मानसिक तौर पर बीमार हुए खुशवंत सिंह, अब अरुण शौरी के बेटे पर किया हमला

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ऐसा लगता है खुशवंत सिंह इन दिनों भारी मानसिक अवसाद से ग्रस्त हो गए है। भगत सिंह के खिलाफ़ गवाही देने वाले अपने पिता का नाम विंडसर प्लेस की तख्ती पर टांगने का सपना पूरा करने में जब उन्हें कामयाबी नहीं मिल पाई तो उन्होंने अपने समकालीन नामी पत्रकारों पर निजी हमले शुरु कर दिए हैं।   

अपने ताजा कॉलम में उन्होंने अरुण शौरी पर ‘सांप्रदायिक’ होने का आरोप लगाते हुए खुद को ‘सेक्यूलर’ साबित करने की कोशिश तो की ही है, उनके परिवार और खास कर उस बेटे को निशाना बनाया है जो चल-फिर भी नहीं सकता। खुशवंत सिंह ने तो यहां तक लिख डाला है कि अरुण शौरी जहां भी जाते हैं अपने बेटे को (सहानुभूति बटोरने के लिए) दिखाते हैं। 97 साल की उम्र में खुशवंत सिंह की विकृत मानसिकता का नमूना जरा आप भी पढ़िए और तय कीजिए कि कौन बीमार है? अरुण शौरी का पुत्र आदित्य शौरी या खुशवंत सिंह –

”एक वक्त था, जब मैं अक्सर अरुण शौरी परिवार में आता-जाता था। दिल्ली के वेस्ट एंड में उनका घर है। और मैंने न जाने कितनी बार वहां डिनर किया। उनके परिवार के सब लोगों के साथ मैं घुल-मिल गया था। खासतौर पर अरुण के पिता एचडी शौरी के साथ। अपनी सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद उन्होंने ‘कॉमन कॉज’ बनाया था। और उसके जरिये वह ऐसे राष्ट्रीय मुद्दे उठाते थे, जिन्हें कोई नहीं उठाता था। मेरा तो मानना है कि वह भारत रत्न के हकदार थे। अपने कॉलम में इस पर मैंने लिखा भी था। मैं अरुण की बीवी से बहुत प्रभावित हुआ। वह अरुण जितनी टैलेंटेड न सही, लेकिन अपने बेटे की बीमारी से जूझने में उनका जवाब नहीं। मैंने अपनी एक किताब उन्हें समर्पित की है। लेकिन एक दौर के बाद मेरा जाना बंद हो गया। अरसा पहले उनके यहां एक डिनर पार्टी से यह अलगाव शुरू हुआ। वहां डिनर पार्टी थी और उसमें कुलदीप नैयर भी थे। बातचीत लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या रथ यात्रा पर चल रही थी। मुझे कोई शक नहीं था कि वह यात्रा किसी अच्छी नीयत से नहीं हो रही थी। और उसका मकसद कुल मिलाकर बाबरी मस्जिद को ढहाना था। तभी अरुण वहां से निकले। चलते हुए उन्होंने कहा, ‘कौन कहता है कि वह मस्जिद है?’ मैं हैरान रह गया था। कुलदीप नैयर बोले, ‘प्रोफेसर साहब, आपने सुना ये क्या कह रहे हैं?’ दरअसल, कुलदीप नैयर और राजिंदर सच्चर मुझे प्रोफेसर कहते हैं। लाहौर के ‘लॉ कॉलेज’ में मैंने उन्हें पढ़ाया था।

अरुण की बात पर मैं चुप नहीं रह सका। मैंने कहा, ‘अरुण क्या तुमने कोई ऐसी इमारत देखी है, जिसमें तीन गुंबद हों। और उसकी दीवार मक्का की ओर हो। फिर भी वह मस्जिद न हो।’ अरुण ने कोई जवाब नहीं दिया। उसके बाद से हम एक-दूसरे के खिलाफ ही खड़े हैं। वह हमेशा बाबरी मस्जिद तोड़ने वालों के साथ रहे। मैं हमेशा यही चाहता रहा कि उसे तोड़ने वालों को सजा मिले।

उसके बाद से हम पूरी तरह अलग हो गए। मैं उनको ऊंचाई चढ़ते देखता रहा। पढ़ता रहा। धीरे-धीरे वह बीजेपी के थिंक टैंक हो गए। काबीना मंत्री भी बन गए। अंबेडकर पर उनकी किताब ने दलितों को आहत किया। मुंबई में एक मीटिंग में उनके साथ हाथापाई हुई। वह आहत हुए। सो, औरों को भी आहत करना चाहते थे। वह कोई मौका नहीं छोड़ते अपने बीमार बेटे को व्हीलचेयर पर दिखाने का। मैं उनके लिए सॉरी महसूस करता हूं। लेकिन अब मैं उन्हें पसंद नहीं करता।”

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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  1. खुशवंत सिंह का दिमाग धीरे-धीरे जवाब दे रहा है…अब उनसे ऐसी ही अनाप-शनाप बातों की उम्मीद है…जो मन के भीतर भरा हुआ है…वो इसी उम्र में ही तो बाहर निकलेगा…कम से कम ऐसी बातें करते वक्त खुशवंत सिंह को इस परिवार से अपने पुराने संबंधों के बारे में भी सोचना चाहिए था…जिसका जिक्र उन्होंने किया है…लेकिन लगता है अब इनके भीतर सोचने-समझाने की ताक़त नहीं बची… नाराज़गी अरुण शौरी से है तो अपने गुस्से में उनके बीमार बेटे को क्यों लपेट रहे हैं ? इससे तो लगता है कि उनका फ्रस्टेशन लेवल कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है…

  2. अब इतने लोगों ने इतना कुछ कह दिया की खुशवंत सिंह जी को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए .यह सही है की गद्दार के घर में पैदा हुआ यह इन्सान, इन्सान कहलाने के लायक ही नहीं है.

