/* */

फेसबुक, फर्जीवाड़ा और कलम के सिपाही

admin 2
Page Visited: 19
0 0
Read Time:3 Minute, 49 Second

आप इसे फेसबुक के पतन का काल कह सकते हैं. फेसबुक पर मौजूद चेहरे तमाम तरह के फर्जीवाड़े कर किस्म-किस्म के अपराधों को अंजाम दे रहे हैं, खुद को चर्चा में बनाए रखने के लिए खुलेआम चरित्र –हनन हो रहा है,  मानसिक उत्पीडन हो रहा है और तलवारें निकल आई है. ताजा घटना फेसबुक के हिंदी पट्टी में घटी है. fb-fake idअब से कुछ दिन पहले यहाँ राखी शुक्ल नाम की एक फर्जी आईडी उग आई, पहले इस आईडी ने सैकड़ों स्त्री-पुरुषों को जिनमे से ज्यादातर पत्रकार और बुद्धिजीवी थे अपने कब्जे में लिए, जिनमे एक पत्रकार आवेश तिवारी भी थे. फिर एक एक करके कईयों को आवेश तिवारी जी के सम्बन्ध में अनर्गल मेसेज भेजे जाने लगे. इस दौरान ये बात खुलती जा रही थी कि ये आईडी फर्जी है तो आवेश तिवारी ने उसे ब्लाक कर दिया हद तो तब हो गयी जब ब्लाक करने के बाद राखी शुक्ल के वाल पर एक मेसेज आया कि पत्रकार आवेश तिवारी ने मेरा दो साल पहले यौनिक उत्पीडन किया है. जब अन्य महिलाओं और खुद आवेश तिवारी ने इसका प्रतिवाद किया तो वो महिला बिफर पड़ी और अंत में ये स्वीकार किया कि मेरी आईडी फर्जी हैं दरअसल मैं नाइजीरिया में प्रोफ़ेसर हूँ और मेरा नाम नीलम मिश्र है. उन्होंने एक अंतर्राष्ट्रीय नंबर भी दिया और लोगों से बात करने की अपील की. महत्वपूर्ण है कि अभी कुछ समय पहले तमाम साहित्यकारों को भी एक फर्जी आईडी बनाकर इसी तरह से आरोपित किया गया था.

मीडिया दरबार को मिली जानकारी के अनुसार आवेश तिवारी निश्चित तौर पर नीलम मिश्र को जानते हैं, नाइजीरिया के एक विश्वविद्यालय का विज्ञापन उनके माध्यम से ही उनके पोर्टल को मिला था,  फिर उन्ही के नाम की एक आईडी से उन्हें कुछ बेहद व्यक्तिगत मेल्स मिलने लगे, जिसमे किस्म-किस्म की बातें लिखी थी .जब राखी की वाल पर अन्य महिलाओं ने जिनके पास इस मेल्स की प्रति थी,  चिपकाने का दावा किया,  राखी शुक्ल ने यह लिखकर कि मेरा जी मेल एकाउंट हैक हो गया है, पलायित हो गयी. ये भी जानकारी मिली है कि अन्य नयी नयी आईडी से भी आवेश जी और उनके का मित्रों को मेल्स मिलने लगे,  जिसकी शिकायत साइबर क्राइम सेल में भी की गयी थी. ये भी जानकारी मिली है कि सिर्फ राखी शुक्ल के नाम से ही नहीं अनुज शुक्ल, निलोफर के नाम से भी भद्द्दे –भद्दे मेल्स भेजे गए. खैर सारे खुलासे के बाद फेसबुक का माहौल शांत है, लेकिन ऐसी घटनाओं से सबक मिलता है कि बेहद सोच –समझकर ही मित्र बनाये और इस बात के लिए सतर्क रहे कि कभी भी कोई भी फर्जी चेहरा, किस-किस्म के मुखौटे ओढ़कर आपके खिलाफ साजिश कर सकता है.

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

2 thoughts on “फेसबुक, फर्जीवाड़ा और कलम के सिपाही

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

गणतंत्र की चुनौतियां...

–आशीष वशिष्ठ||   विश्व का सबसे बड़ा गणतंत्र राष्ट्र कहलाने वाले हमारे इस देश की स्वतंत्रता व गणतंत्रता, स्वतंत्रता संग्राम […]
Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On LinkedinCheck Our FeedVisit Us On Instagram