्य प्रदेश के शहीद सुधाकर सिंह को तो प्रदेश सरकार ने भारी भरकम मुआवजा दिया है तो मथुरा में शहीद हेमराज की पत्नी और मां आमरण अनशन पर बैठ गई. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव शहीद के गांव पहुंचे, मां और पत्नी का अनशन तुड़वाया और 25 लाख का चेक भी सौंपा. अखिलेश यादव के बाद लगभग हर राजनीतिक दल का नेता और केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री और आर्मी चीफ तक ने पहुंचकर परिवार को सांत्वना दी. लगभग ऐसी ही स्थिति नक्सलियों के हाथों शहीद हुए इलाहाबाद गांव शिवलाल का पूरा के निवासी बाबूलाल पटेल की शहादत पर हुई. एक राजनीतिक दल द्वारा शहादत पर सियासत करने पर शहीद का परिवार अनशन पर बैठ गया. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने शहीद के घर पहुंचकर 20 लाख मुआवजा और एक एकड़ जमीन का पट्टा पीड़ित परिवार को सौंपकर उन्हें सांत्वना दी. प्रतापगढ़ के गांव वडू पुर मजरे वजीरपुर के शहीद सुभाष कुमार यादव, जनपद मैनपुरी के विकास खण्ड जागीर के ग्राम नखतपुर के शहीद सुभाष चन्द्र यादव के गांव पहुंचकर परिजनों को मुआवजे का चेक सौंपा तब कहीं जाकर पीडित परिवार के जख्मों पर मरहम लग पायी. मुआवजे की राशि को लेकर परिजनों में आपसी लड़ाई का नजारा इलाहाबाद के शहीद बाबूलाल पटेल के मामले में सब देख ही चुके हैं. सहायता राशि के बंटवारे को लेकर शहीद की पत्नी और पिता में झगड़ा हो गया और नौबत हाथापाई तक पहुंच गई.

मुआवजे से किसी की शहादत को न तो तोला जा सकता है और न ही शहीद की कमी को पूरा किया जा सकता है. बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और परिवार के सम्मानजनक जीवन बसर करने में यह धनराशी मामूली तौर पर मददगार साबित हो सकती है. सवाल यह भी है कि आखिरकर ये माहौल बना कैसे और इसके लिए कौन जिम्मेदार है. सरकार, व्यवस्था, मीडिया या राजनीतिक दल? शहादत की कोई कीमत नहीं लगायी जा सकती लेकिन शहीद सरकारी बेरूखी का शिकार हैं ये भी कड़वी सच्चाई है. सरकार की बेरूखी और वादाखिलाफी भी कई मामलों में सामने आ चुकी है. अब मीडिया ऐसे मामलों को हाईलाइट करता है और पीड़ित परिवार भी अधिक से अधिक मदद बटोरने की हसरत में धरना, प्रदर्शन और आमरण अनशन का सहारा लेने लगे हैं. वहीं वोट बैंक की राजनीति ने भी इस प्रवृति को बढ़ाया है. कारगिल युद्ध के दौरान सेना के अलावा प्रदेश सरकारों ने जिस तरह मुआवजे और संात्वना को जात-पात की गंदी राजनीति से जोड़ा था उसके दुष्परिणाम अब दिखने लगे हैं. राज्य सरकारें वोट बैंक के हिसाब से मुआवजे की कीमत तय करती हैं. कुंडा में डीएसपी के परिजनों को पचास लाख का मुआवजा और पांच लोगों को नौकरी का वायदा वोट बैंक की राजनीति का जीता जागता उदाहरण है.

असल में पिछले दो दशकों में मुआवजा जनप्रतिरोध और पीड़ितों के मुंह बंद कराने के सबसे कारगर सरकारी हथियार के तौर पर प्रयोग किया जाने वाला औजार बनकर उभरा है. किसानों की जमीनें छीनने से बलात्कार पीड़िता तक हर घटना और दुर्घटना का मुआवजा तय है. दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की शिकार युवती की मौत के बाद केन्द्र सरकार, दिल्ली सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार ने मुआवजा देकर ही पीड़िता के परिवार के जख्मों पर मरहम लगाने का काम किया. नकारा व्यवस्था, भ्रष्ट पुलिस और अंधे कानून से आजिज आ चुकी जनता भी मौके के अनुसार अधिक से अधिक बटोरने की फितरत अपना चुकी है क्योंकि उसे बखूबी मालूम है कि चंद दिनों के बाद कोई उसके दरवाजे पर दो आंसू बहाने वाला भी कोई नहीं होगा तब पैसा ही काम आएगा. इसको नैतिक आचरण में गिरावट और लालची प्रवृत्ति से जोड़कर देखा जा सकता है लेकिन जब सरकार किसी शहीद सैनिक के गांव का विकास, मुआवजे की राशी जात-पात की राजनीति से जोड़कर देखती हो तो इसे भुनाने में जनता आखिकर क्यों पीछे रहे.

