शहादत पर सियासत ठीक नहीं…

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-आशीष वशिष्ठ||

पाक सेना द्वारा दो भारतीय सैनिकों को बर्बरतापूर्वक मारने की घटना ने सेना सहित पूरे देश की जनता को हिला कर रख दिया है. पाकिस्तान की बर्बर करतूत से पूरा देश सन्न है. हमेशा की तरह पाकिस्तान ने अपनी करतूत को मानने की बजाय तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की बात की और फ्लैग मीटिंग में भी उसका बेशर्म रवैया कायम रहा. लेकिन इन सब के बीच शहीद हुए सैनिकों के परिजनों को मदद और सांत्वना के नाम पर जो सियासत हो रही है उसे जायज नहीं ठहराया जा सकता है.  सीमा पर शहीद हुए राजपूताना रायफल्स के लांस LNk-Sudhakar-L-and-Hemraj-Singh-Rनायक हेमराज उत्तर प्रदेश व लांसनायक सुधाकर सिंह मध्य प्रदेश के निवासी थे. दोनों की शहादत के बाद देशवासियों की आंखों में आंसू है. साथी जवान आग बबूला हैं लेकिन इस मातमी माहौल में भी नेता और राजनीतिक दल सियासत से बाज नहीं आ रहे हैं. शहीदों की शहादत पर राजनीति पूरे चरम पर हैं और नेता मगरमच्छी आंसू बहाकर वाहवाही सुर्खियों में छाने को आतुर हैं. शहीदों के गांव का नजारा पीपली लाइव की तरह बना हुआ है.

मथुरा से सैंकड़ों कोस दूर भोपाल में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने राजपाट की ऐसी चाल चली कि उत्तर प्रदेश की सियासत में भूचाल आ गया. शहीद हेमराज के गांव शेरनगर में गुस्से की आग फैली, तो तपिश लखनऊ-दिल्ली तक पहुंच गई. इसे स्थानीय स्तर पर रोकने के प्रयास हुए, बात नहीं बनी तो छह दिन बाद मुख्यमंत्री को खुद आना पड़ा. हेमराज की शहादत से पूर्व तक शेरनगर  गांव अनजान सा था. अचानक हेमराज की शहादत की खबर आई. शाम को शव आ गया. गांव का गुस्सा तो उसी समय बढ़ गया था जब परिजनों-ग्रामीणों को शहीद का चेहरा नहीं दिखाया गया. अगले दिन संचार माध्यमों से खबर आई कि हेमराज के साथ ही मध्य प्रदेश के सीधी क्षेत्र के गांव ढरिया का सुधाकर सिंह भी शहीद हुआ. उसकी अंत्येष्टि में मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह भी पहुंचे. यही बात परिजनों व ग्रामीणों को चुभ गई. सिर व सम्मान की मांग करते हुए परिजनों ने ग्रामीणों संग मोर्चा खोल दिया. सबका कहना था कि लखनऊ से मुख्यमंत्री क्यों नहीं आए? दिल्ली का दिल इतना छोटा हो गया कि शहादत पर भी शोक को न आए? यह आवाज बुलंद न हुई तो शहीद के परिजनों और ग्रामीणों ने अंत्येष्टि स्थल पर धरना शुरू कर दिया. आनन-फानन में दौड़े प्रशासनिक अफसरों को उल्टे पांव लौटा दिया. शहीद की पत्नी धर्मवती और मां मीना देवी ने तो सिर और सम्मान के लिए कुछ न खाने-पीने की सौगंध ले ली. अफसरों ने लाख तसल्ली दी, लेकिन सब बेकार. क्षेत्रीय सांसद जयंत चौधरी पांचवें दिन शहीद के परिजनों को सांत्वना देने पहुंचे. सोनिया गांधी का संदेश लेकर अलीगढ़ के पूर्व सांसद ब्रजेंद्र सिंह व विधायक प्रदीप माथुर भी पहुंचे. सब पर परिजनों और ग्रामीणों ने जमकर गुस्सा उतारा. मामला राजनीतिक रूप से गर्माया तो छह दिन बार लखनऊ से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का हेलीकॉप्टर उड़ा तो दिल्ली से रक्षा राज्य मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह ने शेरनगर का रूख किया. राजनीतिक दल भी मौका भुनाने में पीछे नहीं रहे. भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी, नेता विपक्ष सुषमा स्वराज भी गांव आ गए. एक दूजे की देखादेखी शहीदों के परिजनजों का सांत्वना देना, मदद की घोषणा करने में सियासत की बू आती है. वोट बैंक की तुच्छ राजनीति और दूसरों को नीचा दिखाने की होड़ में राजनीतिक दलों को इंसानी जज्बातों की कोई चिंता नहीं होती है और राजनीतिक रोटियां सेंकने को कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते हैं.

