“नीतीश जी अपनी पीठ थपथपा रहे हैं और मैं सदमे में हूँ”

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 -अभिरंजन कुमार||

नीतीश जी और सुशील मोदी जी अपनी पीठ थपथपा रहे हैं और मैं सदमे में हूँ। क्या मैं एक ईर्ष्यालु व्यक्ति हूँ?

मेरे राज्य बिहार में एक ज़िला है शिवहर, जहां की प्रति व्यक्ति प्रति दिन आय है- मात्र 15 रुपये 12 पैसे। साल 2008-09 में यहां के लोग प्रति दिन 16 रुपये 61 पैसे कमाते थे। महंगाई बढ़ रही है, चोरी-बेईमानी और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, लेकिन शिवहर के हमारे भाइयों-बहनों की आमदनी घट रही है। 15 रुपये 12 पैसे में एक दुधमुंहे बच्चे का आधा लिटर दूध नहीं आ सकता। मैं तो यह सोचकर ही सिहर उठा हूँ कि हमारे शिवहर का एक औसत आदमी क्या खाता-पीता होगा, क्या पहनता-ओढ़ता-बिछाता होगा, किन घरों में रहता होगा, बीमार पड़ता होगा तो जीता होगा या मरता होगा?NITISH_MODI_145425f

शिवहर अकेला ज़िला नहीं है, जहां के लोगों की आमदनी देश में सबसे तेज़ी से बढ़ने का दावा कर रहे बिहार में कम हो गई है। 38 में से 7 ज़िलों के लोगों की आमदनी कम हो गई है। शिवहर के अलावा वो अभागे ज़िले हैं- कैमूर, सिवान, पूर्वी चम्पारण, मधुबनी, बेगूसराय और शेखपुरा। मधुबनी के लोग प्रतिदिन 20 रुपये 77 पैसे, पूर्वी चंपारण के लोग 20 रुपये 93 पैसे, शेखपुरा के लोग 21 रुपये 61 पैसे, कैमूर के लोग 21 रुपये 80 पैसे, सिवान के लोग 22 रुपये 22 पैसे और बेगूसराय के लोग 39 रुपये 23 पैसे कमाते हैं। जश्न मनाइए कि यह बिहार भारत में सबसे ज़्यादा तेज़ी से तरक्की कर रहा है।

 

 बिहार के

–38 में से 3 ज़िलों शिवहर, सुपौल और मधेपुरा के लोग प्रतिदिन 20 रुपये से भी कम कमाते हैं।

–38 में से 22 ज़िलों के लोग प्रतिदिन 25 रुपये से भी कम कमाते हैं। यानी 38 में से 19 ज़िले ऐसे हुए, जहां लोग हर रोज़ 20 रुपये से 25 रुपये के बीच कमाते हैं। यानी आधा बिहार प्रतिदिन 20 से 25 रुपये पर जी रहा है।

–38 में से 31 ज़िलों के लोग प्रतिदिन 30 रुपये से कम कमाते हैं। यानी 9 ज़िले ऐसे हुए, जहां लोग प्रतिदिन 25 से 30 रुपये के बीच कमाते हैं।

अब बिहार के 7 सबसे समृद्ध ज़िलों की बात भी कर लें, जिनसे बाकी 31 ज़िलों के लोग ईर्ष्या करेंगे कि वे बहुत पैसे वाले हैं। इन तथाकथित समृद्ध और ईर्ष्या के पात्र 7 ज़िलों में से 5 ज़िलों के लोग प्रतिदिन मात्र 30 रुपये से 40 रुपये कमाते हैं। ये पांच ज़िले हैं- लखीसराय (30 रुपये 36 पैसे), रोहतास (30 रुपये 59 पैसे), मुज़फ्फरपुर (33 रुपये 55 पैसे), बेगूसराय (39 रुपये 23 पैसे) और भागलपुर (39 रुपये 44 पैसे)।

 –गौर किया आपने? 38 में से 36 ज़िलों के लोग प्रतिदिन 40 रुपये से कम कमाते हैं।

बच गए दो। यानी क्लास में फर्स्ट और सेकेंड विद्यार्थी। सारे मास्टर साहबों और हेडमास्टर साहब के दुलारे। इनकी वजह से पूरे स्कूल का सीना गर्व के मारे हद से ज़्यादा फूल चुका है। प्रिंसिपल नीतीश कुमार जी और वाइस प्रिंसिपल मोदी जी ने इन्हीं दो विद्यार्थियों के दम पर एलान कर दिया है कि उनका स्कूल देश में सबसे बढ़िया रिजल्ट देने वाला स्कूल बन गया है।

