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मनोज भावुक का सेल्यूलाइड की दुनिया में प्रवेश…

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मशहूर भोजपुरी राइटर और टेलीविजन पर्सनाल्टी मनोज भावुक अब भोजपुरी फिल्मों में भी नजर आने लगे हैं. वर्ष 2012 के शुरुआत में हीं इनकी पहली फिल्म ‘सौगंध गंगा मईया के’ रिलीज हुई. मनोज की दूसरी फिल्म ‘रखवाला’ अगले वर्ष 26 जनवरी को रिलीज होगी. ‘सौगंध गंगा मईया के’ की तरह ही रखवाला में भी मनोज ने एक ईमानदार पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाई है.manoj bhawuk

भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के लिए नए नहीं हैं मनोज

मनोज बताते हैं, ”यह सच है कि अभिनय के माध्यम से फिल्मों में मेरी शुरुआत हुई है परन्तु भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के लिए मै नया नहीं हूँ. डेढ़ दशक पुराना और गहरा नाता है. मनोज तिवारी, रवि किशन, निरहुआ, पवन सिंह, कुणाल सिंह, अभय सिन्हा, मोहन जी प्रसाद, रानी चटर्जी, रिंकू घोष, पाखी हेगड़े, संगीता तिवारी, अक्षरा, स्मृति, संजय पाण्डेय, अवधेश मिश्रा ….सभी परिचित व आत्मीय हैं लेकिन रखवाला में काम करने से दिनेश जी (निरहुआ ) और करीब आये. वे बहुत सरल और सहज हैं.” ‘सौगंध गंगा मईया के’ के निर्देशक हैं राजकुमार आर पाण्डेय और ‘रखवाला’ के निर्देशक हैं असलम शेख. मनोज कहते हैं कि दोनों भोजपुरी के बड़े निर्देशक हैं. इनके साथ काम करने का अनुभव सुखद रहा.

भोजपुरी सिनेमा के इनसाइक्‍लोपीडिया हैं मनोज

Saugandh Ganga maiya ke 2मनोज ने भोजपुरी सिनेमा के बिखरे इतिहास को सहेजने और समेटने की सफल कोशिश की है और इस कोशिश में अमिताभ बच्चन, सुजीत कुमार, राकेश पाण्डेय, कुणाल सिंह, रवि किशन, मनोज तिवारी, कल्पना समेत 50 से ज्यादा फ़िल्मी हस्तियों का साक्षात्कार किया है. मनोज के शोध आलेख ‘भोजपुरी सिनेमा के विकास यात्रा’ की बुनियाद पर कई शोधार्थियों ने अपना शोध पूरा किया और कई लेखकों ने अपनी पुस्तकें लिखीं.

इसी वर्ष 2012 में मनोज ने भोजपुरी सिनेमा के इतिहास पर एक डाक्यूमेंट्री बनाई जिसमें 1948 से Saugandh Ganga maiya keलेकर 2011 तक के फिल्मों पर विहंगम दृष्टि है और 20 बड़ी फ़िल्मी हस्तियों के बाइट्स हैं. 25 मार्च 2012 को दिल्ली में आयोजित विश्व भोजपुरी सम्मलेन के फ़िल्म सत्र में फिल्म, साहित्य, राजनीति और संगीत जगत की जानी मानी हस्तियों ने लाखों दर्शकों के साथ इस डाक्यूमेंट्री को देखा और सराहा. राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित भोजपुरी के महानायक कुणाल सिंह ने मनोज भावुक को ‘भोजपुरी सिनेमा का इनसाइक्लोपीडिया’ कहा. इस अवसर पर मनोज ने श्वेता तिवारी के साथ मिलकर विश्व भोजपुरी सम्मलेन का संचालन भी किया. मनोज को बेस्ट एंकर के सम्मान से नवाजा गया.

बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं मनोज

यही नहीं पटना एफएमसीसीए के स्वर्णिम भोजपुरी समारोह में भोजपुरी सिनेमा में भाषा और महिलाओं की स्थिति विषय पर आयोजित सेमिनार का संचालन भी मनोज भावुक ने हीं किया। सेमिनार में पद्मश्री शारदा सिन्हा, सुपर स्टार मनोज तिवारी, रविकिशन, मालिनी अवस्थी, बीएन तिवारी, निर्माता अभय सिन्हा, टीपी अग्रवाल , निर्देशक अजय सिन्हा, विनोद अनुपम, लाल बहादुर ओझा और युवा निर्देशक नितिन चंद्रा ने अपने विचार रखे।

