सूद समेत होगा पाक का हिसाब..

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-प्रदीप राघव||

26 नवंबर 2003 को भारत-पाक के बीच हुए सीजफायर समझौते का सीमा पार से बार-बार उल्लंघन किया जाता रहा है.
पाकिस्तानी फौज बार-बार धोखेबाजी कर हिंदुस्तान की पीठ में छुरा भोंकती है और ऐसा प्रतीत होता है कि बेईमानी और धोखेबाजी पाक के डीएनए में ही शामिल है. जम्मू-कश्मीर के पुंछ में हुई घटना कोई पहली बार नहीं हुई, इससे पहले भी पाकिस्तान ने कई बार इस तरह के बर्बर कृत्यों को अंजाम दिया है. bunker-1-3_660_011413124259पाकिस्तान सीजफायर का उल्लंघन बार-बार करता रहा है मानो उसे हिंदुस्तान और हिंदुस्तानी फौज का कोई खौफ ही ना हो. लांसनायक हेमराज और सुधाकर जैसे कई भारतीय जवानों के साथ पाक ने इस तरह की बर्बरता पहले भी की है चाहे वो कारगिल में शहीद सौरभ कालिया हो या फिर अन्य कोई भारतीय सपूत. हिंदुस्तान बार-बार पाक को चेतावनी देकर इन मामलों को तूल नहीं देना चाहता और अपनी ओर से दोस्ती का हाथ बढ़ाता आया है.

इसी बात का फायदा उठा भारतीय सीमा में 600 मीटर अंदर घुसकर पाकिस्तानी फौज ने इस नृशंस घटना को अंजाम दिया. हिंदुस्तान बड़े सहज तरीके से पाक की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाता है लेकिन पाक हर बार इस हाथ को काटने की कोशिश करता है और नतीजा सिफर है. समझौता एक्सप्रेस,भारत-पाक क्रिकेट और वीजा नियमों में ढील इसी कोशिश का एक हिस्सा हैं जो बार-बार असफल साबित होते हैं.
अमन-चैन की बात करने वाले पाकिस्तानी हुक्मरान ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर बड़े कड़क लहजे में उल्टा आरोप भारत पर ही मढ़ देते हैं. हिंदुस्तान की ओर से अथक प्रयास करने के बावजूद संबंधों में खटास ज्यों की त्यों बनी हुई है.
जबकि भारत आगमन पर भी पाकिस्तानी हुक्मरानो की जमकर मेजबानी की जाती है फिर चाहे वो राष्ट्रपति का बेटा हो या खुद राष्ट्रपति. पिछले दिनों भारत दौरे पर आए पाक गृहमंत्री रहमान मलिक की खूब खातिरदारी की गई.

हालांकि भारत की ओर से की गई मेजबानी की जमकर तारीफ भी होती है लेकिन जैसे ही संबंध सुधरने लगते हैं, वैसे ही पाकिस्तान कुछ ना कुछ ऊटपटांग हरकत कर बैठता है. ये हालात 1947 से ही बने हुए हैं कभी पाक अधिकृत कश्मीर मसला तो कभी बार-बार किया जा रहा युद्धविराम का उल्लंघन. ये मुद्दे हमेशा से इन दोनों देशों की दोस्ती में सेंध लगाए बैठे है. वैसे हिंदुस्तान की ताकत का अंदाजा कारगिल युद्ध में 90,000 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों के हथियार डालने वाली घटना से ही लग जाता है. हालांकि सीमापार से हमेशा थोड़ी बहुत गोलीबारी पाकिस्तान की ओर से होती ही रहती है. लेकिन इस बार हुई इस नृशंस घटना का जवाब सूद समेत लौटाना होगा. पीठ पीछे धोखाधड़ी और मक्कारी के साथ-साथ पाकिस्तानी हुक्मरान भी हिंदुस्तानी ज़मीन पर अपने विवादों से बखेड़ा खड़ा कर जाते हैं. पिछले दिनों भारत दौरे पर आए गृहमंत्री रहमान मलिक भी जाते-जाते भारत की साख पर बट्टा लगाने की नाकाम कोशिश कर गए. उनके मुताबिक कारगिल में शहीद सौरभ कालिया का शव क्षत-विक्षत उनकी गोलियों से नहीं बल्कि खराब मौसम के कारण हुआ और साथ ही साथ हाफिज सईद और बाबरी मस्जिद को लेकर भी विवादित बयान दे खुशी-खुशी वापस लौट गए. लेकिन भारत की तरफ से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई.

इंडिया टुडे नामक पत्रिका में छपे एक लेख में भारत की कुछ कमिया उजागर होती हैं जिसमें पाकिस्तान की अणु शक्ति ब्रिटेन के बराबर बताई गई हैं. जबकि हिंदुस्तान के कुछ सेना प्रमुखों ने भी माना कि भारत के पास हथियार और गोला बारूद की कमी है. वर्तमान सेना प्रमुख भी मानते हैं कि सेना के पास गोला बारूद की कमी है और हिंदुस्तान का रक्षा बजट भी कम ही है. क्या पाकिस्तान इन्हीं बातों का फायदा तो नहीं उठा रहा. क्यूं ना पहले भारत को इतना मजबूत बनाया जाए कि कोई भी देश इसकी तरफ आंखें उठाने की हिम्मत ना करे. हिंदुस्तान में बनने वाली कुछ फिल्में भी दोनों देशों के रिश्तों को साधने की कोशिश करती हैं इसके उलट पाकिस्तान हमेशा हिंदुस्तान को नीचा दिखाने की कोशिश करता नजर आया है .
बार-बार सीजफायर का उल्लंघन, भारतीय ट्रकों को सीमा पर रोक देना, ‘पैगाम ए अमन’ नामक बस पर रोक लगा देना और अब भारतीय जवानों की निर्मम हत्या के बाद क्रूरता से उनके सिर काट देना. इस तरह की घटना यही दर्शाती हैं कि पाक अब आर या पार के मूड में है और वो नहीं चाहता कि हिंदुस्तान में अमन-ओ-चैन कायम हो. इसलिए हिंदुस्तान को पहले और मजबूत बनकर जल्द ही पाक की इस ना’पाक’ हसरत को पूरा करना होगा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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