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स्त्री विरोधी वाहियात बयानों का सिलसिला चालू आहे…

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-प्रणय विक्रम सिंह||

जहां एक तरफ  महिला अधिकारों व स्थिति को लेकर समाज को संवेदित करने की बात चल रही है वहीं समाज को नेतृत्व व दिशा प्रदान करने वाला वर्ग महिला विरोधी, असहिष्णु बयान देकर समाज में कायम लिंग आधारित भेदभाव व असमानता की लकीर को और गहरा कर रहा हैं. कोई उनकी देह के भूगोल में ही सारी सफलता की तदबीरें खोज लेता है तो कोई पुरानी शराब से तुलना कर मजे की पैमाइश करने का रास्ता बता देता है. अभी हाल ही में दिल्ली में घटित हुए सामूहिक दुराचार की घटना ने जहां समूचे देश को आत्मावलोकन के लिए विवश कर दिया है कोई फांसी की मांग कर रहा तो, कोई मानसिकता में परिवर्तन को ही समस्या का समाधान मान रहा है किन्तु इन सबके दरम्यान धार्मिक गुरु आसाराम बापू ने पीडि़ता को ही कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि छात्रा भी उतनी ही दोषी है जितने दुष्कर्मी. सिर्फ 5-6 शराबी ही दोषी नहीं हो सकते. पीडि़त बच्ची भी दुष्कर्मियों के बराबर की दोषी है.India-Gang-Rape-protests

लडकी को दोषियों को अपना भाई बना लेना चाहिए था. उनके आगे गिड़गिड़ाकर यह सब बंद करने के लिए कहना था. इससे उसकी जान और इज्जत दोनों बच सकती थी. क्या एक हाथ से थाली बजती है? मुझे ऐसा नहीं लगता. आरोपियों ने शराब पी रखी थी. यदि लडकी ने गुरुदीक्षा ली होती, देवी सरस्वती का मंत्र लिया होता तो वह बॉयफ्रेंड के साथ उस बस में चढ़ती ही नहीं. अब बापू को कौन बताये कि पुलिस का रिकॉर्ड बयान करता है कि बलात्कार की अधिकतर घटनाएं पीडि़ता के नजदीक, घर वालों के द्वारा ही होती है. उन दुराचारियों ने बहन संबोधित करके ही बैठने के लिए आमंत्रित किया था. वह शायद अंगुलीमार डाकू और भगवान बुद्ध के प्रसंग को पुन: चरित्रार्थ होते देखने की कल्पना में जी रहे है. संभव है कभी ऐसा हो भी किन्तु पीडि़ता को दोष देने संबंधी बयान से तो पुंसवादी मानसिकता की निर्मिमता ही झलकती है.

यही नहीं राजग के संयोजक शरद यादव यह कहकर उलझ गए कि ब्रह्मचर्य का आडंबर फैलाया जा रहा है जबकि सच यह है कि ‘सबको’ सेक्स की जरूरत है. हरियाणा के रोजगार मंत्री शिवचरण शर्मा ने गोपाल कांडा को बचाते हुए अर्ज किया कि गीतिका खुदकुशी केस कोई बड़ा मामला नहीं है. बात बस इतनी सी है कि गोपाल कांडा ने एक गलत नौकर रख लिया था. भविष्य में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदार मोदी ने अपने राज्य में कुपोषण की उच्च दर मौजूद होने का कारण अपने राज्य की स्त्रियों की सौंदर्य प्रियता में खोजी. समाजवाद के सबसे बड़े हस्ताक्षर मुलायम सिंह ने कभी कहा था कि संसद में यदि महिलायें आ गई तो सांसद उन्हे पीछे से सीटी मारेंगें, यही नहीं अभी हाल ही में वह एक जनसभा में कहतें हैं कि गांव की महिला शहर की महिला की तरह सुन्दर और आकर्षक नहीं होती है लिहाजा उसकी सफलता की संभावना कम ही रहती है.

छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ननकी राम कंवर ने तो सारे कदाचार का दोषी दूसरी दुनिया के सितारों को बताया है. उन्होने कहा कि महिलाओं के खिलाफ  अपराध इसलिए हो रहे हैं, क्योंकि उनके ग्रह-नक्षत्र सही नहीं हैं. अगर ग्रह -नक्षत्र विपरीत स्थितियों में हों तो किसी भी व्यक्ति को नुकसान हो सकता है. हमारे पास इसका कोई जवाब नहीं है. केवल ज्योतिषी ही इसका आकलन कर सकते हैं.

केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जैसवाल ने तो पुरानी शादी व पुरानी बीबी के ‘बे-मजा’ होने का गुप्त ज्ञान सार्वजनिक कर यूरेका कर दिया था. भारतीय संस्कृति स्वयंभू ठेकेदार संघ के मुखिया ने तो विवाह नामक संस्था पर ही सवाल उठाते हुए उसे सौदा बता दिया. सारे संबंध को आवश्यक्ताओं की पूर्ति की उत्पत्ति बता कर उन्होंने महिलाओं का वस्तुकरण भी किया.

संघ प्रमुख बहुत बड़ी आबादी के बीच बड़ी ही गंभीर उपस्थित रखते है. उनका कहा हर वाक्य संघ के स्वयंसेवको के लिए आचरण सहिंता की तरह होता है वैसे भी संघ को विश्व का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन बताया गया है तो समझा जा सकता है कि उनका ‘सन्देश’ कहां तक गया होगा. अब कहा जा रहा है कि मीडिया ने उनका बयान पूरा नही प्रकाशित किया. उन्होने तो यह बयान पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव से भारतीय सभ्यता के मूल्यों में हो रहे पतन को संदर्भित करते हुए दिया गया है.

आदिकाल से ही इस पुरुषवादी समाज ने सदैव अपने पापों के लिए हव्वा की बेटियों को ही जिम्मेंदार माना है. जैसे राम-रावण युद्ध का कारण सीता का लक्ष्मण रेखा लांघना बताया गया और पूरा महाभारत द्रौपदी की करनी का फल था ऐसा प्रचारित किया जाता है. शायद रात के समय अहिल्या के पास इंद्र देवता पधारे, यह भी अहिल्या की गलती थी, सजा मिली, वह शिला बना दी गई. उस समय फास्ट ट्रैक अदालतें नही थी तभी पूरा एक युग बीत गया अहिल्या को न्याय मिलने में, न्याय भी कहां मिला वह तो प्रभु राम के चरणों के स्पर्श के पश्चात अपने मूल स्वरूप में वापस आयी  थी. इंद्र और गौतम ऋषि का तो कुछ भी नही बिगड़ा था. वह परिपाटी आज भी जारी है. बहरहाल, औरत हमेशा ही समाज का निशाना रही है. प्राचीन काल से आज तक न जाने कितनी सदियां बीत गई, कितने चांद-सूरज ढल गये, कितनी सभ्यताओं ने अपने चेहरे बदले. क्या मेनका के विश्वामित्र, जाबालि के ऋ षि स्वामियों से लेकर चित्रलेखा के कुमारगिरि तक बदले? क्या ये सब कुलटाएं थीं? इनके तो परिधान भी आधुनिक नहीं थे. इन सवालों को दरकिनार करते हुए दोष स्त्रियों पर ही लगाया गया कि इन्होंने महान ऋ षियों, ब्रह्मचारी तपस्वियों को रिझाया. यह द्रष्टि भी हमारी ही गौरवशाली संस्कृति का हिस्सा है, जो आज तक मुसलसल कायम है. इस द्रष्टिकोण को बदलने के लिए जाने कितने ‘भागीरथी’ प्रयास किए गये किंतु आज भी पितृ सत्तात्मक सोच अपने अटल स्वरूप में कायम है. जब तक समाज के यह कथित नायक अपनी ‘अधिनायकवादी’  मानसिकता का सार्वजनिक प्रदर्शन करेंगे, तब तक स्त्री के प्रति यौन अपराधों का सिलसिला बदस्तूर जारी रहेगा, चाहे कितने ही सख्त कानून बना दिये जाएं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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