स्वाइन फ्लू का कहर

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आशीष वशिष्ठ||

 

देश के कई राज्यों में स्वाइन फ्लू एचएन1 कहर बरपा रहा है. राजधानी दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, चण्डीगढ, हिमाचल, जम्मू कश्मीर, मध्य प्रदेश, झारखण्ड, गुजरात  और महाराष्ट्र इसकी जद में आ चुके हैं. तेजी से नये मामले प्रकाश में आ रहे हैं और हर बार की भांति सरकार दावे और वादे करने में जुटी है. सरकारी अस्पताल ईलाज करने से पहले ही हाथ खड़े किये दिख रहे हैं तो वहीं प्राईवेट अस्पताल मरीजों को खून चूसने पर उतारू हैं. swine-fluचारों और भय और दहशत का माहौल बना हुआ है और देश की स्वास्थ्य सेवाएं आईसीयू में लेटी दिख रही हैं. सरकार के पास न तो पर्याप्त मात्रा में दवाएं और मास्क उपलब्ध हैं और न ही इस भयानक बीमारी से बचने का कोई विशेष इंतजाम. डाक्टरों और पैरामैडिकल स्टाफ की कमी का रोना अपनी जगह पर कायम है. सरकार ने हाई एलर्ट जारी कर अपने कर्तव्य से मुक्ति पा ली है और आम आदमी बीमारी के डर से सहमा हुआ है.  हर वर्ष फैलने वाली इस बीमारी पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी इस रोग पर प्रभावी और स्थायी रोक नहीं लग पा रही है, जो स्वास्थ्य विभाग और सरकार के रोग मुक्त देश के नारों को खोखलापन साबित करता है.

वर्ष 2009 में जानवरों के सम्पर्क में आने से होने वाले रोग एच-1 एन-1 इनफ्लूएंजा अर्थात स्वाइन फ्लू ने भारत सहित विश्व के अनेक देशों को अपनी चपेट में ले लिया था जिससे हजारों लोगों की मौत हुई. तब भारत में इसने 981 लोगों की जान ली जबकि 2010 में इससे 1763 लोगों की मौत हुई. वर्ष 2011 में भी इसने 603 लोगों को संक्रमित करके 75 लोगों की जान ली थी. गत वर्ष तो 5 हजार लोग इसकी चपेट में आए जिनमें से 405 की मौत हो गई जबकि इस साल अब तक ही देश भर में इसके 576 मामले सामने आ चुके हैं तथा कम से कम 103 लोगों की मौत हो चुकी है. इसका सबसे अधिक असर उत्तर भारतीय राज्यों में दिख रहा है. राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश व दिल्ली सहित समूचे उत्तर भारत को स्वाइन फ्लू अपनी लपेट में ले चुका है. इस वर्ष अभी तक दक्षिण भारत से स्वाइन फ्लू के कम मामले सामने आए हैं.

swine-flu-460_1391666cअंग्रेजी के स्वाइन शब्द का अर्थ सुअर होता है. शुरुआत में सुअरों में इस वाइरस के पाए जाने के कारण इसे स्वाइन फ्लू कहा जाने लगा. अनेक कारणों से कालांतर में इस रोग का संक्रमण मनुष्यों में हुआ. स्वाइन फ्लू एक संक्रामक सांस संबंधी रोग है. यह रोग एच1एन1 वाइरस से होता है. अब यह रोग स्वाइन फ्लू से ग्रस्त किसी व्यक्ति के संपर्क में आने से दूसरे व्यक्तियों में फैल रहा है. स्वाइन एन्फ्लुएन्जा का इतिहास सन् 1918 की फ्लू महामारी से प्रारंभ होता है. हालांकि इसके वायरस का उद्गम कब, कहां और कैसे हुआ यह आज तक अज्ञात है. यह फ्लू मनुष्यों से सुअरों में फैला या सुअरों से मनुष्यों में; यह भी स्थापित नहीं किया जा सका है. इसका एक कारण यह भी है कि 1918 की फ्लू महामारी का पता पहले मनुष्यों में चला था उसके बाद सुअरों में. अगला मामला हमें 5 मई 1976 के दिन अमेरिका के फोर्ट डिक्स में देखने को मिलता है. एक सैनिक कमजोरी और थकान की शिकायत के बाद अगले ही दिन मर जाता है और उसके 4 साथी सैनिक अस्पताल में भर्ती कराये जाते हैं. दो हफ्तों बाद स्वास्थ्य अधिकारी ऐलान करते हैं कि सैनिक की मौत एच1एन1 वायरस के एक भिन्न रूप के संक्रमण से हुई है. इस भिन्न रूप को ए न्यू जर्सी/1976 (एच1एन1) नाम दिया गया था. आज विश्व में मांसाहार का चलन बढ़ रहा है और इसके परिणामस्वरूप पशु-पक्षियों के मांस के सेवन से होने वाले रोग मैड काऊ, बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू आदि भी फैल रहे हैं. स्वाइन इनफ्लूएंजा भारत समेत विश्व के हर सुअर पालन करने वाले देश में मौजूद है. सुअरों में यह पूरे साल फैलता रहता है. इसकी रोकथाम के लिए कई देश अक्सर सुअरों को टीका लगवाते हैं. भारत में अब तक इस बात के कोई संकेत नहीं मिले हैं कि मानवों में मिले स्वाइन फ्लू का सम्बन्ध सुअरों में मौजूद वायरस से है. यद्यपि इनफ्लूएंजा ए (एच1एन1) वायरस पूरे विश्व में मानव से मानव में फैल रहा है और कई देशों में मौत का तांडव भी खेल रहा है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भारत में वायरल ड्रग्स अंतरराष्ट्रीय सिफारिश के स्तर से नीचे हैं हालांकि अभी विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से इस बारे में कोई पुष्टि नहीं हुई है मगर यह माना जा रहा है कि व्यावहारिक तौर पर भारत एक विशाल देश है और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली किसी से छिपी  नहीं है ऐसे में स्वाइन फ्लू तेजी से फैल सकता है. राज्यों ने स्वाइन फ्लू के बढ़ते केसों के मद्देनजर हाई अलर्ट घोषित कर दिया है लेकिन एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन पर इस संबंध में कोई व्यवस्था नहीं की गई है. एयरपोर्ट में बाहर से आनेवाले लोगों की जांच नहीं की जा रही है. साथ ही आइसोलेशन कक्ष, मॉस्क, टोपी, दस्ताने, चश्मा और दवा भी उपलब्ध नहीं कराई गई है. वहीं रेलवे स्टेशन का भी कुछ ऐसा ही हाल है. यहां भी स्वाइन फ्लू के संदिग्ध मरीजों की जांच की कोई व्यवस्था नहीं है. अगर लोग समझदारी और सहयोग से काम लेंगे तो इसे और कम किया जा सकता है. वही सरकारी अमले द्वारा हाल ही में सक्रिय हुए इस वायरस को हलके में लेना महंगा पड़ सकता है क्योंकि लोगों की जान जाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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