नारी देह का भूगोल नापती नज़रों का भाव कैसे बदलेगा..?

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-राधा भार्गव||

महिलाओं और लड़कियों के साथ लगातार बढ़ रहे दुर्व्यवहार के लिए सिर्फ सरकार और पुलिस की लापरवाही को ही जिम्मेदार बताया जा रहा है. यही नहीं नारी सम्मान से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ सख्त कानून बनाये जाने की मांग भी देश भर में उठ रही है. मैं भी इस मांग की पक्षधर हूँ कि यौन अपराधों के लिए सख्त से सख्त कानून हो. यहाँ हमें यह भी देखना होगा कि महज़ सख्त कानून होने से यौन अपराध रूक जायेंगें? नहीं, ऐसा संभव नहीं है. हर गलत काम के खिलाफ कई कानून बने हुए हैं मगर अपराधी फिर भी अपराध करने से बाज़ नहीं आते. हत्या जैसे निर्मम अपराध के लिए कम से कम आजीवन कारावास की सज़ा होने बावजूद देश भर में सैंकड़ों हत्याएं रोज़ होती हैं.indian-boys-flirt-flirting-girl

कुछ देशवासी कह रहें हैं कि हर बस, हर गली, हर रेल के डब्बे और हर संभव कोने में पुलिस तैनात हो ताकि अपराधी अपराध को अंजाम नहीं दे पाये (शायद इन लोगों ने माननीय न्यायमूर्ति आनंद नारायण मुल्ला की टिप्पणी नहीं पढ़ी. हरियाणा के पुलिस प्रमुख रहे निर्मल सिंह ने डीजीपी रहते हमें एक साक्षात्कार के दौरान पुलिस को शैतान की उपमा दी थी). वैसे हमारे देश में हर प्रदेश के पुलिस प्रमुख हमेशा नफरी की कमी को लेकर अपनी चिंता जताते रहते हैं. यह सच भी है कि भारत के हर राज्य में पुलिस विभाग का बड़ा प्रतिशत कानून व्यवस्था बनाये रखने की बजाय वीवीआइपी समुदाय की सुरक्षा के नाम पर उनकी सेवा में लगा दिया जाता है. ऐसे में हर चौराहे, हर गली, हर बस या बस स्टैंड पर पुलिस कैसे तैनात की जा सकती है?

इन हालातों में ऐसा क्या हो कि आपकी-हमारी बहन या बेटी अपनी आजादी को बरक़रार रखते हुए निसंकोच कहीं भी आ जा सके. यही नहीं, उसे कभी यह एहसास न हो कि वह किसी पुरुष की हवस का शिकार बन सकती है. राह चलते वह किसी शोहदे की बेहूदा फब्तियों का निशाना भी न बने कोई महिला, ऐसा कैसे संभव हो? नारी देह के भूगोल को नाप लेने को आतुर नज़रों में नारी के प्रति सम्मान कैसे पैदा किया जाये ऐसा कोई कारगर फार्मूला हमारे सामने नहीं आ रहा.

एक तरफ आजाद पंछी की तरह आसमान में कुलांचें भरने को आतुर महिलाएं और दूसरी तरफ गिद्ध की तरह इन पंछियों पर अपनी नापाक दृष्टि गढ़ाए काम लोलुप पुरुष वर्ग, जो सत्तर साल की उम्र में भी अपनी पोती जैसी लडकी के शरीर पर बेटी बेटी कहते हुए अपना वासना भरा हाथ फेरने में नहीं हिचकिचाता.

नारी के साथ होने वाले इस दुर्व्यवहार को महज़ एक झटके में सद्व्यवहार में नहीं बदला जा सकता. इसके लिए हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी और लगातार प्रयत्नशील रहना होगा. पूरे समाज की सोच बदलने की शुरुआत हमें अपने घर परिवार से करनी होगी.

