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उत्तराखण्ड में सरकारी विज्ञापनों की लूट खसोट…

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जालसाज सम्पादक प्रभा वर्मा का गैर कानूनी खेल..सूचना विभाग के अभिलेखो में 9 समाचार पत्रो का संचालन करने की हुई पुष्टि…प्रिन्टिग प्रैस स्वामी के फर्जी हस्ताक्षर से किए डीएवीपी रेट हासिल….

-नारायण परगाई|| 

देहरादून. उत्तराखण्ड में बिना प्रसार के समाचार पत्रो की विभिन्न विभागो में विज्ञापन के नाम पर लूट जारी है. नियम कानूनो को ताक पर रखकर ऐसे समाचार पत्रो को विज्ञापन जारी किए जा रहे हैं जिनका वजूद सिर्फ फाइलो तक सीमित है. कई विभागे में अधिकारियो की मिली भगत से ऐसे समाचार पत्रो को विज्ञापन जारी किए जा रहे हैं जिनका डीएवीपी तक जारी नही है और उनकी प्रसार संख्या सिर्फ सरकारी कागजो में मौजूद है.Letter01

उत्तराखण्ड को शुरू से ही दुधारू गाय के रूप में कुछेक बाहरी लोग इस्तेमाल करते आए हैं और अधिकारियो से लेकर कुछेक बाहरी लोग यहां एनजीओ, समाचार पत्रो व कई योजनाओ में लाखो के वारे न्यारे  चुके हैं जिनकी जांच विजय बहुगुणा सरकार वर्तमान समय में कर रही है. उत्तराखण्ड में लूट का यह खेल वर्ष 2002 में सत्ता में काबिज हुई एनडी तिवारी के षासनकाल में शुरू हुआ था और उस समय की सरकार के षासनकाल में ऐसे लोगो को कृपा का पात्र बनाया गया जो उसकी परिधि में नही आते थे. उसके बाद भाजपा शासनकाल में भी यह कुछ हद तक जारी रहा लेकिन बहुगुणा की सरकार आते ही इस पर रोक लगाने की कोशिशें शुरू हो गई.

उत्तराखण्ड में समाचार पत्रो के माध्यम से विज्ञापनो का खेल वर्तमान समय मे भी जारी है और महिला पत्रकार के रूप मे चर्चित माने जाने वाली प्रभा वर्मा द्वारा सूचना विभाग के अभिलेखा अनुसार 9 समाचार पत्रो का संचालन किया जा रहा है लेकिन सूत्र बताते हैं कि उक्त महिला द्वारा करीब दो दर्जन समाचार पत्रो के माध्यम से विभिन्न विभागो में विज्ञापनो की लूट का खेल खेला जा रहा है.

Letter02एक समय में पत्रकारिता को मिशन के तौर पर देखा जाता था लेकिन अब उक्त महिला द्वारा अपना मिशन विभिन्न विभागो से विज्ञापन के तौर पर मिलने वाले अपने समाचार पत्रो बना लिया गया ळै और सूचना विभाग के शिखंडियो की कृपा के चलते उक्त महिला के समाचार पत्रो को सूचीबद्व कर सूचना विभाग से भी विज्ञापन के रूप में कृपा लगातार जारी है. वर्तमान में हिन्दी दैनिक उत्तराखण्ड तहकीकात, साप्ताहिक सिद्व टाइम्स, साप्ताहिक उत्तराखण्ड तहकीकात, साप्ताहिक सच होता सपना  का प्रकाशन स्थल जिस प्रिन्टिग प्रैस में दर्शाया गया है वह पूरी तरह से फर्जी है उक्त शातिर महिला द्वारा अधिकारियो को गलत सूचना देकर अपने समाचार पत्रो को इन्टर ग्राफिक्स प्रिन्टर्स 64 नैषविला रोड देहरादून से मुद्रित होना बताया गया है जबकि इन्टर ग्राफिक्स द्वारा शिकायत देहरादून के जिला मजिस्टेट से की गई है. प्रैस के स्वामी द्वारा जिलाधिकारी को  भी अवगत कराया गया है कि प्रैस अनुबन्ध पत्र पर प्रिन्टिग प्रैस स्वामी के फर्जी हस्ताक्षर बनाए गए है और इन्ही फर्जी हस्ताक्षरो के माध्यम से आरएनआई में प्रैस अनुबन्ध जमाकर अधिकारियो को गुमराह करते हुए आरएनआई रजिस्ट्रेशन गैर कानूनी तरीके से हासिल किया है.Letter03

वहीं देहरादून से प्रकाशित हिमवत उत्तराखण्ड नामक साप्ताहिक समाचार पत्र के सम्पादक धर्मेन्द्र वर्मा द्वारा 19 अप्रैल 2010 को प्रस्तुत किए गए प्रैस अनुबन्ध पत्र पर भी प्रिन्टिग प्रैस स्वामी के फर्जी हस्ताक्षर बनाए गए हैं जबकि वर्ष 2011 में धर्मेन्द्र वर्मा का निधन हो चुका है वहीं उत्तराखण्ड सिद्व टाइम्स, सच होता सपना की सम्पादक नीरू वर्मा द्वारा भी प्रिन्टिग प्रैस स्वामी के फर्जी हस्ताक्षर आरएनआई में जमा किए गए हैं. सवाल यह उठ रहा है कि मीडिया की विष्वसनीयता पाठको व जनता के बीच चौथे स्तम्भ की रहती है लेकिन ऐसे लोगो ने जहां पत्रकारिता की विष्वसनीयता को बट्टा लगाने के साथ साथ स्टाम्प पेपर में फर्जी अनुबन्धो की कारगुजारी को अंजाम दिया ळै उससे निष्चित रूप में उत्तराखण्ड की मीडिया सवालो के घेरे में आ गई है और वरिष्ठ पत्रकरो का भी मत है कि ऐसे लोगो ने मीडिया की पूरी जमात को बदनाम कर दिया है और इन लोगो को मीडिया जगत में बहिश्कार किया जाना चाहिए जो पत्रकारिता की आढ़ में अपने निजी हितो को गैरकानूनी तरीके से साधने का काम कर रहे हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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3 thoughts on “उत्तराखण्ड में सरकारी विज्ञापनों की लूट खसोट…

  1. ऐसा कौनसा राज्य है जहाँ से अख़बारों के नाम से ये सरकारी विज्ञापन लुट का गौरख धंधा नहीं चल रहा?
    आपके शहर में भी ऐसे कई मिल जायेंगे जिनके अख़बारों की सिर्फ दस प्रतियाँ छपती है और वे सरकारी विभागों में खाना पूर्ति के लिए भेज कर विज्ञापन झटके जा रहें है!

  2. ऐसा कौनसा राज्य है जहाँ से अख़बारों के नाम से ये सरकारी विज्ञापन लुट का गौरख धंधा नहीं चल रहा ??
    आपके शहर में भी ऐसे कई मिल जायेंगे जिनके अख़बारों की सिर्फ दस प्रतियाँ छपती है और वे सरकारी विभागों में खाना पूर्ति के लिए भेज कर विज्ञापन झटके जा रहें है !!

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