मुम्बई में आयोजित भोजपुरी सिटी सिने अवार्ड में कन्टेंट डिजाइन और एंकर लिंक मनोज भावुक ने हीं तैयार किया.
Rakhwala 2मनोज कई टीवी चैनल्स पर बतौर भोजपुरी फिल्म एक्सपर्ट शिरकत करते रहे. हमार टीवी पर भोजपुरी सिनेमा के 50 साल और फिल्म विशेष नामक कार्यक्रम बहुत लोकप्रिय हुए जिसे मनोज होस्ट करते थे. फिल्म विशेष में पटना, दिल्ली और मुम्बई स्टूडियो में बैठे फिल्म सेलिब्रिटीज से एक साथ मनोज किसी फ़िल्मी मुद्दे पर या किसी फिल्म विशेष पर परिचर्चा करते थे.
आज से 14 साल पहले मनोज ने अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मलेन के तत्वाधान में पटना में एक फिल्म सेमीनार का आयोजन किया और भोजपुरी सिनेमा के इतिहास पर पर्चा पढ़ा. यह कोई पहला आयोजन था जिसमें साहित्यकारों के साथ फिल्मकारों ने भी शिरकत किया.
मनोज का भोजपुरी सिनेमा और सिनेमा जगत से पुराना और गहरा सम्बन्ध रहा हैं. अपने अफ्रीका और इंग्लैण्ड प्रवास के दौरान भी मनोज भोजपुरी सिनेमा पर लिखते रहे. भोजपुरी फिल्म गंगा के रीलिज पर BBC के लन्दन स्टूडियो में मनोज से बात चीत भी की गई.
मनोज की प्रतिभा के कायल हैं मनोज!
एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के ऑफिसर्स क्लब में एक अविस्मरणीय घटना घटी . भोजपुरी सिनेमा के इस दौर के सुपर स्टार मनोज तिवारी से भोजपुरी सिनेमा के सफर पर बाइट लेने पहुंचे मनोज भावुक उनसे बात चीत में इतने तल्लीन हो गए कि पता हीं नहीं चला की कब और कैसे ढ़ाई घंटे बीत गए और वहाँ उपस्थित भीड भी pin drop silence के साथ इस फ़िल्मी चैट का आनंद लेती रही. मनोज कहते हैं की तिवारी जी जब मिलते हैं इस इंटरव्यू का जिक्र जरूर करते हैं.
अभिनय से पुराना रिश्‍ता है मनोज का
फिल्म की तरह अभिनय से भी मनोज का पुराना नाता है . मनोज पेरिस, यूनेस्को के बिहार केंद्र बिहार आर्ट थियेटर, कालिदास रंगालय, पटना द्वारा संचालित द्विवर्षीय नाट्यकला डिप्लोमा के टॉपर रहे हैं और अपने उत्कृष्ट अभिनय के लिए वर्ष 1999 के बिहार कलाश्री अवार्ड से नवाजे जा चुके हैं . वहाँ मनोज ने बकरा किस्तों का, मास्टर गनेसी राम, हाथी के दांत, नूरी का कहना है, बाबा की सारंगी, पागलखाना, ख्याति समेत दर्जनों नाटकों में अभिनय किया.
साहित्‍य और पत्रकारिता में रुचि ले गई बड़े पर्दे के नजदीक
16 वर्ष पूर्व पटना दूरदर्शन पर भोजपुरी साहित्यकारों और कलाकारों के साक्षात्कार से मनोज ने अपने पत्रकारीय करियर की शुरुआत की थी. फिर 1998 में भोजपुरी के प्रथम टीवी सीरियल ‘सांची पिरितिया’ में बतौर अभिनेता और 1999 में ‘तहरे से घर बसाएब’ टीवी सीरियल में बतौर कथा-पटकथा, संवाद व गीत लेखक जुड़े. वर्तमान में अंजन टीवी में बतौर एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर कार्यरत हैं.
मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे

मनोज पेशे से इंजिनियर रहे हैं . कई मल्टीनेशनल कंपनियों में बतौर इंजिनियर काम कर चुके हैं . पर्ल पेट (मुम्बई), रवेंजोरी (कम्पाला, युगांडा, पूर्वी अफ्रीका) और हादम (इंग्लैंड) में एक दशक तक काम करने के बाद अपनी मातृभूमि और मातृभाषा के लिए स्वदेश वापस लौट आये . दो दशक पहले मनोज ने अपने करियर की शुरुआत मेडिकल और इंजीनियरिंग के छात्रों को केमेस्ट्री पढ़ाने से की . फिर रंगमंच, रेडियो , टीवी और पत्रकारिता से जुड़े और फिर इंजीनियरिंग से . .और वर्तमान में फिर टीवी चैनल से जुड़े हैं . मनोज कहते हैं ” हालांकि बार बार रास्ता बदलना ठीक नहीं है ..जर्क आता है …एनर्जी डिस्ट्रीब्यूट हो जाती है . कबीर दास ने कहा है ” एक साधे सब सधै , सब साधे सब जाय ” लेकिन क्या किया जाय – मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे / मुकद्दर में चलना था, चलते रहे .

जब दिल में टीस उठती है
मनोज अभिनय और लेखन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए भारतीय भाषा परिषद सम्मान , भाऊराव देवरस सेवा सम्‍मान,भिखारी ठाकुर सम्मान, राही मासूम रजा सम्मान, बेस्ट एंकर अवार्ड समेत दर्जनों सम्मानों से नवाजे गए हैं. वैसे तो मनोज दिल से शायर हैं. जब दिल में टीस उठती है या हलचल मचती है तो जज्बात तस्वीर जिन्दगी के और चलनी में पानी के रूप में कागज़ पर उतर हीं आते हैं लेकिन अब देखना यह है कि क्या अभिनय की दुनिया में भी मनोज भावुक वही मुकाम हासिल कर पाते हैं जो उन्होंने साहित्य की दुनिया में प्राप्त किया है .

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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