हो सकता है कि मेरी बात आपको अटपटी लगे मगर कडुवा सच यही है कि लडकी जब थोड़ी सी बड़ी होती है तो उसे बात बात पर टोकना शुरू हो जाता है कि ऐसे मत बैठो, ये मत करो, जोर से मत हंसो, ऐसे मत खाओ, ये मत पहनो, ऐसे नहीं चलो, लड़कों के सामने ऐसे मत जाओ इत्यादि इत्यादि बन्धनों का पूरा बण्डल उसके सिर पर रख दिया जाता है. वहीँ, लड़कों को न तो किसी बात के लिए टोका ही जाता है और ना ही उसे ऐसी कोई शिक्षा दी जाती है कि उसे लड़कियों के साथ कैसे पेश आना चाहिए. यहाँ एक सवाल खड़ा हो जाता है कि क्या लड़के माँ के पेट से ही सीख कर आते हैं कि लडकी से किस तरह व्यवहार करे, क्या वह जन्मजात ‘ज्ञानी’ होता है?

जब बच्चे और बड़े होते हैं लडकी की तो छोटी से छोटी गलती को सुधारने के प्रयास पुरे मनोयोग से होते हैं मगर लड़कों की गलतियों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. कोई बात नहीं, यह तो लड़का है, लड़के तो ऐसे ही करते हैं, कर दिया तो क्या हुआ, लड़का ही तो है इत्यादि जुमलों के साथ लड़कों की ज्यादातर गलतियाँ हवा में उड़ा दी जाती हैं. जिससे लड़के अपनी गलतियों को पहिचानने से महरूम रह जाते हैं, उन्हें पता भी नहीं चल पाता कि उसने कुछ गलत किया है. धीरे धीरे वे खुदको लड़कियों से सुपीरियर समझने लगते हैं और उनका मजाक उड़ाना शुरू कर देते हैं.

यदि कोई लडकी अपने भाई की देखा देखी कुछ करती है तो उसे टोक दिया जाता है कि वो ऐसा न करे, इस पर यदि लडकी अपने भाई का उदाहरण देती है तो कह दिया जाता है कि वो तो लड़का है. यही बात उस लड़के को कुछ भी करने का लाइसेंस दे देती है और वो सोचने लगता है कि वह सब कुछ करने को स्वतंत्र है.

मेरा मानना है कि जितनी और जिस तरह की रोक टोक हम लडकी पर रखते हैं उतनी ही रोक टोक हम लड़कों पर भी लगायें तो लड़का खुद को लडकी से सुपीरियर मानना बंद कर देगा.

आज भी भारतीय परिवारों की यह मान्यता है कि लड़के से उनका वंश आगे बढेगा जबकि लडकी तो पराया धन है. लड़का घर का चिराग है और इस चिराग से प्रकाश फैलेगा. चिराग रौशनी करे तब तक तो ठीक है मगर जब यही चिराग शोला बन कर भभक उठे तो आग लगा देता है. क्या वंशावली के नाम पर लड़कों की उचित अनुचित हरकतों को अनदेखा करना उन्हें उदण्ड नहीं बनाता?

ज़ारी….

(लेखिका इलेक्ट्रोनिक मीडिया की शुरुआत से सम सामयिक विषयों पर कार्यक्रम बनाती रहीं हैं और अब अंग्रेज़ी में ब्लॉगिंग करती हैं)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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3 thoughts on “नारी देह का भूगोल नापती नज़रों का भाव कैसे बदलेगा..?

  1. नारी देह का भूगोल नापती नज़रों का भाव न बदला है न बदलेगा, यक एक कटु सत्य है। यदि दोष देना है तो भगवान को दीजिए

  2. Jab Modern dresses of ladies unke golanka pradashan Karati ho to use andha dekhane ki khaish rakhaga, Yes pachimatya ki den hi , Thand pradeshome rahane wale Apane jismkapura achhadan karate hai na<> Tab nmnate KYA?

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