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गणतंत्र की चुनौतियां…

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आशीष वशिष्ठ||

 

विश्व का सबसे बड़ा गणतंत्र राष्ट्र कहलाने वाले हमारे इस देश की स्वतंत्रता व गणतंत्रता, स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले महानायकों का स्वप्न था, जिसे उन्होंने हमारे लिए यथार्थ में परिवर्तित कर दिया. स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले महानायकों में से एक नायक सुभाषचंद्र बोस ने कभी कहा था कि तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा. खून भी बहा और आजादी भी मिली. 

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आज हम आजाद हैं, एक पूर्ण गणतांत्रिक ढांचे में स्वतंत्रता की सांस ले रहे हैं. चाहे वैधानिक स्वतंत्रता हो या फिर वैचारिक स्वतंत्रता, या फिर हो सामाजिक और धार्मिक स्वतंत्रता, आज हम हर तरह से स्वतंत्र हैं. पर क्या सचमुच हम स्वतंत्र हैं? क्या हमारी गणतंत्रता हमें गणतंत्र राष्ट्र का स्वतंत्र नागरिक कहलाने के लिए काफी है? विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के गिरते चरित्र ने 63 वर्ष के गणतंत्र के सम्मुख अनेक चुनौतियां खड़ी की हैं जिनसे देश का आम आदमी प्रभावित है. गणतंत्र गनतंत्र बन गया है और गण पर तंत्र पूरी तरह हावी है.

देश के कर्णधार लंबे-चौड़े भाषण देने और जनता को आश्वासनों की घुट्टी पिलाने से बाज नहीं आते हैं. दुलकी चाल से विकास के इस तरह के दिवास्वपनों का क्या वास्तविकता में कोई आधार भी है? बुनियादी आर्थिक कारक तो इससे उल्टी ही कहानी कहते नजर आ रहे हैं, ऋणों का बढ़ता बोझ है कि बढ़ता ही जा रहा है. विदेशी ऋणों का ब्याज आदि को भुगतान का बोझा उस मुकाम पर पहुंच गया है, जहां पिछले कुछ वर्षों से तो शुद्ध रूप से पूंजी का देश से बाहर की ओर ही प्रवाह हो रहा है, यानी पहले जो ऋण लिए गए हैं उनसे संबधित भुगतानों की भरपाई के लिए ही नए ऋण लेने पड़ रहे हैं. देश के विकास के बड़े-बड़े आंकड़े है और इन आंकड़ों की सीढियों पर खडे होकर हम देश की प्रगति और विकास का नाप-तौल करते है. प्रगति के यह तमाम आंकड़े झूठे लगते है, जब देश के इस कोने से उस कोने तक गरीबी की रेखा और गहरी होती हुई दिखाई देती है. देश आज भी गरीबी की दौर से गुजर रहा है. करोड़ों लोग आज भी खुले आसमान के तले सोते है. वे धरती माता को ही बिछौना और ओढना बनाए जिन्दगी को ढो रहे है. चारों और आज भी भूख है. करोड़ों लोगों को आज भी दो वक्त का खाना नसीब नहीं हो रहा है. लोग दर दर की ठोकरें खाने पर मजबूर हैं. न उनके लिए रोटी, न उनके लिए रोजी और उनके लिए दवा-दारू का पूरा इंतजाम है. ऐसा लगता है देश की जिन्दगी को कोई लील गया है. हालात बद से बतर हो रहे है मगर भारतीय गण ने न तो साहस छोड़ा है न उसका मनोबल टूटा है. अपनी अस्मिता को बनाए रखने के लिए वह आज भीतर और बाहर के दुश्मनों का लौहा ले रहा है. आतंकवाद, साम्प्रदायिकता और अलगाववाद के त्रिकोण में धसा भारत का गणतंत्र नई करवट ले रहा है और इन राष्ट्र विरोधी तत्वों से डट कर मुकाबला कर रहा है.

भारतीय गणतंत्र के लिए नई आर्थिक नीतियां, सांप्रदायिकता, आतंकवाद आदि न सिर्फ बड़ा खतरा हैं, बल्कि भारी चुनौतियां भी हैं. वास्तव में तत्त्ववादी ताकतें सांप्रददायिक धु्रवीकरण को तीखा करने की कोशिश कर रही हैं. आज देश में जिन उदारीकरण-विश्वीकरण-निजीकरण की नई आर्थिक नीतियोंं को लागू किया जा रहा है, उनसे मंहगाई और बेरोजगारी बढ़ रही है, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर हो रही हैं, लोगों की खाद्य और सामाजिक सुरक्षा खतरे में पड़ गई है और इन सबके चलते हो रहे सांस्कृतिक पतन के कारण खासकर युवा वर्ग कुंठा और निराशा के गर्त मं डूब रहा है. इसकी वजह से जो व्यापक जन-अंसतोष पैदा हुआ है, उसको सांप्रदायिक ताकतों ने आम लोगों की धार्मिक भावनाओं को शोषण कर बड़ी चालाकी से भुनाया है.