  3. लिखने कि स्वतंत्रता सबों को है. चाहे खुशवंत सिंह साहिब हों या अरुण शौरी साहिब या कुलदीप नायर साहिब, लेखनी में आज के जुग के पत्रकार इनका हाथ नहीं पकड़ सकता है. ये सभी उस यूग के पत्रकार और लेखक है जिस ज़माने में ना तो गूगल था ना ही विकिपीडिआ जो आज के ज़माने के पत्रकार बंधू अपनी-अपनी लेखनी (गृह कार्य किये बिना) में भरपूर इस्तेमाल करते है.

    व्यक्तिगत तौर पर ना तो में खुशवंत सिंह साहिब या अरुण शौरी साहिब या कुलदीप नायर साहिब, का पक्षधर नहीं हूँ क्योकि सभी “अवसरवाद” के उत्पत्ति हैं. अगर नेहरु परिवार ना होता तो ‘खुशवंत सिंह’ का यह रूप नहीं होता, अगर जन-संघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इंडियन एक्सप्रेस ना होता तो अरुण शौरी के ये तेवर नहीं होते, अगर जयप्रकाश नारायण कुलदीप नायर को नहीं उछाला होता तो कुलदीप नायर ऐसे नहीं होते. सबों ने अवसर का पूरा-पूरा लाभ उठाया है और आज एक “संस्थान” होने का दावा करते हैं जो आज के युग के पत्रकारों को गवांरा नहीं है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज भी, जिन पत्रकारों के सर पर “किसी का हाथ” है, वह इन्ही लोगों के तरह ही व्यवहार करता है.

    लेकिन एक बात तय है, खुशवंत सिंह को शौरी साहिब के बेटे के बारे में लिखते हुए शौरी साहिब पर इस तरह का कटाक्ष करना उन्हें मानसिक रोग से ग्रस्त होने का जीता-जगता उदहारण है. इश्वर ना करे, शौरी साहिब अपने बेटे को लेकर पिछले कई दशकों से जिस मानसिक यातनाओं को झेला है, ऐसा कष्ट इश्वर किसी को ना दे-ना तो बच्चे को और ना ही माता-पिता को. अरुण शौरी साहिब के तरह पिता शायद ही कोई होगा. इश्वर से मनाएं धरती से खुशवंत सिंह जैसे लोग जल्दी उठें.

  4. जिस तरह एक कुत्ता एक कुत्ते को ही पैदा कर सकता है,एक सांप एक सांप को ही पैदा करता है, एक लोमड़ी एक लोमड़ी को ही जन्म दे सकती है उसी तरह एक गद्दार के यहाँ एक गद्दार ही जन्म ले सकता है और उसको गद्दारों का गुट ही पसंद आता है. खुशवंत इसका एक नायाब नमूना है.
    इस पोस्ट में खुशवंत ने जिस कुलदीप नैय्यर की धर्मनिरपेक्षता के नाम की नमाज़ पढी है वो नैय्यर वही है जो अभी कुछ दिनों पहले अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियों द्वारा बेनकाब किया गया है.
    इन एजेंसियों द्वारा पकडे गए ISI एजेंट “फई” की भारत विरोधी सेमिनारों में नैय्यर केवल शिरकत ही नहीं करता था, बल्कि पिछले साल 2010 की ऐसी सेमीनार में U.N. को भेजे गए भारत विरोधी ,पाक समर्थित प्रस्ताव तैयार करने वाली 5 सदस्यीय कमेटी का एक सदस्य भी नैय्यर ही था.
    कुख्यात सच्चर कमेटी वाला राजेंदर सच्चर भी पाक प्रायोजित ISI एजेंट की उस सेमिनार में मेहमान था.
    इन्ही लोगों के कसीदे पढने और अरुण शोरी को गरियाने का काम करके खुशवंत अपने खून का ही परिचय दे रहा है.
    वैसे भी अब उसकी बुद्धि और कलम नितम्बों,वक्षों,शराब की बोतलों,ऐयाशी की अश्लील यादगाहों की कैदी मात्र बनकर रह गयी है..

  5. इस बुढ्ढे नु मार कूट के जंगल में फेंक दो. इसका बाप गद्दार था और ये उसे पंज प्यारे के बराबर बोलता है.. मेरे सारे पुरखे दिल्ली में रहे हैं.. मुझे तो आज तक किसी ने नहीं कहा की पांच बिल्डर का पंज प्यारे कहते थे.

  6. ये बुड्ढा पागल हो गया है। इसे वाहगुरु का नाम लेना चाहिए कि जिंदगी भर इसने जो पाप किए हैं उसके लिए इसे कम नर्क मिले। ऐसे तो मरने से हले ही सड़ जाएगा। धन्यवाद मीडिया दरबार। आपने इसका असली चेहरा उजागर किया

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