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काश तुम्हारी मौत से सोच बदल जाए…

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13 दिन तक ज़िंदगी की लड़ाई लड़ती रही, लेकिन अंत में हार गई. उसकी मौत पर कई लोगों ने कहा कि देश शर्मिंदा है. लेकिन क्या सच में देश को शर्म आ रही है? शायद नहीं!Khargone

मध्य प्रदेश की एक महिला साइंटिस्ट डॉ. अनीता शुक्ला का बयान सुनने के बाद तो ऐसा नहीं कहा जा सकता. महिला सशक्तिकरण पर आयोजित एक सेमिनार में वक्तव्य देने पहुंची डॉ. अनीता शुक्ला ने शर्मनाक बयान देते हुए कहा कि यदि वो लड़की 6 गुंडों के सामने सरेंडर कर देती तो आंतें निकालने की नौबत नहीं आती. अपनी हालत के लिए लड़की खुद जिम्मेदार है.
अनीता शुक्ला ने और भी बहुत कुछ कहा और वहां बैठे श्रोतागण तालियां बजाते रहे. वहां बैठे लोगों में एक भी ऐसा इंसान नहीं था जिसने तुरंत उठ कर विरोध किया. तो फिर उन लोगों की चुप्पी और तालियों को अनीता शुक्ला का समर्थन क्यों न मान लिया जाए.
मोहल्ले में लगने वाली पंचायतों में भी कई महिलाओं के मुंह से सुना कि अच्छा ही हुआ उस लड़की की मौत हो गई. जी भी जाती तो कैसी ज़िंदगी होती उसकी. कौन उससे शादी करता?
इस घटना के बाद से दिल्ली के साथ-साथ देश गुस्से में है. हर तरफ मांग उठ रही है कि कानून बदलो, सख्त सज़ा दो, ताकि कोई दोबारा ऐसी हरकत करने से पहले सौ बार सोचे. लेकिन क्या सिर्फ कानून बदल देने से हालात बदल जाएंगे. क्या इस देश की बेटियां सुरक्षित हो जाएंगी, क्योंकि बलात्कार करने वाले को ये डर होगा कि अगर पकड़ा गया तो कड़ी सज़ा हो सकती है. क्या जो कुछ हो रहा है वो सिर्फ कमजोर कानून की वजह से.
नहीं, कानून से भी ज्यादा कमजोर हमारा समाज हो चुका है. जिसके संस्कारों में अब दीमक लग चुकी है. या शायद समाज बहुत पहले कमजोर हो चुका था. जब सतयुग में सीता पर मिथ्यारोप लगाकर अग्नी परीक्षा देने को कहा गया और अपनी पवित्रता का प्रमाण देने के बावजूद तथाकथित मर्यादापुरुषोत्तम ने उन्हें त्याग दिया था. तब ये समाज चुप था. अगर तभी समाज ने विरोध किया होता तो आज तक हर स्त्री को सीता की तरह अपनी पवित्रता का सबूत नहीं देना पड़ता.
उससे पहले जब देवों के राजा कहे जाने वाले इंद्र ने गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के साथ बलात्कार किया था तब भी ये समाज चुप था. शिला सी बन जाने की सज़ा अहिल्या को ही मिली थी.
जब द्वापर में भरी सभा में द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था, तब भी ये समाज चुप था, सिर्फ आंसू बहा रहा था. अगर तभी समाज ने विरोध किया होता और दुःशासन के हाथ काट दिए होते तो शायद आज देश में इतने सारे दुःशासन जन्म नहीं लेते.
कृष्ण ने कहा था कि जब-जब इस धरती पर अधर्म बढ़ेगा तब-तब वो धर्म के उत्थान के लिए जन्म लेंगे. क्या भगवान के लिए भी अब तक इस युग में अधर्म की अति नहीं हुई है?
भारत को तो संस्कारों और रीति-रिवाजों का देश कहा जाता है, फिर इसके बेटों के खून में इतनी गंदगी कहां से आ गई है. पुरुषों का एक तबका ऐसा है जो बलात्कार कर लेने में अपनी मर्दानगी समझता है तो दूसरा तबका अपनी आंखों के सामने घटती घटनाओं से मुंह फेर लेने और चुप्पी साधे रखने में समझदारी मानता है. समाज तो हमारे और आपके जैसे लोगों के मिलने से बनता है. तो फिर समाज में ज्यादातर महिलाओं की सोच ऐसी क्यों है कि लड़की अपनी हालत के लिए खुद जिम्मेदार होती है.
आम से लेकर खास तक बदलाव की बात कर रहा है, लेकिन जब तक बदलाव हमारे अंदर नहीं आएगा हालात भी नहीं बदलेंगे. सबसे पहले शुरुआत अपने घर से और उससे भी पहले अपने घर से करनी होगी. अपने पिता, भाई, पति, बेटे, दोस्त सभी को अपने वजूद से रूबरू कराना होगा. और बदलनी होगी उन महिलाओं की सोच जो कहती हैं कि उसका मर जाना ही अच्छा हुआ, वरना कौन उससे शादी करता.
सिर्फ इस एक घटना का विरोध करने से समाज नहीं बदलेगा. हर कदम पर, हर शक्ल में औरत के साथ हो रही नाइंसाफी पर लगाम लगानी होगी. इस सोच को भी बदलना होगा कि औरत घर की इज्जत होती है. बलात्कार जैसा जघन्य अपराध करने वाला बेटा क्या घर की इज्जत पर बट्टा नहीं लगाता. समाज को अपने बेटों को समझाना होगा कि उनकी ऐसी हरकत शर्मिंदा कर देती है. घर की इज्जत का ठेका बेटियों के सिर फोड़ने की जगह बेटों को उनकी जिम्मेदारी समझानी होगी.
कानून से पहले समाज को बदलना होगा. वरना ऐसा क्यों होता जब हजारों लोग एक बेटी के लिए इंसाफ की मांग कर रहे थे, जुलूस निकाल रहे थे, पुलिस की लाठियों से जूझ रहे थे उसी दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से बलात्कार की ख़बरें भी लगातार आ रही थीं. कभी तीन साल की बच्ची से बलात्कार तो कभी चालीस साल की महिला से गैंगरेप.
आज हर तरफ कानून बदलने की बात हो रही है. कोई जमीर बदलने की बात क्यों नहीं करता. जब तक हमारी सोच नहीं बदलेगी, ये समाज नहीं बदल सकेगा. समाज में बदलाव आ जाए तो शायद सख्त कानून की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.
देश में छली गई एक बेटी ने विदेश में तड़पते हुए अंतिम सांसें लीं. लाखों-करोड़ों दुआएं भी उसे बचा नहीं पाईं. देश उसकी मौत पर आंसू बहा रहा है और मैं उम्मीद कर रही हूं कि शायद उसकी मौत से लोगों की सोच बदल जाए.

(उर्जा श्रीवास्तव की फेसबुक वाल से)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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