क्या मेरे साथ आप भी ‘हड़ताल-हड़ताल’ खेल खेलेंगे?

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-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी||
अब तो मेरा भी मन करता है कि हड़ताल-हड़ताल खेलें। गाँधी बाबा का जमाना नहीं है कि सत्याग्रह से फिरंगी भगाए जाएँ। विशुद्ध लोकतंत्रीय देश में हड़ताल एक मात्र अमोघ अस्त्र है जिसके जरिए अपनी बातें/माँगे आसानी से मनवाई जा सकती हैं। मेरा मूड हड़ताल-हड़ताल खेलने का क्यों हो रहा है इसका कारण जान लीजिए। बात यह है कि इस खेल में तोड़-फोड़, हिंसा, आगजनी की राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिता होती है, जिसके लिए किसी भी प्रकार की योग्यता एवं पात्रता की आवश्यकता नहीं। जो भी चाहे इस प्रतियोगिता के महाकुम्भ में सदल-बल शिरकत करके देश की सम्पत्ति को मटियामेट करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। INDIA-STRIKE-630-1-jpg_031542
कलम घिसते-घिसते लम्बा अरसा गुजारने के बाद अब पता चला कि हड़ताल-हड़ताल खेल काफी महत्वपूर्ण है और इसका हिंसात्मक, तोड़फोड़, आगजनी का पक्ष इतना प्रबल है जिसका सानी विश्व के किसी भी देश में कोई अन्य विकल्प नहीं है। गाँधी बाबा वहीं बापू जी यानि महात्मा गाँधी जिन्हें राष्ट्रपिता भी कहा जाता है के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अहिंसात्मक ढंग से सत्याग्रह के बलबूते पर सैकड़ो सालों तक देश को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। हालाँकि तत्समय देश को आजाद कराने में नरम एवं गरम दल दोनों का हाथ था। रहा होगा हमने तो पढ़ा ही है, देखा नहीं था।
हड़ताल-हड़ताल के इस महा खेल में दो दिन तक पूरे देश में हिंसा का ताण्डव देखने-सुनने में आया। कारखाने व वाहन तोड़े गए, अनेकों स्थानों पर आगजनी हुई, अरबों का नुकसान हुआ। बैंकों में कामकाज न होने से अरबों का बैंकिंग व्यवसाय प्रभावित हुआ। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि 11 श्रमिक संगठनों के आह्वान पर देश में बुद्धवार एवं गुरूवार (20-21 फरवरी 2013) को दो दिवसीय हड़ताल हुई। इस हड़ताल में आन्दोलनकारियों ने वाहनों को आग के हवाले किया साथ ही कई उद्योगों में तोड़-फोड़ एवं आगजनी की। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की शाखाएँ और जीवन बीमा निगम के कार्यालयों में ताले लटके रहे और बाहर आन्दोलनकारी नारेबाजी करते दिखे। हजारों छोटे-बड़े कल कारखानों में उत्पादन ठप रहा।
हड़ताल-हड़ताल के इस महा खेल ने देश की आर्थिक गतिविधियों की कमर तोड़ कर रख दिया। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, पंजाब हरियाणा सहित देश के अन्य प्रान्तों में हड़ताल-हड़ताल का दो दिवसीय खेल अपने चरम पर रहा। इस पावन अवसर पर हड़ताल यानि बन्द समर्थकों ने जबरदस्त उपद्रव किया। शहरों में सिटी बसों और रोडवेज का चक्का जाम होने से आम आदमी को कितनी दिक्कतें पेश आई यह तो वे ही बात सकते हैं। डग्गामार वाहनों, आटो, टैम्पो, टैक्सी वालों ने इस अवधि में (हड़ताल के दो दिवसीय महाकुम्भ के दौरान) मनमाना किराया वसूल कर यात्रियों को गंतव्य तक पहुँचाया। हड़ताल के इस खेल के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक पूरी तरह बन्द रहे। बीमा व डाक विभाग में काम नहीं हुआ। उपद्रवियों की पौ बारह रही। फैक्ट्रियों पर पथराव और आगजनी करके नुकसान पहुँचाने वाले हड़ताल प्रतिभागियों ने ऐसा काम किया है कि वह लोग राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत किए जाने की फेहरिश्त में शामिल कर लिए जाएँगे।
इस महाखेल हड़ताल-हड़ताल के दौरान नगर निगम, परिवहन निगम के अलावा डाक विभाग, सिंचाई विभाग, लोकनिर्माण विभाग, वाणिज्यकर विभाग में काम पूरी तरह से प्रभावित रहा। कर्मचारी गण कार्यालय परिसरों में जमे रहे लेकिन काम एक पैसा का नहीं हुआ क्योंकि दफ्तर ही नहीं खुले। महानगरों और अन्य जिलों में हड़ताल-हड़ताल के इस खेल में अपना भरपूर असर दिखाया। कार्यालयों में कामकाज हुआ ही नहीं। अनेकों स्थानों पर प्रवेश परीक्षा फार्म भरने वाले आवेदकों समेत अन्य ग्राहकों को निराश होना पड़ा। हड़ताल-हड़ताल के इस महाखेल से जीवन अस्त-व्यस्त और व्यवस्था भले ही चरमरा जाए, लेकिन इस खेल के आयोजक कर्मचारीगण महासंघ व ट्रेड यूनियन का सीना चौड़ा हुआ है।
राज्य सरकारें व केन्द्र सरकार इनकी मांगों पर कितना ध्यान देगी यह तो नहीं बता सकते लेकिन हड़ताल-हड़ताल जैसे महाखेल की दो दिवसीय अवधि में जो कुछ हुआ उसकी भरपाई कौन करेगा? क्या देश का आम आदमी या फिर हड़ताल आयोजक संगठन। कुल मिलाकर यदि यह कहा जाए कि इस देश का अल्लाह ही मालिक है तो कुछ भी गलत नहीं होगा। मैं भी बैठा था काम-काज कुछ भी नहीं था सोचा क्यों न अब हड़ताल-हड़ताल के इस महाखेल में एक प्रतिभागी मैं भी बन जाऊँ। यह दो दिवसीय सुअवसर तो बीत गया अब यदि आइन्दा इस तरह का आयोजन होगा तब मैं पहला व्यक्ति होऊँगा, जो हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़ जैसे अमोघ अस्त्र का प्रयोग कर अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मारूँगा। जी हाँ देश की सम्पत्ति के नुकसान की भरपाई तो परोक्ष रूप से मुझ जैसे आदमी को ही करनी पड़ती है और लोग महँगाई का रोना रोकर शान्त हो जाते हैं। तो क्या आप भी ‘हड़ताल-हड़ताल’ खेल खेलेंगे।
(डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी वरिष्ठ पत्रकार व टिप्पणीकार हैं.)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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