देश की सीमा और आंतरिक सुरक्षा के दौरान हर वर्ष देश में सैंकड़ों सैनिक शहीद हो जाते हैं. राजनीति चमकाने के लिए मगरमच्छी आंसू बहाने वाले नेता चार दिन के बाद ये जानने की कोशिश भी नहीं करते हैं कि शहीद का परिवार किसी हाल में गुजर-बसर कर रहा है. सरकार, प्रशासन और राजनीतिक  दल तो मदद के नाम पर सहानुभूति बटोरने और खुद को परिवार का सबसे करीबी होने का नाटक करते हैं लेकिन उन्हें रोते-बिलखते परिजनों के दुख का रंच मात्र भी अहसास नहीं होता है. ये कोई पहला ऐसा वाकया नहीं है कि शहीदों की शहादत पर सियासत हो रही हो. सरकार और संवेदनहीन प्रशासन की दृष्टिï में अगर शहीदों की कोई कद्र होती तो दंतेवाड़ में नक्सली हिंसा में शहीद हुए छत्तीसगढ़ पुलिस के चार कर्मियों के शव कूड़ा ढोने वाली गाड़ी में लाए गए होते.

मुंबई में हुए आंतकी हमले में अपनी जान गंवाने वाले मेजर उन्नीकृष्णन के परिजनों ने बेटे की शहादत के बाद राजनीतिक दलों के मगरमच्छी आंसुओं और फौरी बयानबाजी से आजिज आकर मुख्यमंत्री को घर से खदेड़ दिया था. मध्य प्रदेश के जाबांज आईपीएस अधिकारी नरेंद्र कुमार सिंह की खनन माफियाओं ने हत्या कर दी थी. कर्तव्य की बलिवेदी पर चढ़े ईमानदार पुलिस अफसर की शहादत के बाद जो सियासत हुई उस पर उसके परिजनों ने हाथ जोड़ लिये थे. वास्तिवकता यह है कि नेताओं के जज्बात मर चुके है, उनकी शिराओं में खून की बजाय पानी दौड़ता है और उनकी दृष्टिï में किसी की शहादत का कोई मोल और सम्मान नहीं है.  बटला हाउस इनकांउटर में शहीद हुए दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की शहादत पर जो ओछी और तुच्छ राजनीति हुई वो किसी से छिपी नहीं है.

 

सरकार की बेशर्मी, बेरूखी और संवेदनहीनता कई मौके पर सामने आ चुकी है. शहादत के वक्त बड़ी-बड़ी घोषणाएं और डींगे मारने वाले नेता बाद में पीछे पलटकर देखते भी नहीं है कि शहीद के परिजन किस हालत में हैं. भारत-पाक युद्व के हीरो और परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद की बीवी का कोई पुरसाहाल नहीं है. अपने पोते को मामूली सी नौकरी दिलवाने के लिए कई बार लखनऊ और दिल्ली के चक्कर काट चुकी हैं. कारगिल युद्व और संसद पर हुए हमले में शहीद सैनिकों के परिजन अब तक दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है. कई पूर्व सैनिक वीरता पदक और सरकार से मिले सम्मान को वापस लौटने की धमकी दे चुके हैं. गत दिनों नक्सलियों द्वारा हाल ही में सीआरपीएफ के जवान बाबूलाल पटेल को मौत के घाट उतारकर पेट चीरकर बम रख दिया गया था. शहीद बाबूलाल उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले का रहने वाला था. मुख्यमंत्री, केन्द्र और राज्य सरकार का कोई सक्षम अधिकारी आज तक शहीद के परिजनों के आंसू पोंछने नहीं गया है. इस मामले में भी राजनीति शुरू हो गयी है.

आज भले ही सरकार शहीदों को उनकी बहादुरी के लिए  दाद दे रही है क्योंकि चुनाव नजदीक हैं, इसलिये समय का तकाजा है कि नेतागिरी का चक्का पूरे जोर से घूमे क्योंकि शहादत रोज-रोज नहीं होती और कभी-कभार ही सियासत चमकाने का मौका मिलता है. विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज एक के बदले पाक सैनिकों के दस सिर लाने की मांग करती है तो वो भले ही उनकी मांग शहीद के परिजनों को मलहम लगाने का काम करती हो लेकिन असल में ये कोरी बकवासबाजी और ओछी राजनीति के सिवाय कुछ और नहीं है. बात-बात पर राजनीति करने वाले नेताओं और राजनीतिक दलों को शहीदों को पूरा मान-सम्मान देना चाहिए न कि उनकी शहादत पर सियासत करनी चाहिए क्योंकि शहीदों के कारण ही देश की सीमाएं, नागरिक और स्वतंत्रता कायम है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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