शहीद को राज्य की सीमा में नहीं बांध जा सकता है वो तो पूरे देश के लिए गर्व का विषय होता है. लेकिन सरकार की नजर में शहीदों की इज्जत केवल दस-बीस लाख का चेक, मैडल, गैस एजेंसी, पेट्रौल पंप और जमीन के टुकड़े से खरीदी जाने वाली चीज से बढ़कर कुछ और नहीं है. समाज में सिरचढ़ कर बोल रही भौतिकतावादी और बाजारवादी प्रवृत्ति ने शहादत को फालतू सामान बना दिया है, शहीद, शहादत और उसके परिजनों को उचित मान-सम्मान मिलना लगभग बंद हो चुका है. वहीं सरकार भी सम्मान देने के बाद भूल जाती है कि उसे पाने वाला जिंदा है या मर गया. सरकार की बेरूखी और संवेदनाहीनता के कारण कई मौकों पर शहीदों के परिजन और सैनिक अपने मैडल वापस लौटाने की धमकी दे चुके हैं. सरकार, समाज और मीडिया इस मामले में बराबर के दोषी हैं. लेकिन सरकार सबसे बड़ी कसूरवार है जो शहीदों को उचित मान सम्मान तब तक नहीं देती जब तक मीडिया का दबाव न हो और परिवार भूख हड़ताल पर न बैठ जाए. अगर शहीद डीएसपी की पत्नी हठधर्मी पर उतरी है और वो अपने पति की शहादत को कैश करवा रही है तो उसके पर्दे के पीछे भी वो तमाम कारण और परिस्थितियां जिम्मेदार हैं जिन्होंने पीड़ितों को लालची और हठी बनाया है. ऐसी स्थितियां भविष्य में उत्पन्न न हो इसके लिए सरकार को शहीदों के परिजनों की मदद के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नीति बनानी चाहिए और पूरी ईमानदारी और बिना किसी भेदभाव के उसे लागू भी करना चाहिए क्योंकि अगर शहादत पर सियासत बुरी बात है तो शहीदों का अपमान भी किसी गुनाह से कम नहीं है.

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16 thoughts on “पति की शहादत की सौदागरनी को आखिरकार लालची बनाया किसने?

  1. ये पत्रकारों की घाटियाँ सोच हैं किसी के जिंदगी की कीमत एक पोस्ट नहीं हो सकती ये तो और शर्म की बात है की ये उसे मगन पड़ा ये सब कम से कम उसको मिलाना हे chahiye

  2. मुल्ला को दामाद ओर बुख्लेश को जीजा घर बेठे मिल जाएगा !!!!!!

  3. लेकिन होना जाना कुछ नहीं है,कोई भी दल की सरकार हो आज उनका सोच यहीं तक सीमित रह गया है.सरकार घटना घटित होते ही सब से पहले मुवावजे की घोषणा करती है,गोया कि वह इसका इंतजार ही कर रही थी.न मौके पर जाने की न कारण अथवा किसी संवेदना की जरूरत है.हर बात को मुवावजे से ही टोला जाता है.परिजन भी शायद इतने संवेदनहीन होने लगे है कि,वे भी इसे आखिरी मौका समझ कर,अच्छी से अच्छी सौदेबाजी कर लेना चाहते हैं.आप द्वारा उठाये गए मुद्दों से दीगर यह बात भी विचारनीय है कि क्या समाज की संरचना अब इतनी मूल्यहीन हो जाएगी जहाँ भावनाएं रिश्ते सब छिछले हो जायेंगे.यह भी एक चिंता का विषय है.

  4. लेकिन होना जाना कुछ नहीं है,कोई भी दल की सरकार हो आज उनका सोच यहीं तक सीमित रह गया है.सरकार घटना घटित होते ही सब से पहले मुवावजे की घोषणा करती है,गोया कि वह इसका इंतजार ही कर रही थी.न मौके पर जाने की न कारण अथवा किसी संवेदना की जरूरत है.हर बात को मुवावजे से ही टोला जाता है.परिजन भी शायद इतने संवेदनहीन होने लगे है कि,वे भी इसे आखिरी मौका समझ कर,अच्छी से अच्छी सौदेबाजी कर लेना चाहते हैं .आप द्वारा उठाये गए मुद्दों से दीगर यह बात भी विचारनीय है कि क्या समाज की संरचना अब इतनी मूल्यहीन हो जाएगी जहाँ भावनाएं रिश्ते सब छिछले हो जायेंगे.यह भी एक चिंता का विषय है.

  5. mujhe lagta hai ki jiyaa ulhak ki mot ke pichhe dcp ke patni ke hi kahi haath na ho. kyoki jis trh se lalach prveen begam dikha rahi hai us se saaf jaahir ho raha hai ki kuch to daal me kaalaa hai. akhlesh sarkaar ko blaikmale karna galt hai.

  6. ek imandar byakti ki shahadat par uske ghar walon ko is tarah se notanki nahi karni chahea….. wo log us achche byakti ki shahadat ka makhool bana kar rakh deye hain….

  7. यदि अमूल बेबी उ प जा कर इएस महिला से निकाह करले तो ४ फायदे होंगे उ प के दामाद बन जायंगे वोटो की गारंटी होगी ८ नोकरिया मिल जाएँगी ५० लाख रुपया मिल जायेगा ओर्र साडी भी होजाएगी लोग बाहर का नहीं कह पायेंगे उ प को भी दो दामाद मिल जायेंगे बादरा अब पुअन हो चला है आप सब हमारी मदद कीजिये ये सलाह वंहा तक पंहुचा दीजिये बड़ी मेहरबानी होगी

  8. एक पत्रकार इस तरह भी सोच सकता है – आने वाले समय के लिए एक चेतावनी है। ऐसा लग रहा है जैसे लेखक पत्रकार कम, मुलायम सिंह यादव या अखिलेश यादव साहेब की तरह बोल रहे है। आने वाले समय में हरेक शहीदों के घरों से ऐसी ही आवाज आने वाली है मालिक।.

  9. yeh galat hai bhai daya dukh ka karad hoti nazar aa rahi hai bade shrm ki baat hai tumhari is harkat se samaj ko shrmindagi ka saamna karna pad sakta hai.

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