 तो सुनिए,

–नंबर दो है मुंगेर, जहां के लोग प्रतिदिन 51 रुपये 14 पैसे कमाते हैं। उनकी मासिक आमदनी बनती है- 1555 रुपये 75 पैसे। सालाना आमदनी है- 18669 रुपये।

–नंबर वन है राजधानी पटना, जहां के लोगों की प्रतिदन की कमाई है- 146 रुपये 68 पैसे। मासिक कमाई हुई 4461 रुपये 58 पैसे। सालाना कमाई 53539 रुपये।

 

विकासोन्मुख बिहार की इस गौरव-गाथा को और तफ़सील से समझिए।

–बिहार में न्यूनतम मज़दूरी है- 156 रुपये। और बिहार की राजधानी पटना समेत सभी 38 ज़िलों के लोगों की प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन की कमाई न्यनतम मज़दूरी से भी कम है।

–भारत की प्रतिव्यक्ति सालाना आय है- 60,972 रुपये। यानी प्रतिदिन की आय हुई- 167 रुपये 04 पैसे। यानी बिहार के पटना समेत सभी 38 ज़िलों के लोगों की प्रति व्यक्ति प्रतिदिन की आय देश के औसत से कम है।

–बिहार के सभी 38 ज़िलों की प्रतिव्यक्ति आय का सालाना औसत है- 25,653 रुपये। यानी प्रतिदिन की आय हुई- 70 रुपये 28 पैसे। यानी बिहार के 38 में से पटना को छोड़कर बाकी सभी 37 ज़िलों की प्रति व्यक्ति आय राज्य के औसत से कम है।

और मित्रो, ये सारे आंकड़े मेरे नहीं हैं। बिहार सरकार के हैं। विकास-पुरुष सुशासन बाबू नीतीश कुमार जी और सुशील मोदी जी के हैं। साल 2012-13 के आर्थिक सर्वेक्षण के हैं। सिर्फ़ विश्लेषण मेरा है और यह विश्लेषण करने के लिए कोई महान अर्थशास्त्री होने की ज़रूरत नहीं है। यह कोई साधारण पत्रकार भी कर सकता है, लेकिन बिहार के सारे अखबारों ने कुछ इस तरह की हेडलाइन बनाई थी- “विकास के पथ पर बढ़ता बिहार।” शिवहर के मात्र 15 रुपये कमाने वाले आदमी के लिए कोई नहीं रोया। जिन सात ज़िलों की आमदनी कम हो गई, उनके लिए कोई नहीं सिहरा। 38 में से 36 ज़िलों के लोग प्रतिदिन 40 रुपये से कम पर जी रहे हैं, उनके लिए किसी ने हाहाकार नहीं किया।

उस औसत पर किसी ने सवाल नहीं किया, जिसमें 38 में से 37 जिलों के लोगों की औसत आमदनी राज्य की औसत आमदनी से कम पाई जाती है। सही औसत तो तब मानते, जब 38 में से 18-20 ज़िलों के लोग औसत से ऊपर होते और 18-20 ज़िलों के लोग औसत से नीचे होते। लेकिन यहां तो सिर्फ़ 1 ज़िला औसत से ऊपर है और बाकी सभी 37 ज़िले औसत से नीचे हैं।

अब एक और बात बताता हूँ। जैसे 37 ज़िले नीचे और 1 ज़िला ऊपर, फिर भी राज्य का औसत बन गया 70 रुपये 28 पैसे। वैसे ही अगर एक आदमी (नेता, माफिया, ठेकेदार, भ्रष्ट-घूसखोर, अपराधी, ज़मीदार टाइप) प्रतिदिन कमाए 15 हज़ार रुपये और 999 लोग रह जाएं ठन-ठन गोपाल, फिर भी एक हज़ार लोगों का औसत बन जाएगा- प्रतिदिन 15 रुपये। यही शिवहर में हो रहा है और यही समूचे बिहार में हो रहा है। 10 करोड़ 38 लाख की आबादी में 10 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। उनकी प्रतिदिन की आय 25 रुपये से भी कम है। आज के बिहार का सच यही है।

मेरा बयान ख़त्म हुआ। अब सभी एक सुर में गाना शुरू कर दीजिए- मेरे भारत के कंठहार, तुझको शत-शत वंदन बिहार! इससे नीतीश जी और मोदी जी खुश होंगे, उनकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी। अपने मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की ख़ुशी और प्रतिष्ठा के लिए क्या कुछ देर के लिए भी अपना दर्द आप नहीं भूल सकते?

(लेखक आर्यन टीवी के कार्यकारी संपादक हैं तथा यह लेख उनकी फेसबुक वाल के सौजन्य से प्रकाशित किया गया है)

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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