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेश्नलद्वारा करवाए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में करीब आधी से अधिक जनसंख्या जो सार्वजनिक सेवाओं में कार्यरत है, घूस या सिफारिश से नौकरी पाती है. जहां हम दिन-रात विकास की मुख्यधारा से जुडऩे के लिए प्रयासरत हैं और अपने समाज को अपेक्षाकृत अधिक अच्छी जीवनशैली देने के लिए जुटे हुए हैं, वहीं कहीं न कहीं हमारे नैतिक मूल्य और आदर्श प्रतियोगिता की इस चक्की में पिसते जा रहे हैं. कितनी अजीब बात है कि 80.5 प्रतिशत हिंदू, 13.4 प्रतिशत मुस्लिम, 2.3 प्रतिशत ईसाई, 1.9 प्रतिशत सिक्ख, 1.8 प्रतिशत अन्य धर्म के अनुयायियों वाले इस देश में, जो अपने आप को भाईचारे और सद्भावना का दूत मानता है, आज भी गोधरा और बाबरी ढांचा जैसी घटनाएं होती हैं.

सबसे अधिक युवाशक्ति वाला हमारा यह देश आज भी आरक्षण के ताने-बाने में उलझा रहता है और युवाओं को अभी तक वह परिवेश नहीं मिल सका है, जिसकी इस देश को वास्तविक रूप से आवश्यकता है. यहां तक कि रोजगार की संभावनाओं का केवल 16.59 फीसदी हिस्सा ही अभी तक महिलाओं को मिल सका है. धर्मान्धता के चलते इस गणतंत्र की आत्मा पर कई बार कभी भागलपुर नरसंहार’, यूपी के कई जिलों में हालिया साम्प्रदायिक दंगे, इन्दिरा गांधी की मौत पर भडक़े दंगों, तो कहीं गुजरात दंगोंके इतने गहरे घाव लगे हैं कि डर लगता है कहीं यह नासूर ना बन जाए. शिकार हर वर्ग, हर धर्म के लोग रहे, पर घायल भारतीय गणतंत्र हुआ है.

गणतंत्र का आईना जिसमें देश के करोड़ों लोग अपने चेहरे निहारते हैं, मुठ्ठी भर चेहरे हंसते हुए दिखते हैं परन्तु करोड़ों चेहरों पर अब भी उदासी के बादल छाए हुए दिखाई दे रहे हैं. इस समय राष्ट्र एक बडे नैतिक संकट के दौर से गुजर रहा है. नए मूल्यों को स्थापित करने का दावा करने वाले स्वंय इतने भ्रष्ट हो गए है कि उनकी कथनी और करनी पर विश्वास नही किया जा सकता है. सारे देश में भ्रष्टाचार व्याप्त है. और वह भी अपनी पराकाष्ठा को पार कर गया है. इतना ही नहीं अब तो भ्रष्टाचार हमारे जीवन का अंग बन गया है. भ्रष्टाचार के विरूद्ध खडे होने वालो का क्या हश्र होता है, हम भली भांति इसे देख रहे हैं.

बढ़ती हुई मंहगाई ने लोगो का जीना हराम कर दिया है. चीजों के दाम बेलगाम बढ़ रहे हैं. चूल्हों को जलाना मुश्किल हो गया है. मुठ्ठी भर लोग सारे समाज का शोषण कर बोझ नोच-खा रहे है. एक नया वर्ग पैदा हो गया है. वह वर्ग फूल फल रहा है. वही वर्ग काले पैसे की कमाई पर शासन और समाज पर हावी हो गया है. और राजनीति और समाज का नेतृत्व कर रहा है. और पथ प्रदर्शक बना बैठा है. इन सब का परिणाम यह हो रहा है कि गण और तंत्र अलग हो गए है. गण पर नौकर शाही हावी है और नौकर शाही का रवैया भी वही अंग्रेजो जैसा है, जिनके समक्ष जनता तो मक्खी-मच्छर है. नारी की अस्मिता सुरक्षित नहीं है. ऐसा लगता है की जैसे इन पर लगाम लगाने वाला कोई नही हैं. जिन्हे लगाम सौपी गई है वे स्वयं कायर सिद्ध हो रहे है युवा रोजगार पाने को दर दर भटक रहे है. सारे समाज में तनाव और आक्रोश व्याप्त है और वह तनाव से मुक्ति पाने की तलाश में है. चारों और घटाटोप अंधेरा छाया है. सही और सच्चे गणतंत्र की सार्थकता तभी है जब देश के करोड़ों लोगों को तमाम मूलभूत सुविधाएं प्राप्त होंगी. जो संविधान में वर्णित है. आज के दिन हम यह शपथ ले कि देश को बर्बाद और तबाह करने वाली शक्तियों को हम समाप्त करके रख देंगे. वे शक्तियां है क्षेत्रवाद, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार और भाई- भतीजावाद आदि. आइए एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र के मजबूत निर्माण में जुट जाएं. 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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