यों ही कब तक पड़े रहोगे, नए साल के नाम पर तो कुछ करो..

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– डॉ. दीपक आचार्य||

एकरसता और जड़ता से घिर कर रह जाने की आदत पाले बैठे आदमियों के लिए ही ये नव वर्ष और दूसरे उत्सव हैं ताकि इनके बहाने तो कम से कम वह उठे और कुछ नया करने का साहस करे.recliner

वरना जो लोग कर्मयोगी हैं और निरन्तर कर्म करते रहने के आदी हैं उनके लिए तो हर दिन नया वर्ष ही है और ऎसे लोगों को नव वर्ष या दूसरे किसी अवसरों के बहाने की कोई आवश्यकता कभी नहीं पड़ती.

कर्म के प्रति निष्ठावान और एकाग्र लोगों के लिए किसी भी प्रकार के बाहरी उद्दीपनों या प्रेरणा की कोई जरूरत नहीं हुआ करती. इन लोगों का सारा कामकाज स्वयंप्रेरित और अन्तःप्रेरणा से इस प्रकार संचालित होता है जैसे कोई दैवीय प्रेरणा इनसे ये काम ले रही हो.

ऎसे कर्मयोगियों के लिए बहानों या अवसरों की तलाश कभी नहीं रहती बल्कि जिस समय से ये काम की शुरूआत करते हैं वह दिन और घड़ी ही उनके लिए नई नवेली और उत्साह भरी हो जाती है.

दुनिया में एक जमाना वह था जब कर्मयोगियों की भरमार थी और उनके लिए समाज और परिवेश का कल्याण ही लक्ष्य हुआ करता था और ऎसे में ईश्वर भी ऎसे लोगों की भरपूर मदद करता था. इस कारण उनके काम में आने वाली बाधाओं का स्वतः ही समाधान हो जाया करता था और इसके कालजयी तथा आशातीत परिणाम भी सामने आते थे. यही वजह है कि इन कार्यों को सदियों तक प्रेरणा का स्रोत माना जाता रहता है. आज कर्मयोगियों की संख्या नगण्य होती जा रही है और फलार्थियों एवं भोगार्थियों का प्रतिशत खूब बढ़ता ही जा रहा है.

इन लोगों का यही एकमेव लक्ष्य रहता है कि बिना कोई मेहनत किए संसार के सारे भोग-विलास और ऎश्वर्य उन्हें अपने आप प्राप्त हो जाएं. ये लोग अपने आपको जमाने भर का इतना बड़ा मेहमान और वीआईपी समझते हैं कि इनकी यही चाहत होती है कि लोग सुविधाओं का थाल लेकर उनके समक्ष परोसते रहें और वे इनका आनंद लेने के बाद न डकार लें, न ही किसी को धन्यवाद दें. इस किस्म के लोग अपने इलाके में भी खूब हैं और दूसरी जगहों पर भी. हाल के वर्षों में आदमियों की इस तरह की प्रजाति का खूब डंका बजने लगा है.

इसी प्रकार की एक और प्रजाति है उन आदमियों की जो यथास्थितिवादी हैं या उत्प्रेरित अवस्था में ही सक्रिय रहते हैं. समाज के हर क्षेत्र में ऎसे लोगों की भी खूब भरमार है जो कुछ भी नया करना नहीं चाहते.

जमाना कितनी ही स्पीड से आगे बढ़ता रहे, इन लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता और ये वहीं के वहीं ठहरे रहने को ही अपना आनंद मानते हैं. ऎसे लोगों की संख्या साठ साला सरकारी बाड़ों से लेकर असरकारी क्षेत्रों तक है. इन्हीं निकम्मे और जड़ लोगों की वजह से दुनिया की तरक्की रुकी हुई है वरना आज हम कहाँ से कहाँ होते. हम जहाँ काम करते हैं, जहाँ रहते हैं वहाँ बँधे-बँधाये ढर्रों से बाहर निकल कर कुुछ नया करने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहना चाहिए.

बहुत कम लोग ऎसे होते हैं जो हमेशा नया ही नया करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं और जमाने को कुछ नया कर दिखाते हैं. जबकि बहुत बड़ी संख्या में लोग ऎसे हैं जो अक्सर जड़ता और यथास्थितिवाद के साथ जीने के आदी रहते हैं और जब तक कोई उन्हें प्रेरित न करें या कुरेदे नहीं तब तक कुर्सियों में अधमरे से धँसे रहते हैं और कागजों के कचरे के बीच अपनी सुरक्षित माँद में दुबके रहते हैं.

इनमें से कई सारे लोग इतने तो संवेदनशील जरूर हैं कि किसी पर्व-उत्सव या त्योहार, किसी अवसर अथवा नव वर्ष के बहाने ही साफ-सफाई के साथ ही पुराने समय से लंबित पड़े हुए कामोें के निस्तारण का काम करते हुए प्रसन्नता का अनुभव करते हैं. लेकिन इस सारी भीड़ के बावजूद ढेरों लोग हमारे आस-पास और हमारे क्षेत्र में हैं जो इतने जड़ और संवेदनहीन हो गए हैं कि उन्हें नव वर्ष हो या और कोई अवसर, कोई फर्क नही पड़ता और वैसे ही रहते हैं जैसे हैं.

ये लोग जिन बाड़ों में रहते हैं वे बाड़े पूरे संसाधन और सुविधाओं के बावजूद ऎसे नालायकों और निकम्मों की वजह से कोई तरक्की नही कर पाते. इन लोगों की हद दर्जे की जड़ता और लक्ष्यहीन जीवन के कारण ही समाज और क्षेत्र को नुकसान पहुंचना स्वाभाविक है और ऎसा होता भी है.

इस किस्म के लोगों को कितना ही प्रेरित करें, ये इतने चिकने घड़े होते हैं कि इन पर बूँद भर पानी नहीं ठहरता और वैसे ही अधमरे पड़े रहते हैं जैसे आदतन रूप से हुआ करते हैं.  इन लोगों को यदि उत्प्रेरित करने और काम मेंं लगाने का साहस कोई कर पाए तो यह सृष्टि के लिए तो उपयोगी होगा ही, उन अधमरे लोगों की जिन्दगी में भी कुछ नया कर गुजरने का साहस भी भरेगा.

कोई इन लोगों को समझाए कि साल भर कुछ न कर सकें तो कोई बात नहीं मगर कम से कम नए साल के नाम पर तो कुछ ऎसा करें कि उनके नाम किसी नवीन काम को करने या पुराने कामों के हाथों हाथ निपटारे का रिकार्ड कायम हो सके.

वर्तमान युग की सबसे बड़ी सेवा यही है कि जहाँ कहीं ऎसे मंद गति लोगों को देखें उन्हें जगाएं और प्रेरित करें कि कुछ तो नया करें ताकि जमाने को किसी न किसी रूप में अवतरण का कुछ तो लाभ मिल सके. अधमरे पड़े रहते हुए ही ये अपनी आजीविका वाले बाड़ों में अपना समय पूरा कर लें अथवा जमाने का कुछ भी भला किए बगैर चले जाएं तो इसका पाप भी हमें ही लगने वाला है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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